Saturday, March 21, 2020

Tuslidas ka jivan parichay

सन्त कवि तुलसीदास जी का जीवन परिचय


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Tuslidas


भारतीय सन्तों के जीवनी के प्रमाण इतिहास के पन्नों में बहुत ही अल्प मात्रा में उपलब्ध होते हैं। कबीरदास, सूरदास, जायसी, तुलसीदास आदि सन्त कवि मध्यकाल के हैं, किन्तु उनके सम्बन्ध में आज भी हमें प्रामाणिक साक्ष्य और निर्विवाद तथ्य नहीं मिल पाये हैं।

तथ्यपरक जानकारी के अभाव में अनेक प्रकार की जनश्रुतियाँ/किवदन्ती प्राचारित हो जाती हैं। इस कारण परस्पर विरोधी मतों की प्रतिष्ठा होनी लगती है। उनके जन्म स्थान, माता-पिता, परिवार, कुल-गोत्र आदि के सम्बन्ध में अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं।

Tuslidas ka jivan parichay

तुलसीदास जी का जीवन परिचय के बारे में दोस्तो प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख किया गया है। जैसे कि श्री नाभादास द्वारा रचित ’’भक्तमाल’’ में तुलसीदास जी को वाल्मीकि का अवतार होने का उल्लेख किया है। श्री प्रियादास द्वारा रचित ’’भक्तमाल की टीका’’ में तुलसीदास जी की चमत्कारिक सिद्धियों का उल्लेख है। वेणीमाधवदास द्वारा रचित गोसाईचरित में तुलसीदास जी के जीवन वृत्त का  विस्तृत वर्णन किया गया है।

यह भी कहा जाता है कि वेणीमाधवदास तुलसीदास जी के समकालीन थे और वे उन्हीं के पास रहते थे, लेकिन इसमें चमत्कारिक घटनाओं की अधिकता के कारण इसकी प्रमाणिकता पर संशय होता है। जनपद हाथरस में 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जन्में श्री तुलसी साहेब द्वारा रचित ’’घट रामायण’’ में वे अपने को तुलसीदास जी का अवतार मानते थे और वे यह भी दावा करते थे कि उनको पूर्वजन्म की सभी घटनाएँ स्मरण हैं। 

उपर्युक्त वर्णित ग्रन्थों के अलावा गोस्वामी तुलसीदास जी की कृतियों में तुलसीदास जी के जीवन परिचय से सम्बन्धित कुछ सांकेतिक साक्ष्य उपलब्ध हुये  हैं। इन साक्ष्यां को सत्य के रूप में स्वीकार कर तुलसीदास जी के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे जन्म  स्थान, कुल, माता-पिता, गुरु देहान्त आदि के सम्बन्ध में प्रकाश डालते हैं। 

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जन्म  एवं स्थान (Birth and Place):-

सन्त कवि गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्म एवं स्थान के बारे में पर्याप्त मतभेद है, परन्तु अधिकांश विद्धान उनकी जन्मतिथि सम्वत् 1554 श्रावण शुक्ल सप्तमी मानते हैं। जन्म स्थान के बारे में दो मत प्रचलित हैं। कुछ विद्धान इनका जन्मस्थान बाँदा जिला के अन्तर्गत ग्राम राजापुर को मानते हैं। ग्राम राजापुर की कुछ सामाजिक रीति-रिवाज, मन्दिर में रखी तुलसी की मूर्ति एवं राजापुर निवासी उपाध्यायों के पास उपलब्ध सनदें इस बात का प्रमाण हैं कि राजापुर से तुलसीदास जी का किसी न किसी रूप में नाता अवश्य रहा होगा।

कुछ विद्धानों द्वारा बाँदा गजेटियर के अनुसार बताया गया कि तुलसीदास ऐटा जनपद के सोरों नाम स्थान से आये थे और उन्होंने मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में ग्राम राजापुर की स्थापना की थी। 

