Sunday, December 15, 2019

Jainism

जैन धर्म के सिद्धान्त  (Principle of Jainism)


जैन धर्म (Jainism) के कौन-कौनसे सिद्धान्त हैं। दोस्तों इस पोस्ट में इसके बारे में सूक्ष्म जानकारी दी गयी है।

निवृत्ति मार्ग-

जैन धर्म(Jainism) आर्यों के प्रवृत्तिमूलक धर्म के विरुद्ध निवृत्तिमार्ग था। वह आर्यों की भाँति इस संसार के समस्त सुखों की कामना नहीं करता। उसके लिए तो संसार के समस्त सुख दुःखमूलक है, व्याधि रूप है। क्योंकि इनसे कामनाएँ शान्त नहीं होती उल्टे बढ़ती हैं। मनुष्य जन्म और मृत्यु के आवागमन के चक्र से पीड़ित है। गृहस्थ-जीवन में भी उसके लए कोई सुख-शान्ति नहीं है।

जैन धर्म (Jainism) के अनुसार सारा संसार दुःखमय है। इस दुःख का मूल कारण कभी तृप्त न होने वाली तृष्णा है, जिससे मनुष्य आजीवन घिरा रहता है। बौद्ध की भाँति जैन धर्म(Jainism) की मुख्य समस्या भी दुःख और दुःख-निरोध है। उसके अनुसार मनुष्य का सुख सांसारिक सुखों को भोगने में नहीं है, अपितु इस संसार को ही त्यागने में है। मनुष्य को सब कुछ त्याग कर कभी अन्त न होने वाले दुःख को छोड़कर संसार से कोई सम्बन्ध न रखकर, भिक्षु बनकर जीवन व्यतीत करना चाहिए।

इस प्रकार जैन धर्म(Jainism) एक भिक्षु धर्म है। यह निवृत्ति मार्ग है जो आर्यों की प्रवृत्तिमूलक विचारधार के विपरीत था।


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महावीर स्वामी 

जीव और आजीव-

जैन धर्म (Jainism) मुख्य रूप से दो तत्वों में विश्वास करता है। एक जीव और दूसरा आजीव। दोनों ही तत्त्व शाश्वत हैं, अनादि और अनन्त हैं। इनसे ही मिलकर यह जगत् बनता है। इसीलिए वह अनादि और अनन्त है। जीव ही आत्मा है, दोनों एक ही तत्व हैं। जैन धर्म (Jainism) में आत्मा के अस्तित्व को विश्वास सहित और ज्ञानपूर्वक माना गया है। जीव चैतन्य द्रव्य है और अजीव चेतन्य रहित है। जीव का विस्तार शरीर के अनुसार होता है। इसका कार्य अनुभूति है। अर्थात् सुख-दुःख, सन्देह, ज्ञान आदि सभी का अनुभव होता है। जीवन, अजीव के ढाँचे (शरीर) में रहता है। अजीव अवस्था जड़ पदार्थ को ’’पुद्गल’’ कहते हैं।

पुद्गल उस वस्तु को कहते हैं, जिसे जोड़कर बड़ा किया जा सके। अथवा तोड़कर छोटा किया जा सके। इसका लघुतम भाग परमाणुओं के आपस में मिलने से ही इस भौतिक संसार के विभिन्न रूप बनते हैं, जिनके पाँच गुण हैं। ये इस प्रकार हैं -स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, और शब्द। इस प्रकार जीव और अजीव के मिलने से जगत् की रचना होती है।

जीव और अजीव के सम्बन्ध का माध्यम ’’कर्म’’ है। पुद्गल ही कर्म है जो जीव को घेरे रहता है जैसे खान में धातु मिट्टी में मिली रहती है, इसी प्रकार जीव इस ’कर्म’ नाम के बारीक मैटर से सना रहता है। वह हर समय जीव से चिपटा रहता है। कर्म जीव पर रूप, रंग, रस और गन्ध की विशिष्ट छाप लगाते हैं, जिसे ’’लेश्या’’ (लेस्सा) कहते हैं। इनके पृथक् होना अर्थात् पुद्गल से अलग होना, कर्म के बन्धन को तोड़ना है। कर्म के बन्धन को तोड़ने का अर्थ है- जन्म-मरण और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होना। इसी का नाम ’’मोक्ष’’ है।

