Thursday, March 12, 2020

Samrat Ashok

सम्राट अशोक (Samrat Ashok) 

इस Post में Samrat Ashok Ke Jivan ki Hindi में जानकारी दी गई है कि Samrat Ashok  ने अपने जीवन में ऐसे कौन-कौनसे कार्य किये, जिनके कारण Samrat Ashok  का नाम आज भी विश्व के इतिहास में एक नक्षत्र की भाँति चमकता दिखाई देता है।

 

Samrat Ashok
Samrat Ashok

Samrat Ashok के समान सर्वगुण सम्पन्न भारत के इतिहास में कोई सम्राट नहीं हुआ है। बिन्दुसार की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अशोक राजा बना। Samrat Ashok का शासनकाल भारतीय इतिहास का अत्यन्त गौरवशाली समय माना जाता है, क्योंकि Samrat Ashok ने अपनी असाधारण कुशलता एवं क्षमता से भारत को सभी प्रकार से उन्नति प्रदान की थी। उसका विश्व की महान् विभूतियों में गिनती की जाती है। सर्वश्रेष्ठ प्रशासनिक व्यवस्था, धर्म संरक्षण, हृदय की उदारता, कला का विकास एवं प्रजा के प्रति प्रेम आदि की दृष्टि से सम्राट अशोक एक महान् शासक बना था।

Samrat Ashok ने शस्त्र विजय के स्थान पर सभी धर्मों की अच्छाई के सार पर महत्त्व दिया। उसकी राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ विश्व के इतिहास में अतुलनीय हैं। सम्पूर्ण संसार का उत्थान उसके जीवन का परम आदर्श था। 

सम्राट अशोक का परिवार
Samrat Ashok ka Parivar 

Samrat Ashok के पिता नाम बिन्दुसार तथा माता का नाम सुभद्रांगी था। वह चम्पा के एक ब्राह्मण की पुत्री थी। अशोक की माता को दर्शनीया, प्रसादिका और जनकल्याणी आदि नामों से पुकारा जाता था। बिन्दुसार की 16 रानियाँ थी तथा उनसे उत्पन्न सन्तानों की संख्या 101 थी, जिसमें सुसीम नाम का पुत्र सबसे बडा था। 

सम्राट अशोक का प्रान्तीय शासक के रूप में जीवन
Samrat Ashok Ka Prantiy Shasak ke Roop Mai Jivan


Samrat  बनने से पूर्व पिता बिन्दुसार के शासनकाल में अशोक ने प्रान्तीय सूबेदार के रूप में शासन सम्बन्धी अनुभव प्राप्त कर लिया था। सबसे पहले Samrat Ashok को अवन्ति प्रान्त का सूबेदार नियुक्त किया गया था, जहाँ पर उसने विद्रोहियों का दमन करके शान्ति व्यवस्था स्थापित की थी।

Samrat Ashok की इस प्रकार की कार्यप्रणाली एवं योग्यता से प्रभावित होकर बिन्दुसार ने उसे तक्षशिला का सूबेदार नियुक्त किया, क्योंकि तक्षिशिला में भ्रष्ट राज्य के अधिकारियों के शोषण के कारण वहाँ की जनता ने विद्रोह कर दिया था।

Samrat Ashok तक्षशिला में भी विद्रोह को समाप्त कर शान्ति स्थापित करने में सफलता रहा, जिससे उसे राज्य के कई मन्त्रियों का समर्थन प्राप्त हुआ। कुछ समय बाद बिन्दुसार की मृत्यु हो गई। सम्राट अशोक ने अपने विश्वासपात्र मन्त्रियों के सहयोग से मगध के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। 

सम्राट अशोक का उत्तराधिकारी के लिये संघर्ष
Samrat Ashok's Struggle for Successor

बिन्दुसार की मृत्यु के बाद बिन्दुसार के पुत्रों में गृहयुद्ध हुआ था। इस गृहयुद्ध में अशोक ने अपने बड़े भाई सुसीम को पराजित कर मार डाला और अपने विश्वासपात्र मंत्री राधागुप्त की सहायता से मगध के सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया।

Samrat Ashok  के मगध सम्राट बनने तथा उसके राज्याभिषेक में चार वर्ष का अन्तर बताया जाता है, जिसका मुख्य कारण मगध के उत्तराधिकार का संघर्ष ही था।

