Saturday, December 21, 2019

बौद्ध धर्म (Buddhism)

 बौद्ध धर्म (Buddhism)

Buddhism- Mahatma Gautam Buddha

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारतीय समाज में प्रचलित यज्ञवाद, वेदवाद बहुवेदवाद, रूढिवादिता, आडम्बरयुक्त धार्मिक कर्मकाण्डों, ब्राह्मणों के नैतिक पतन और समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध आवाज बुलन्द करने वाले दूसरे महापुरुष महात्मा बुद्ध हुए थे।

महावीर स्वामी की भाँति महात्मा बुद्ध ने भी राजसी जीवन एवं सुखी दाम्पत्य जीवन को त्याग कर सत्य की खोज में घोर कष्टों एवं कठिनाइयों का सामना किया। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने ब्राह्मणों के यज्ञों, हवन तथा तीर्थों की निस्सारता का प्रचार करते हुए शील आचरण की शुद्धता, सत्य, धर्म, संयम, ब्राह्यचर्य आदि की महत्ता पर जोर दिया।

महात्मा बुद्ध ने मानव मात्र को बहुसंख्यक देवी-देवताओं की आधीनता मुक्त कराने का प्रयास किया और कहा कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य निर्माता है। उन्होंने वर्ण-भेद एवं जाति-भेद को निरर्थक बताया। उन्होंने दुखी मानवता को जीवन का सही और सरल मार्ग बतलाया बौद्ध धर्म  (Buddhism) के नाम से विख्यात हुआ।

Buddhism- Mahatma Gautam Buddha
महात्मा गौतम बुद्ध का जन्म

बौद्ध धर्म  (Buddhism) के संस्थापक गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य कुल में हुआ था, इसलिए उन्हें, शाक्य मुनि भी कहा जाता है। उनके पिता शुद्धोदन शाक्य गणराज्य के प्रधान थे। शाक्यों का गणराज्य उत्तरी-पूर्वी सीमा पर हिमालय की तराई में स्थित था तथा कपिलवस्तु इस गणराज्य की राजधानी थी। कपिलवस्तु एवं देवदह में मध्य नेपाल राज्य की तराई में आज के नौतनवां स्टेशन में 8 मील पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान है। वहॉ उस युग में लुम्बिनी नामक वन था।

बौद्ध सूत्रों के अनुसार ईसा से 563 वर्ष पूर्व कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन की महारानी माया देवी अपने पिता के घर आ रही थी कि रास्ते में लुम्बिनी वन में वैशाख मास की पूर्णिमा को उसने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम सिद्धार्थ रखा गया।

सिद्धार्थ के जन्म के एक सप्ताह पश्चात् ही उसकी माता का स्वर्गवास हो गया। इसलिए सिद्धार्थ का पालन पोषण उसकी मौसी एवं विमाजा प्रजापती (गौमती) ने किया। बाल्यावस्था से ही सिद्धार्थ विचारवान, करुणावान एवं एकान्तप्रिय थे। संसार के लोगों को कष्टों में देखकर उनका हृदय दया से भर जाता था।

सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन ने उन्हें संसारी बनाने के लिए सभी प्रकार की क्षत्रियोचित शिक्षा-दीक्षा दिलवाई तथा उन्हें विलासिता की हर प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराई, फिर भी सिद्धार्थ का मन सांसारिक बातों में नहीं लग सका। वे सदैव इन बातों की ओर उदासीन रहते थे तथा एकान्त में उदास बैठे रहते थे। पुत्र की ऐसी मनोवृत्ति देखकर पिता शुद्धोदन ने सोलह वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह दण्डपाणि की सर्वगुण सम्पन्न एवं रूपलावण्यमयी राजकुमारी यशोधरा के साथ कर दिया। साथ ही अपने पुत्र को सांसारिक प्रवृत्तियों में लगाने के लिए प्रत्येक मौसम के अनुकूल अलग-अलग प्रासाद बनवा दिये तथा प्रत्येक प्रासाद में विभिन्न ऋतुओं के अनुरूप सभी प्रकार के ऐश्वर्य और भोग-विलास की सामग्री भी उपलब्ध करवा दी।

शुद्धोदन को आशा थी कि इससे सिद्धार्थ का मन सांसारिक सुखों में लग जायेगा। परन्तु इस वैभव और विलास के बीच भी सिद्धार्थ के मन में जीवन की सुख-दुःख की समस्याओं के लेकर निरन्तर द्वन्द्व चलता रहता था।

लगभग 12-13 वर्ष तक सामान्य गृहस्थ जीवन का सुख भोग लेने पर भी सिद्धार्थ का मन सांसारिक प्रवृत्तियों में नहीं लग सका। अपने गृहस्थ जीवन में सिद्धार्थ के राहुल नामक एक पुत्र भी हुआ, फिर भी सिद्धार्थ का वैरागी मन संसार में नहीं लगा।