बन्ध और मुक्ति-

बन्ध के मुख्य कारण हैं- राग और द्वेष। इनसे ही चार कषायों -क्रोध, मान, माया और लोभ का उदय और विकास होता है। राग और द्वेष जीव में आसक्ति या कामना का दुर्भाव पैदा करते हैं। इससे जीवन अपना विवके खो बैठता है और दुनिया में भटकता रहता है। वह राग और द्वेष से उत्पन्न कषायों -हिंसा, झूठ, चोरी, लोभ आदि का आश्रय लेता है। जैनागमन में ’’कर्म’’ क्रिया को नहीं कहते है बल्कि ’पुद्गल परमाणुओं’ को कहते हैं। पुद्गल परमाणुओं का बहना या बनना ’आश्रव’’ कहलाता है।

यही आश्रव व्यक्ति के कर्मबन्ध का कारण होता है। वह हिंसा आदि को सत्य और पाने योग्य समझकर ज्योंही तद्नुसार आचरण करता है, तो कर्मों के बन्धनों से बँध जाता है। इसी को ’’बन्ध’’ कहते हैं। इसी प्रकार ’आश्रव’ और ’बन्ध’ पुनर्जन्म के मुख्य कारण हैं। राग और द्वेष केवल दुःख ही पैदा नहीं करते अपितु सुख भी पैदा करते हैं। जो कर्म दुःख के कारण होते हैं, उन्हें पाप कहा जाता है और सुख के कारण होते हैं। उन्हें पुण्य कहा जाता है। पाप और पुण्य- दोनों का जन्म आसक्ति के कारण होता है। पुण्य बन्ध से जीव का जो शरीर बनता है वह पाप बन्ध से बनने वाले शरीर से भिन्न किस्म का होता है। पाप बन्ध की अवस्था में जीव पूर्णरूप से कषायग्रस्त हो जाता है। परन्तु पुण्य बन्ध की अवस्था में कषाय जीव की विवके शक्ति को पूरी तरह से दबा नहीं पाते। इसलिए पुण्य बन्ध की अवस्था में जीवन में यह विवेक बना रहता है कि क्या चीज ग्रहण करने योग्य है और क्या चीज छोड़ने योग्य है। इस प्रकार की जिज्ञासा का उदय ही राग-द्वेष पर रोक लगाता है। इस रोक को ’’संवर’’ कहते हैं।

इस संवर के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे संचित कर्म कटते या नष्ट हो जाते हैं। कर्म-नाश की इस प्रक्रिया को ’’निर्जरा’’ कहते हैं। पूर्ण निर्जरा की स्थिति का ही दूसरा नाम मुक्ति है।

निर्वाण-

राग-द्वेष या असक्ति के बन्धन से मुक्ति ही मोक्ष है। मोक्ष का ही दूसरा नाम निर्वाण है। निर्वाण जैन धर्म का चरम लक्ष्य है। इसके लिए कर्म-फल से मुक्ति आवश्यक है। निर्वाण की अवस्था में मनुष्य सभी प्रकार की कामनाओं से मुक्त हो जाता है। उसे अनन्त शान्ति मिल जाती है। निर्वाण का अर्थ अस्तित्व की समाप्ति नहीं है। इसका अभिप्राय जीव के भौतिक अंश के विनाश से है। जीव का अत्मिक तत्त्व कभी समाप्त नहीं होता है। निर्वाण का अर्थ शून्यता, अकर्मण्यता अथवा निष्क्रियता भी नहीं है। निर्वाण प्राप्त व्यक्ति भी विशुद्ध रूप से देख-सुन सकता है। निर्वाण प्राप्ति के लिए एक निश्चित कार्यक्रम या आचार संहिता बनाई गई है, जिसका पालना करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है। इस आचार संहिता के तीन अंग हैं - सम्यक् दर्शन, सम्यक ज्ञान, और सम्यक चरित्र। इसे ’’त्रिरत्न’’ कहा जाता है।

