Saturday, January 18, 2020

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hindi kahaniya - माया की चादर

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hindi kahaniya - माया की चादर

प्रचीन समय में नबाबों के शहर लखनऊ (लक्ष्मणवती) में पं0 मदन मोहन शर्मा रहते थे। वे शहर के विख्यात प्रकाण्ड विद्वान व्यक्ति थे। उन्होंने वेद, पुराणों एवं धार्मिक ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया था। वे शास्त्रीय संगीत में भी निपुण थे।

शर्मा जी इसी शिक्षा से पुरोहित का कार्य कर अपनी आजीविका चलाते थे। उनके पास जो भी व्यक्ति अपनी समस्या को लेकर आता था, वे बड़े ही सरल स्वभाव से उनकी समस्याओं का निदान करते थे। धीरे-धीरे उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि शहर के ओर-पास बसे हुये गांवो में से ग्रामीण लोग भी उनके पास अपनी समस्याओं को लेकर आने लगे। 

शर्मा जी की दक्षिणा कोई निश्चित निर्धारित नहीं थी। इसलिये व्यक्ति श्रद्धा-भाव के अनुसार उनको दक्षिणा दे जाते थे। 

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शर्मा जी का परिवार बड़ा होने के कारण जो दक्षिणा इस पुरोहित के कार्य से प्राप्त होती थी, उससे उनके परिवार का खर्चा नहीं चल पाता था। जब उनके पास खाली समय होता था, तो इसी चिन्तन में डूबे रहते थे, उनके परिवार का खर्चा कैसे चले? शर्मा जी विद्वान व्यक्ति थे, लेकिन उनके घर में लक्ष्मी का निवास नहीं था।

एक दिन शर्मा जी को किसी कार्य हेतु पास ही के गांव में जाना था। गांव जाने के लिए रास्ते में एक भयानक जंगल से गुजरना पड़ता था। गांव से आते -आते उन्हें रात हो गई थी। जब शर्मा जी को उस अन्धेरी रात में अपनी दरिद्रता का चिन्तन करते हुये जंगल से गुजर रहे थे, तभी पीछे से अचानक उनके कानों में आवाज सुनाई दी-  शर्मा जी क्या सोच रहे हो? 

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पहले तो वे डर गये, लेकिन साहस कर उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो एक दिव्य पुरुष उनके सामने खड़ा हुआ दिखाई दिया। शर्मा जी उसके सामने हाथ जोड़कर खडे़ हो गये। दिव्य पुरुष बोले- शर्मा जी मैं आपकी दद्रिता दूर सकता हूँ, मगर मेरी एक शर्त है। शर्मा जी बोले कैसी शर्त- 

मैं तुम्हें धन दूँगा, जिसमें से उस धन का आधा हिस्सा आपको जनकल्याण में लगाना होगा। शर्मा जी ने उस दिव्य पुरुष की शर्त मानकर बचन दे दिया।

शर्मा जी को उस दिव्य पुरुष ने एक बक्सा दिया, जो कि अशर्फियों से भरा हुआ था। शर्मा जी रात को उसे लेकर अपने घर पहुँचे, और रात भर सोचते-सोचते धन को देखकर माया की चादर उनके दिमाक में जम गई।

समय गुजरता गया, शर्मा जी के पास कोई कमी नहीं थी। परिवार के लिए सभी प्रकार की सुविधाएँ उन्होंने जुटा रखी थीं, लेकिन माया की परत के कारण शर्मा जी ने उस धन का प्रयोग केवल अपने लिये ही किया, उन्होंने जनकल्याण में एक रत्तिभर धन खर्च नहीं किया। शर्मा जी का वैभवता के कारण उनका क्षेत्र में और अधिक सम्मान बढ़ गया।

एक दिन शर्मा जी बीमार पड़ गये, सारे लखनऊ शहर  एवं ओर-पास के क्षेत्रों के हकीम वैद्यों ने उनका उपचार किया, उन्होंने विभिन्न प्रकार जड़ी बूटियों का प्रयोग किया गया, लेकिन उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं आया। एक रात दिव्य पुरुष शर्मा जी के सपने में आये और बोले-क्यों शर्मा जी कैसे हो बक्से से भरी अशर्फियाँ पाकर मुझे दिये गये बचन को भूल गये। शर्मा जी की एक दम आँखें खुली और उस वचन के बारे मे सोचने लगे, जो उन्होंने उस दिव्य पुरुष को दिया था। माया की चादर ने अबतक उन्हें उस बचन को याद ही नहीं दिलाया।

शर्मा जी सुबह होते ही जागे और वे समझ गये कि मेरी बीमारी का गूढ़़ रहस्य क्या है?

शर्मा जी ने बक्सा देखा, जोकि अभी भी आधे से ज्यादा अशर्फियों से भरा हुआ था। उन्होंने तुरन्त अपने मुनीम को बुलाया और कहा कि लखनऊ शहर के चोरों तरफ बसे गांवों में देखकर आओ कि गांवों में कौन-कौनसी सुख-सुविधाओं की कमी है।

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एक सप्ताह घूमते-घूमते मुनीम जायजा लिया और शर्मा जी को जिन-जिन गांवों में सुविधाओं का अभाव था, उसकी एक लिस्ट उनके हाथों में थमा दी।
शर्मा जी ने फिर दिये गये बचन के अनुसार उस धन का आधा हिस्सा जनकल्याण में लगाना प्रारम्भ किया, उन्होंने गांवां में गुरुकुल, जलाशयों एवं पीने के पानी हेतु कूपां का निर्माण आदि कार्य करवाये, ऐसा करने पर शर्मा का स्वास्थ्य धीरे सुधरने लगा।

फिर उन्होंने उस दिव्य पुरुष को कोटि-कोटि नमन् कर धन्यवाद् दिया। 

शिक्षा- व्यक्ति को कभी लालच नहीं करना चाहिए अपने दिये गये बचन का पालन करना चाहिए। 


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