सम्राट अशोक की प्रसिद्ध कलिंग-विजय
Samrat Ashok ki Prasiddh Kaling-Vijay


Samrat Ashok  की Kaling Yuddh Vijay विश्व के इतिहास में अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। मगध के पड़ौस में ही कलिंग नाम एक शक्तिशाली राज्य था। Kaling पर नन्दों का अधिकार था। अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। हालांकि इस युद्ध में कलिंग हार गया, परन्तु सम्राट अशोक की सेना का Kaling की सेना ने बड़े ही बहादुरी के साथ युद्ध किया था। 

ऐसा कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में Kaling को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला  लिया था। कलिंग युद्ध में लगभग डेढ़ लाख सैनिकों को कैद कर लिया गया था। लगभग एक लाख सैनिक मारे गये। चारों तरफ युद्धभूमि लाल रक्त से सनी हुई थी। वहाँ पर कराह वेदना, चीखने की आवाजें सुनाई दे रही थीं।

इस युद्ध से हुई असहनीय भीषणता के दृश्य को देखकर सम्राट अशोक प्रभावित होकर उसका हृदय परिवर्तित हो गया। कैद किये गये सैनिको अथवा मनुष्यों को छोड़ने का आदेश देकर कहा -कि अब मेरी इच्छा यह है कि संसार के सभी प्राणी संयमी और शान्त तथा प्रसन्न रहें। शस्त्र वास्तविक विजय नहीं है। वास्तविक विजय धर्म विजय है।

Samrat Ashok  ने कलिंग विजय के बाद उसने अपने शस्त्र त्याग कर मुख्य विजय को धर्म विजय माना। इसीलिये कलिंग का युद्ध विश्व में युगान्तकारी युद्धों में से एक माना जाता है।

सम्राट अशोक का धर्म परिवर्तन
Samrat Ashok ka Dharm Privartan

कलिंग के इस महायुद्ध से पूर्व सम्राट अशोक अपने पिता के समान ब्राह्मण धर्म को मानने वाला था। राजतरंगिणी के अनुसार वह शिव भक्त था। उसे हिंसा एवं पशु-वध से घृणा नहीं थी। वह स्वयं मांसाहारी था। उसके भोजनालय में प्रतिदिन पशुओं का वध होता था। 

लेकिन कलिंग युद्ध के बाद वह पूर्णतः बदल गया। सम्राट अशोक महात्मा बुद्ध के उपदेशों से काफी प्रभावित होकर उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। बौद्ध धर्म धारण के बाद सम्राट अशोक ने अनेक बौद्ध तीर्थस्थानों की यात्रा की। 

Samrat Ashok  ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था और वह बौद्ध हो गया था, लेकिन उसने सर्वसाधारण में जिस धर्म का प्रचार किया था, वह बौद्ध धर्म से भिन्न था। और वह था- मानव धर्म, विश्व धर्म।

बौद्ध धर्म सम्राट अशोक का व्यक्तिगत धर्म था न कि वह राजधर्म था। उसने अपनी प्रजा पर इस व्यक्तिगत धर्म को अपनाने के लिए कभी प्रेरित नहीं किया। फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि सम्राट अशोक के बौद्ध हो जाने पर बौद्ध धर्म अशोक के समय काफी उन्नतशील बन गया। और इतना ही नहीं विम्बसार और आजतशत्रु जैसे शासकों का आश्रय पाकर बौद्ध धर्म का मगध साम्राज्य में तेजी से प्रचार-प्रसार हुआ था। 

बौद्ध धर्म किसी राज्य के आश्रय का अभाव होने के कारण एक क्षेत्र में ही सीमित था, लेकिन सम्राट अशोक का आश्रय पाकर बौद्ध धर्म का इतना तेजी से विस्तार हुआ कि बौद्ध धर्म भारत में नहीं अपितु अन्य देशों में भी फैल गया। बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिये सम्राट अशोक ने अनेक धर्म यात्राएँ की थी। 

सम्राट अशोक का बौद्ध बनने के बाद जीवन
Samrat Ashok Ka Bauddh' Banane Ke Bad Jivan