त्रिरत्न-

सम्यक् दर्शन- सम्यक् दर्शन का अर्थ है सही विश्वास या श्रद्धा। जैन धर्म (Jainism) के अनुसार ‘सत्’ में विश्वास रखना ही सम्यक् श्रद्धा है इसके आठ अंग हैं- 
(1) सन्देह को दूर करना, (2) सांसारिक सुखों की इच्छा को मिटाना, (3) आसक्ति-विरक्ति से बचना, (4) गलत रास्ते की तरफ न जाना, (5) अधकचरे विश्वासों से भ्रमित न होना, (6) सही विश्वास पर जमे रहना, (7) सभी के लिए समान प्रेम रखना, (8) जैन सिद्धान्तों में पूर्ण आस्था तथा विश्वास रखना। इसके लिए तीन प्रकार की मूर्खताओं से बचना जरूरी है-
(1) लोक- अन्धविश्वास, (2) देवी-देवताओं के पूजन से पुण्य प्राप्ति की आशा, और (3) छली-कपटी साधु-सन्तों के बहकावे में आना।

सम्यक् ज्ञान- 

सम्यक् ज्ञान का अर्थ है सही विचार। अर्थात् सत् और असत् का भेद समझ लेना। जैन धर्म के अनुसार ज्ञान पॉच प्रकार का होता है- 
(1) मति ज्ञान- जो इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होता है जैसे नाक के द्वारा गन्ध ज्ञान। (2) श्रुतिज्ञान- वह ज्ञान जो सुनकर अथवा वर्णन के द्वारा प्राप्त होता है। इसे शास्त्र-ज्ञान भी कहते है। (3) अवधिज्ञान- दूर देश और काल का ज्ञान। (4) मनःपर्याय- अन्य व्यक्तियों के भावों और विचारों को जान लेने वाला ज्ञान और (5) केवल ज्ञान- देश काल की सीमाओं से परे का सम्पूर्ण ज्ञान। यह पूर्ण ज्ञान है, जो निग्रन्थों को प्राप्त होता है। जीव में पूर्ण ज्ञान रहता है परन्तु भौतिक आवरण के कारण वह छिप जाता है। भौतिक तत्व का नाश होते ही जीव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह “निग्रन्थ” हो जाता है।

सम्यक् चरित्र-सम्यक् चरित्र का अर्थ है सही काम अथवा आचरण। इन्द्रियों जीव के बाह्य उपकरण हैं। और इनकी सहायता से वह बाह्य जगत् की जानकारी प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए ऑख हटा लेगा। अर्थात् सुन्दर दृश्य में उसकी आसक्ति है। परन्तु जो जीव सुन्दर-असुन्दर के भेद के प्रति उदासीन होकर अनासक्त हो जाता है, उसके लिए सभी दृश्य एक समान हो जाते है। इसी को सम्यक् आचरण करते हैं। जैन धर्म के अनुसार बाह्य जगत् के विषयों के प्रति सम दुःख-सुख भाव से उदासीनता ही सम्यक् आचरण है और इसी को सम्यक् चरित्र कहते है।

जैन धर्म (Jainism) के अनुसार पूर्व जन्म के कर्म-फल को नष्ट करने तथा इस जन्म के कर्म-फल से बचने के लिए त्रिरत्नों का पालन करना अति आवश्यक है। इसी से मनुष्य ‘निर्वाण’ की ओर अग्रसर हो सकता है।

पाँच अणुव्रत-  जैन धर्म में चरित्र-निर्माण के लिए दस भाव धर्म की व्यवस्था है। ये दस भाव हैं- क्षमा, मार्दव (कोमलता), आर्जव (सरलता), सत्य, शौच (पवित्रता), संयम, तप, त्याग (दान) अंकिचन्य (परिग्रह त्याग) और ब्रह्मचर्य। इस दस भावों का संक्षेप पॉच भावों में भी किया गया है- अंहिसा (क्षमा, मार्दव और आर्जव), सत्य, अचौर्य (शोच), ब्रह्मचर्य (संयम और तप) और अपरिग्रह (त्याग और किंचनता)। गृहस्थ दशा में इनका पूरा अभ्यास नहीं हो सकता, इसलिए उनका पालन अणुव्रतों के रूप में किया जाता है। साधु दशा में इनका आचरण व्यापक हो जाता है, तब वे महाव्रत बन जाते हैं। अर्थात् गृहस्थियों के लिए अणुव्रत और साधुओं के लिए ’’महाव्रत’’।