कुछ विद्धान कहते हैं कि तुलसीदास जी का जन्म न तो बाँदा जनपद के ग्राम राजापुर में और न ही एटा जनपद के ग्राम सोरो में हुआ। उनका जन्म सूकर क्षेत्र के किसी समीपवर्ती स्थान पर हुआ था, जहाँ से वे सोरो आये और बाद में राजापुर चले गये थे। 

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तुलसीदास जी का जन्म अभुक्त मूल ऩक्षत्र में हुआ था, जिसके कारण उन्हें परिवार के लिये अमंगलकारी समझा गया और उनके प्रति उपेक्षा का व्यवहार किया गया। यह भी कहा जाता है कि गोस्वामी जी ने जन्म लेते ही रामनाम का उच्चारण किया था, इसीलिए उनका नामकरण ’’रामबोला’’ से हुआ था।

जन्म के कुछ समय बाद गोस्वामी जी की माता का निधन हो गया और उनका लालन-पालन चुनियाँ नामक दासी के द्वारा किया गया। कुछ समय पश्चात् उनके पिता का साया भी सिर से उठ गया।

इस प्रकार रामबोला बचपन में बिना माँ-बाप के हो गये थे। गोस्वामी जी लगभग पाँच वर्ष की आयु के थे, तब चुनिया दासी का भी स्वर्गवास हो गया। बाल्यअवस्था में ही रामबोला अनाथ होकर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गये।

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शिक्षा-दीक्षा (Education) :-

इसी अवस्था में बालक रामबोला भटकते-भटकते सूकर क्षेत्र पहुँचकर नरहरिदास के शिष्य बने। गुरु महिमा का वर्णन करते समय गोस्वामी जी ने इन्हीं नरहरिदास जी का स्मरण किया गया है और उन्हीं के द्वारा ही सर्वप्रथम रामकथा सुनी, उन्हीं के द्वारा गोस्वामी जी का रामबोला के स्थान पर तुलसी नाम दिया गया। गुरु नरहरिदास जी ने तुलसीदास को काशी के प्रसिद्ध विद्धान शेष सनातन की पाठशाला में विभिन्न शास्त्रों का गहन अध्ययन किया।

शिक्षा समाप्त होने के उपरान्त तुलसीदास जी राजापुर आ गये। पौराणिक ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है कि राजापुर में रहकर वे कथा-पुराण कथावचक बनकर अपनी आजीविका चलते थे। तुलसीदास जी की कृतियों में उनके पिता के नाम का कोई उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन श्री कृष्णदास रचित ’’सूकर क्षेत्र माहत्म्य’’ में उनके पिता का नाम आत्माराम  एवं रहीमदास जी के दोहे के अनुसार उनकी माता का नाम हुलसी बताया गया है। 

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विवाह (Marriage):-

तुलसीदास जी का विवाह एक विदुषी ब्राह्मण कन्या के साथ हुआ था। श्री मुरलीधर चतुर्वेदी के अनुसार यह कन्या बन्धु पाठक की पुत्री थी, जिसका नाम रत्नावली था। विवाहोपरान्त के कुछ समय बाद तुलसीदास की पत्नी रत्नावली ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम तारापति था, परन्तु यह बालक अधिक दिनों जीवित नहीं रहा सका। तुलसीदास जी अपनी पत्नी में अत्यधिक अनुरक्त थे। 

गोस्वामी जी का दाम्पत्य जीवन का सुख अधिक समय तक स्थाई नहीं रह सका। एक बार रत्नावली गोस्वामी जी को बिना बाताये अपने मायके चली गयी। पत्नी में अनुरक्त होने के कारण तुलसीदास जी रात में नदी को पार कर सुसराल पहुँच गये। इस पर रत्नावली ने गोस्वामी जी के प्रेम को दुर्बलता के रूप में ग्रहण किया और आक्रोश में गोस्वामी जी को फटकारते हुये कहा कि :-

’’हाड़ मांसमय देह मम, तासो जैसी प्रीती। वैसी जो श्रीराम में, होत न भव भय प्रीत।।’’