इसी वैराग्य भावना ने उन्हें तृष्णा की जंजीर को तोडने, अज्ञान का कोहरा दूर भगाने तथा अपनेपन की मिथ्या मति को मिटाने की प्रेरणा प्रदान की तथा एक रात्रि को अपने पुत्र, पत्नि और पिता तथा सम्पूर्ण राज्य वैभव को त्यागकर वे ज्ञान की खोज में निकल पड़े। उनके जीवन की इस घटना को बौद्ध धर्म एवं साहित्य में ‘महाभिनिष्क्रमण’ के नाम से पुकारा जाता है।

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महाभिनिष्क्रमण की रात्रि

‘महाभिनिष्क्रमण’ की रात्रि में सिद्धार्थ अपने घोडे पर 30 योजन दूर निकल गये और गोरखपुर के समीप अनोमा नदी के तट पर उन्होंने अपने आभूषण तथा राजसी वस्त्र उतार दिये और तलवार से अपना जूडा काट कर संन्यास ले लिया। उस समय उनकी आयु 29 वर्ष की थी।

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सत्य और ज्ञान की खोज 

संन्यासी हो जाने के बाद बुद्ध तप तथा साधना में लीन हो गये। सबसे पहले वे वैशाली के ‘‘आलारकालाम’’ नामक एक तपस्वी के पास ज्ञानार्जन हेतु गये किन्तु वहाँ उनकी ज्ञान-पिपासा शान्त नहीं हो पाई। इसके बाद वे राजगृह के ही एक अन्य ब्राह्मण ‘‘उद्रक रामपुत्त’’ के पास गये। उपर्युक्त दोनों गुरुओं से सिद्धार्थ ने योग साधना और समाधिस्थ होना सीखा। परन्तु इससे उन्हें संतोष नहीं मिला।

यहाँ से वे अरूवेला की सुरम्य वनस्थली में आये और तपस्या में लीन हो गये। यहाँ उन्हें कौण्डिन्य आदि पाँच ब्राह्मण साधक संन्यासी भी मिल गये। अपने इन ब्राह्मण साथियों के साथ वे उरूवेला में कठोर तपस्या करने लगे। सिद्धार्थ ने पहले तो तिल और चावल खाकर तप किया परन्तु बाद में उन्होंने आहार का सर्वथा त्याग कर दिया, जिससे उनका शरीर सूखकर काँटा बन गया। तप करते-करते सिद्धार्थ को 6 वर्ष बीत गये पर साधना में सफलता न मिली।
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महात्मा गौतम बुद्ध 

ऐसा बताया जाता है कि एक दिन नगर की कुछ स्त्रियाँ गीत गाती हुई उस ओर से निकली, जहाँ सिद्धार्थ तपस्यारत थे। उनके कान में स्त्रियांं का एक गीत पडा, जिसका भावार्थ इस प्रकार था -
’’वीणा के तारों को ढ़ीला मत छोड़ा। ढ़ीला छोड़ देने से उनसे सुरीला स्वर न निकलेगा, परन्तु तारों को इतना कसो भी मत जिससे वे टूट जाये।’’

सिद्धार्थ के हृदय ने गीत के भावों को ग्रहण किया। उन्होंने स्वीकार किया कि नियमित आहार-विहार से ही योग साधना सिद्ध हो सकती है। किसी भी बात की अति करना ठीक नहीं है। वास्तव में मनुश्य को मध्यम मार्ग ही अपनाना चाहिए।

अतः उन्होंने आहार करना शुरु कर दिया। गौतम में यह परिवर्तन देखकर उनके पाँचों ब्राह्मण साथी उन्हें पथ भ्रष्ट सझकर उनका साथ छोड़कर सारनाथ चले गये। किन्तु इससे गौतम विचलित नहीं हुए और उन्होंने ध्यान लगाने का निश्चय किया। वे वहीं एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान की अवस्था में बैठ गये। 

सात दिन तक ध्यान-मग्न रहने के पश्चात् वैसाख पूर्णिमा की रात को जब सिद्धार्थ ध्यान लगाने बैठे तो उन्हें ’’बोध’’ (आन्तरिक ज्ञान) हुआ। उन्हें साक्षात् सत्य का दर्शन मिला। तभी से वे ’’बुद्ध’’ नाम से विख्यात हुए। उस समय उनकी आयु 35 वर्ष की थी। जिस वृक्ष के नीचे उन्हें बोध प्राप्त हुआ था, उसका नाम ’’बोधिवृक्ष’’ पड़ा और जिस स्थान पर यह घटना घटी उसका नाम ’’बोधगया’’ हो गया। इस घटना के बाद भी महात्मा बुद्ध चार सप्ताह तक उसी बोधिवृक्ष के नीचे रहे और धर्म के स्वरूप का चिन्तन करते रहे।