अहिंसा- 

अहिंसा महावीर स्वामी की शिक्षा और जैन धर्म के सिद्धान्तों का मूल मंत्र है। अहिंसा का अर्थ प्राणिमात्र के प्रति दया, समानता और उपकार की भावना से है। मन, वचन और कर्म से किसी के प्रति अहित की भावन न रखना ही वास्तविक अहिंसा है। सर्व जीवों के के प्रति संयमपूर्ण जीवन-व्यवहार ही अहिंसा है। परन्तु सांसारिक मनुष्यों के लिए पूर्ण अहिंसाव्रत धारण करना कठिन है। इसलिए गृहस्थों के लिए ’’स्थूल अहिंसा’’ का विधान किया गया है। ’’स्थूल अहिंसा’’ का अर्थ है- निरपराधियों की हिंसा न करना।

सत्य-

अहिंसा के साथ-साथ महावीर स्वामी ने सत्य वचन पर भी बहुत जोर दिया, क्योंकि बिना सत्य भाषण के अहिंसा का पालन करना सम्भव नहीं है। अतः महावीर स्वामी का उपदेश था कि प्रत्येक मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में सत्य बोलना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य को झूठ से बचना चाहिए और सच्चाई के साथ रहना चाहिए।

अस्तेय-

अस्तेय का अर्थ है -चोरी न करना। महावीर स्वामी ने चोरी को महान् अनैतिक कार्य बताया तथा इस दुर्गुण से हमेशा दूर रहने की शिक्षा दी। इसका व्यापक अर्थ है, दूसरों की चीज अथवा हक न लेना।

अपरिग्रह-

अपरिग्रह का अर्थ है - संग्रह न करना। महावीर के अनुसार जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का संग्रह नहीं रखता, वह संसार के माया जाल से दूर रहता है। इसका व्यापक अर्थ है- वस्तुओं और पदार्थों का संग्रह न करना, सम्पत्ति न जुटाना और जो कुछ भी अपने पास हो उसे दूसरों के आराम के लिए प्रस्तु करना।

ब्रह्मचर्य-

उपर्युक्त चारों का पालन तब तक नहीं हो सकता जब तक कि मनुष्य विषय-वासनाओं से दूर नहीं रहता। इसलिए महावीर ने पार्श्वनाथ के इन चार व्रतों में पाँचवा व्रत जोड़कर इन्हें त्रिरत्नों की प्राप्ति के साधन बताये। ब्रह्मचर्य का एक अर्थ शरीर की अपवित्रताओं को दूर करना भी है।

सात शील व्रत-

जैन धर्म के अनुसार पाँच व्रतों के साथ-साथ व्रतों का पालन करना भी जरूरी है। ये इस प्रकार हैं - 
1. दिग्व्रत- अपनी क्रिया को कुछ विशिष्ट दिशाओं में सीमत करना। 2. देशव्रत- अपना कार्य कुछ विशिष्ट देशों तक सीमित रखना। 3. अनर्थ दण्डव्रत- बिना कारण अपराध का भागी न बनना। 4.  सामयिक- अपने ऊपर विचार करने के लिए समय का कुछ भाग निश्चित करना। 5. प्रोषधोपवास- मास के दोनों पक्षों की अष्टमियों और चतुर्दशियों को उपवास करना। 6. उपभोग-प्रतिभोग परिमाण- दैनिक उपभोग की वस्तुओं और पदार्थों को नियमित करना। 7. अतिथि-संविभाग- घर आये साधु या उपासक को भोजन कराने के बाद भोजन करना। जैन धर्म के गृहस्थ अनुनायायियों के लिए इन शील व्रतों का पालन करना आवश्यक था।

पाँच समिति-

जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में पाँच बातों की सतर्कता बरतनी चाहिए-
1. ईर्या समिति- चलते फिरते समय सावधानी रखना ताकि किसी जीव को कष्ट न पहुँचे। 2. भाषा समति- सावधानी से बोलना ताकि किसी मानव को ठेस न पहुँचे। 3. एषणा-समिति- खाना खाते समय सावधानी बरतना, ताकि कोई जीव मर न जाये। 4. आदान निक्षेप समिति- वस्तुओं को उठाते, रखते और प्रयोग करते समय सावधानी रखना जिससे दूसरे को कष्ट न पहुँचे। 5. उत्सर्ग समिति- लघुशंका और दीर्घशंका से निपटते समय सावधानी रखना तथा गन्दी न फैलाना। इन बातों का दैनिक जीवन में प्रयोग करने पर बहुत जोर दिया गया है। ये सभी बातें अहिंसा से ही सम्बन्धित हैं।