Samrat Ashok  का बौद्ध बनने पश्चात् अपना विशाल साम्राज्य का परित्याग कर एक साधारण भिक्षु के समान अपना जीवन व्यतीत करने लगा। उसने प्रायः यज्ञों में होने वाले पशु-वध पर रोक लगा दी। भोजन की सामग्री में उपयोग लाने वाले पशु-वध पर रोक लगा दी।

Samrat Ashok ने अपनी पाकशाला में पशु-वध पर रोक लगा दी। पूरे साम्राज्य में निर्देश जारी कर दिये कि पशु-वध पाप है। इसलिये अब पशुओं को मारा नहीं जायेगा। इस प्रकार आचरण ने सम्राट अशोक को एक महान सम्राट की उपाधि दी गई। और इन्हीं आचरणों से वहाँ की प्रजा प्रेरित होकर बहुत से लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे। 

सम्राट अशोक के समय बौद्ध धर्म में उत्पन्न मत-भेद
Samrat Ashok Ke samay Bauddh Dharm Mai Utapann Mat-Bhed

Samrat Ashok  के समय बौद्ध धर्म में मत-भेद उत्पन्न हो गये थे, जिसको दूर करने के लिये एवं धर्म को संगठित करने हेतु अशोक ने पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध महासभा का आयोजन करवाया था। इस महासभा में बौद्ध धर्म में उत्पन्न मतभेदों एवं दोषों को दूर किया गया था। जिसके परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म उसके शासनकाल में खूब फला-फूला।

सम्राट अशोक का धम्म
Samrat Ashok Ka Dhamm

हम आपको पूर्व में उल्लेख कर चुके हैं कि बौद्ध धर्म को Samrat Ashok  ने एक व्यक्तिगत धर्म के रूप में स्वीकार किया था। उसने अपनी प्रजा को बौद्ध धर्म को अपनाने के लिये न तो कोई वजन लादा और न ही प्रेरित किया।

प्रजा स्वेच्छानुसार बौद्ध धर्म को अपना सकती  थी, लेकिन सम्राट अशोक ने अपनी प्रजा का नैतिक एवं अध्यात्मिक स्तर को उन्नतशील बनाने के लिये जिस धर्म पर जोर दिया था, वह था- धम्म। धम्म का अर्थ- विभिन्न रूपों में था जैसे- राजधर्म, सभी धर्मों की अच्छाई का सार, राजाओं को अपने धर्म का पालन करना, जिसमें अहिंसा, दया, दान, सत्य, आत्मीय शुद्धि, सामाजिक कर्तव्य आदि तथ्यों का समावेश था।

Samrat Ashok का धम्म मानव जाति के कल्याण तक ही सीमित नहीं था। वह तो जगत के सारे जीव को सुख पहँचाने वाला था। 

सम्राट अशोक का साम्राज्य विस्तार
Samrat Ashok Ka Samrajya Vistar

सम्राट अशोक का साम्राज्य उत्तर में कश्मीर, दक्षिण में मैसूर तक और पश्चिम में अफगानिस्तान-बिलोचिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक विस्तृत था। कुछ छोट-छोटे राज्य उसके अधीन नहीं थे। बाकी सम्पूर्ण भारत Samrat Ashok  के साम्राज्य में आता था। प्राचीन भारत में इतने बड़े साम्राज्य पर शासन करने का सौभाग्य किसी अन्य सम्राट को प्राप्त नहीं हुआ था। 

सम्राट अशोक का इतिहास में स्थान
Samrat Ashok Ka Itihas mai Sthaan

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अशोक एक Mahan Samrat   होने के साथ-साथ एक सफल विजेता और कुशल शासक भी था। वह धर्म का ज्ञाता, और उसका प्रचारक तथा संरक्षक भी था। वह जन कल्याण, मानव सेवा और महात्मा बुद्ध के मार्ग में विश्वास रखने वाला था।

Kaling Yuddh Vijay के बाद उसने अपना सारा जीवन जन कल्याण एवं समस्त जीव कल्याण में अर्पित कर दिया। ऐसे बहुमुखी प्रतिभावान एवं आदर्श सम्राट का नाम विश्व के इतिहास में एक नक्षत्र की भाँति चमकता है। आज भी सम्राट अशोक का नाम बड़े सम्मान के साथ आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है। 

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