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सत्य और ज्ञान की प्राप्ति प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध का ज्ञान का प्रचार

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् सबसे पहले ’’बोध गया’’ में ही बुद्ध ने अपने ज्ञान उपदेश तपस्यु और मल्लिक नाम दो बनजारों को दिया था। इसके बाद बुद्ध अपने ज्ञान एवं विचारों को जनसाधारण तक पहुँचाने के उद्देश्य से वहाँ से निकल पड़े और सारनाथ पहुँचे। यहाँ उन्हें वे पाँचों ब्राह्मण साथी मिल गये जो उन्हें छोड़कर चले आये थे।

बुद्ध ने उन्हें अपने ज्ञान की, धर्म के रूप में दीक्षा दी। यह घटना बौद्ध धर्म के इतिहास में ’’धर्म -चक्र-परिवर्तन’’ के नाम से महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। यहाँ से महात्मा बुद्ध काशी गये और वहाँ अपने ज्ञान का प्रचार करने लगे। कुछ ही समय में बुद्ध के शिष्यों की संख्या 60 हो गई। तब उन्होंने एक संघ की स्थापना की, जिसकी सहायता से लगभग 45 वर्ष तक बुद्ध ने अपने धर्म का प्रचार किया


बुद्ध ने अपने उपदेशों में  साधारण बोलचाल की भाषा को अपनाया तथा जाति-पाँति और ऊँच-नीच की भावना से दूर रहते हुए सभी को उपदेश दिया। कोसल के राजा प्रसेनजित तथा मगध के बिम्बिसार और अजातशत्रु, वैशाली की सुप्रसिद्ध गणिका आम्रपाली, स्वयं बुद्ध के पिता शुद्धोदन और पुत्र राहुल ने भी उनके धर्म को स्वीकार कर लिया। अपने प्रिय शिष्य आनन्द के विशेष आग्रह पर उन्होंने स्त्रियों को भी बौद्धधर्म की दीक्षा देना स्वीकार कर लिया। अन्त में 80 वर्ष की आयु में गोरखपुर के समीप कुशीनगर (कुशीनारा) नाम स्थान पर गौतम बुद्ध ने अपना शरीर त्याग दिया।

बुद्ध के शरीर त्यागने की घटना को बौद्ध लोग ’’महापरिनिर्वाण’’ कहते हैं। उनका अन्तिम उपदेश- ’’हे भिक्षुओं, तुम आत्मदीप बन विचरो। तुम अनी ही शरण में जाओ। किसी अन्य का सहारा मत ढूंढो। केवल धर्म को अपना दीपक बनाओ। केवल धर्म की शरण में जाओ।’’

Buddhism- Mahatma Gautam Buddha
बौद्ध धर्म का प्रमुख साहित्य

बौद्ध धर्म का साहित्य सामूहिक रूप से ’’त्रिपिटक’’ कहा जाता है। उनके नाम इस प्रकार हैं - 1. सुत्तपिटक 2. विनयपिटक 3. अभिधम्मपिटक। सुत्तपिटक के पाँच विभाग हैं - 1. दीर्घ निकाय 2. मज्झिम निकाय 3. संयुक्त निकाय 4. अंगुत्तर निकाय 5. खुद्दक निकाय।

इनमें बौद्ध धर्म  के विभिन्न अंगों, विश्व की उत्पत्ति, जाति व्यवस्था की कृत्रिमता, निर्वाह प्राप्ति के साधन, पुनर्जन्म, आत्मज्ञान, आत्मचिन्तन आदि विषयों का विवेचन है। विनयपिटक में भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम हैं। अभिधम्मपिटक में गौतम बुद्ध के उपदेशों का विवेचन है। यह सात अध्यायों में विभक्त है। इन त्रिपिटकों की अनेक टीकाएँ तथा व्याख्याएँ हैं, जिनमें बौद्ध विद्वानों ने बौद्ध धर्म के नैतिक नियमों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की है।

’’धम्पपद’ नाम एक ग्रन्थ जिसे बौद्ध धर्म की गीता कहा जा सकता है। इसमें 424 गाथाएँ हैं , जिनमें बौद्ध धर्म का सार है। जातक कथाओं का एक संग्रह है, जिसमें बुद्ध की 574 पूर्व जन्म की कथाओं का वर्णन है। बौद्ध धर्म का अधिकांश साहित्य पालि भाषा में है। बौद्ध विद्वानों ने संस्कृत भाषा में भी अनेक रचनाएँ लिखीं, परन्तु संस्कृत साहित्य के केवल थोड़े से अंश उपलब्ध हैं। 

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