अनेकान्तवाद अथवा स्याद्वाद-

जैन धर्म का जो दर्शन है उसके अनुसार वस्तु के अनन्त स्वरूप हैं। केवल ज्ञानी अथवा जीवनमुक्त या अर्हत् ही उन स्वरूपों की अनन्तता को जानते हैं। शेष लोग तो उसके कुछ स्वरूपों को ही जानते हैं। ज्ञान की यह विभिन्नता सात प्रकार की हो सकती है- 
1. है। 2. नहीं है। 3. है और नहीं है। 4. कहा नहीं जा सकता। 5. है, किन्तु कहा नहीं जा सकता। 6. नहीं है और कहा नहीं जा सकता। 7. है और नहीं, किन्तु कहा नहीं जा सकता। जैन धर्म में इसे अनेकान्तवाद, स्याद्वाद अथवा सप्त भंगी का सिद्धान्त कहते हैं।

तपस्या और उपवास-

महावीर ने आत्मा को वश में करने तथा पाँच आचरणों का पालन करने के प्रयत्न में तपस्या और उपवास पर अधिक बल दिया। उन्होंने दो प्रकार की तपस्या बतलाई- एक बाह्य और दूसरी आन्तरिक। बाह्य तपस्या में व्रत, अन्नत्याग, भिक्षाचार्य तथा कष्ट सहन करना मुख्य हैं। आन्तरिक तपस्या में नम्रता, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान तथा शरीर त्याग सम्मिलित हैं। बाह्य तपस्या करने से व्यक्ति में आन्तरिक तपस्या करने की क्षमता आती है। और उससे आदमी में अच्छे विचारां का विकास होता है। महावीर स्वामी ने तपस्या का सबसे सरल उपाय उपवास बताया है। इससे शरीर एवं आत्मा शुद्ध होती है और मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है।

इसके अलावा महावीर स्वामी ने उस युग में प्रचलित धार्मिक और सामिजिक बुराइयों के सम्बन्ध में कई बातें बताई थीं, जोकि निम्नवत् हैं-

1. वेदों को मान्यता नहीं - महावीर ने सैद्धान्तिक दृष्टि से ब्राह्मण धर्म के वेदवाद, यज्ञवाद और कर्मकाण्ड का विरोध किया। उनका कहना था कि यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि वैदिक प्रान ही एकमात्र पूर्ण और निर्विवाद है। अतः महावीर स्वामी ने वेद-प्रमाण्य को अस्वीकृत कर दिया। उसके अनुसार वेद ईश्वरीय कृति न होकर मानव कृति थे। इसलिए उन्होंने वैदिक यज्ञों तथा कर्मकाण्डों का घोर विरोध किया तथा जीवन में नैतिकता ओर अच्छे नियमों के पालन पर जोर दिया।

2. ईश्वर सम्बन्धी विचार- जैन धर्म का ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास था या नहीं, इस विषय पर विद्वानों में काफी समय तक मतभेद बना रहा। परन्तु अब यह निश्चित हो गया कि जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं करता। वह ईश्वर को इस सृष्टि का निर्माता नहीं मानता। उसके अनुसार संसार वास्तविक है और इसका कभी भी मूलतः विनाश नहीं होता। 

संसार 6 द्रव्यों का समुदाय है। ये द्रव्य हैं-जीवन, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश  और काल। ये सभी द्रव्य शाश्वत हैं, नित्य हैं और अनश्वर हैं। अतः यह सृष्टि भी अनादि और अनन्त है। उपर्युक्त द्रव्यों में जो उत्पाद-व्यय होता है, इनका जो संगठन-विघटन होता है, उसी के कारण इनसे निर्मित पदार्थों का रूप-परिवर्तन होता रहता है। इसमें ईश्वर की सहायता अथवा हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ती। महावीर स्वामी का विचार था कि मनुष्य की आत्मा में जो कुछ महान् है और शक्ति और नैतिकता है, वही भगवान् है।