तुलसीदास जी ने उक्त दोहा के शब्दों का मर्म को समझा और अपने गुरू नरहरिदास ने राम भक्ति का जो बीज उनके मन में बोया था, वह पत्नी के शब्दों से सुनकर अति प्रषन्न होकर उसी रात में गृह त्याग दिया। 

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आध्यात्मिक खोज(Spiritual quest) :- 

गृह त्याग करने के पश्चात् गोस्वामी जी ने अनेक स्थानों पर घूमते रहे, सन्त-महात्माओं और विद्धानों की संगति में रहकर अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान खोजते रहे। भारतीय संस्कृति एवं समाज को उन्होंने निकटता से देखकर अध्ययन किया। इस प्रकार उनकी रामभक्ति निष्ठा और भी बढ़ती गयी। 

प्रसिद्ध  ग्रन्थ श्री रामचरित मानस की रचना एवं उस समय का परिवेश(The composition of the famous Book Sri Ramcharit Manas and ht environment of that time) :-

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Shri Ramcharitmanas

घट रामायण के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी ने सन् 1631 में अयोध्या में अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ’’रामचरित मानस’’ की रचना आरम्भ की। रामचरित मानस का लेखन अयोध्या और काशी में किया गया। यह प्रसिद्ध ग्रन्थ अवधी भाषा में होने के कारण अल्प समय में ही इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी।

ऐसा माना जाता है कि लोकप्रियता बढ़ने के कारण उस समय के प्रतिष्ठित पंडितों ने गोस्वामी जी के विरुद्ध अनेक प्रकार के षड्यन्त्र रचे गये थे। रामायण की प्रतियाँ चुराने अथवा नष्ट करने का प्रयास किया गया। परिणामस्वरूप गोस्वामी जी ने रामचरित मानस की प्रतियों की सुरक्षा का भार अपने मित्र टोडर को दिया, जो काशी के जमींदार थे।

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वृद्धावस्था(Old Age) :-

अपने जीवन के अन्तिम दिनों में गोस्वामी जी ने कांशी में वास किया। वृद्धावस्था में गोस्वामी को अनेक प्रकार के असहनीय शारीरिक कष्टों से गुजरना पड़ा था, लेकिन उनकी श्रीराम के प्रति भक्ति एवं निष्ठा में कोई कमी नहीं आयी। गोस्वामी जी की श्रीराम के प्रति एकनिष्ठ भक्ति थी। वे अपने जीवन में किसी भी उपलब्धि का श्रेय श्रीराम को ही देते थे।

गोस्वामी जी की सांसारिक मोह माया का यह प्रमाण मिलता है कि एक बार सम्राट अकबर ने उन्हें मनसबदार बनाने का प्रस्ताव भेजा था, जिसकों उन्होंने अस्वीकार कर कर दिया। गोस्वामी जी की कृतियों में यह प्रमाण मिलता है कि वे अंध-विश्वास, पाखण्डी रूढ़ियों के खिलाफ थे।

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देहान्त(Dead):- 

गोस्वामी जी की देहान्त की तिथि के बारे में भी मतभेद हैं, किन्तु अधिकांश विद्धानों के मतों द्वारा समर्थित उनका देहान्त सम्वत् 1680 में श्रावण महीने के कृष्णपक्ष की तृतीय शनिवार को कासी में गंगा के किनारे असी घाट पर हुआ। असी घाट पर तुलसीदास के उत्तराधिकारियों के वंशज आज भी निवास करते हैं, वे भी इसी तिथि को गोस्वामी जी की पुण्यतिथि मानते हैं।

वृद्धावस्था में अनेक प्रकार के शारीरिक कष्टों को सहन करने के बावजूद भी उनका देहान्त बडे ही शान्तिपूर्ण हुआ। वे अपने अन्तिम क्षणों में श्रीराम नाम का गुणगान करते रहे। उनकी काव्य साधना ज्ञानोपार्जन के उपरान्त आजीवन चलती रही। श्री राम नाम का गुणगान करते करते इस संसार से अलौकिक परमधाम को प्रस्थान किया।  






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