3. आत्मावाद- ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास न रखते हुए भी जैन धर्म में अनात्मवादी नहीं है। महावीर स्वामी आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे। उनके अनुसार प्रकृति में परिवर्तक हो सकते हैं। किन्तु आत्मा अजर-अमर है और सदैव एक-सी बनी रहती है। वे जीव को ही आत्मा मानते हैं और उसके अनुसार जीव कवल मनुष्य कह सकते हैं।
डॉ0 राधाकृष्णन ने कहा है कि ’’ईश्वर मनुष्य की आत्मा में अन्तनिर्हित शक्तियों का उच्चतम श्रेष्ठतम और पूर्णतम व्यक्तीकरण मात्र है।''

4. पुनर्जन्म और कर्मवाद- जैन धर्म ईश्वर में विश्वास नहीं करता। वह मनुष्य को स्वयं अपना भाग्य विधाता मानता है। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्नति अवनति स्वयं उसके कर्मों पर निर्भर करती हैं इस दृष्टि से जैन धर्म कर्म की प्रधानता को स्वीकार करता है। उसका विश्वास है कि पूर्व जन्म के कर्मों से ही इस बात का निर्णय होता है कि किस वंश में हमारा जन्म होगा और कैसा हमारा शरीर होगा। क्योंकि अपने सांसारिक एवं आध्यात्मिक जीवन में मनुष्य जो भी कर्म करता है, उसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। मनुष्य के समस्त सुख-दुख का कारण उसके अपने कर्म ही हैं।

मनुष्य के कर्मों के कारण पैदा होने वाली सांसारिक वासना के बन्धनों से आत्मा का बार-बार आवागमन होता रहता है और जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। किए हुए कर्मों का फल भोगे बिना जीव का छुटकारा नहीं हो सकता। इस प्रकार कर्म ही पुनर्जन्म का कारण है। इसलिए महावीर स्वामी का कथन है कि यदि वासनाओं पर विजय कर ली जाये तो कर्मों क बन्धन नष्ट हो सकेंगे और कर्म फल से विमुक्ति ही निर्वाण-प्राप्ति का साधन है। उनका उपदेश था, ’’मनुष्य अपने पूर्व जन्म के कर्म फल का नाश करें और इस जन्म में किसी प्रकार का कर्म-फल संगृहीत न करें।’’ ऐसा करने से मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जायेगी।

5. सामाजिक समानता- जैन धर्म मुख्यतः सामाजिक समानत के सिद्धान्त पर आधारित था। महावीर ने ब्राह्मणों की वर्ण-व्यवस्था का घोर विरोध किया था और बिना किसी भेद-भाव के अपने धर्म का द्वारा सभी वर्णों के लिए खोल दिया था। उनकी मान्यता थी कि सभी देहधारियों की आत्मा एक-सी है। मोक्ष प्राप्ति के लिए किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं किया जा सकता है। इसका मुख्य आधार यह था कि चूंकि निर्वाण पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त था, और पुरुषार्थ कोई भी व्यक्ति कर सकता था, इसलिए भेद-भाव की आवश्यता नहीं होनी चाहिए। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि महावीर स्वामी के बाद उनके अनुयायी उनके इस सिद्धान्त को पूर्णतः व्यवहार में न लागू कर सके और उनमें जाति-भेद के संस्कार विद्यमान रहे। यही कारण है कि जैन धर्म शूद्रों को न अपना सका।

6. नारी स्वातन्त्र्य- पार्श्वनाथ ने नारियों को भी निर्वाण-प्राप्ति की अधिकारिणी माना था। महावीर स्वामी ने भी उनके विचारों का अनुसरण किया। उन्होंने भी अपने धर्म तथा संघ के द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिये थे। परिणामस्वरूप अनेक स्त्रियों ने भी जैन धर्म की दीक्षा ली। पुरुषों की भॉति स्त्रियों के भी दो वर्ग थे- एक श्रमणियों का और दूसरा श्राविकाओं का।

जैन धर्म का इतिहास


धन्यवाद् दोस्तों, अगले अंक में हम जैन धर्म में विभाजन एवं जैन धर्म की भारतीय संस्कृति योगदान के बारे में प्रकाश डालेंगे।

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