Tuesday, December 31, 2019

Bauddha Dharm Ki Lokapriyata Ke Karan

बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारण

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बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों का आविर्भाव उत्तरी भारत में ही हुआ था, किन्तु महात्मा बुद्ध और उनके अनुयायियों के प्रयत्नों से बहुत कम समय में बौद्ध धर्म का प्रसार भारत और विदेशों में हो गया। इस धर्म के शीघ्र लोकप्रिय बन जाने के कई कारण थे, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं -

सरल सिद्धान्त-

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त सरल, व्यावहारिक, सुबोध एवं गृहस्थ लोगों के अनुकूल थे। बुद्ध ने अपने दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन न कर शुद्ध आचरण पर अधिक जोर दिया था। वस्तुतः उनके सिद्धान्त नैतिक जीवन व्यतीत करने की रीति-नीति को स्पष्ट करते थे। ऐसी स्थिति में जनता का गूढ़ रहस्यवादी तथा जटिल वैदिक धर्म से हटकर इस धर्म की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही था।

अनुकूल वातावरण-

बौद्ध धर्म का उदय उस समय में हुआ था, जब भारतीय जनता प्रचलित धर्म की रूढ़िवादिता, कर्मकाण्ड, रहस्यवाद और उनके पुजारी-पुरोहितों के आचरण में क्षुब्ध थी। ऐसे समय में गौतम बुद्ध ने प्रचलित व्यवस्था का खण्डन कर जीवन को उन्नत करने के लिए सरल एवं व्यावहारिक तरीकों को बताया, जिनका जनता ने हृदय से स्वागत किया। यदि बुद्ध वैदिक युग में हुए होते तो उनके विचारों को शायद ही लोकप्रियता मिल पाती।

जन-भाषा का प्रयोग-

महात्मा बुद्ध ने अपेन उपदेशों का प्रचार उसयुग की जन-भाषा पालि में किया था। अतः जनसाधारण उनकी बात को आसानी से समझ लेता था। ऐसी स्थिति में जनता पर उनके उपदेशों का प्रभाव पड़ना  स्वाभाविक था। बौद्ध धर्म का प्रारम्भिक साहित्य भी जन भाषा में ही लिखा गया था। इस कारण महात्मा बुद्ध के उपदेश शीघ्र ही जनप्रिय हो गये और उनक अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई।


समानता की भावना- 

जातिगत् भेदभाव से ऊपर उठकर सबको समान रूप से मोक्ष का अधिकारी मानना बौद्ध धर्म की सफलता का एक मुख्य कारण था। क्योंकि वैदिक व्यवस्था की जटिलता से निम्न जातियों को तो मोक्ष की आशा नहीं थी। और अन्य जातियों के निर्धन लोग भी मोक्ष पर विचार नहीं कर सकते थे। याज्ञिक-अनुष्ठानों को सम्पन्न कराने के लिए आवश्यक धन उनके पास नहीं था। ऐसे समय में जब बुद्ध ने जातीय समानता तथा मानव मात्र के लिए मोक्ष का द्वारा उन्मुक्त होने की घोषणा की तो हजारों लोग उनके अनुयायी बन गये क्योंकि सभी को अपना परलोक सुधारने की आकांक्षा थी।

सम्पन्न लोगों का संरक्षण-

बौद्ध धर्म के प्रसार से उस युग के शाक्य, लिच्छवी, मल्ल, कोलीय, मोरीय आदि गणराज्यों के सम्पन्न लोगों ने अत्यधिक रुचि ली थी। इसके साथ ही विद्वानों तथा व्यापारियों ने इसे अपनाया तथा तन, मन और धन से इसके प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया जिससे जन साधारण में बौद्ध धर्म तीव्र गति से फैला। बाद में समय में सम्राट अशोक, कनिष्क तथा हर्षवर्धन  ने इस धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसी स्थिति में अर्थात् प्रारम्भ और बाद के काल में राज्यश्रय और धनी वर्ग का सहयोग मिलने से बौद्ध धर्म का भारत और विदेशों में खूब प्रसार हो सका। अशोक का योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।


बौद्ध संघ- 

महात्मा बुद्ध ने जिस बौद्ध संघ प्रणाली को जन्म दिया था, वह अपने ढंग की अनूठी थी। उसके संघों की जीवन-प्रणाली जनतन्त्रात्मक होने के साथ-साथ संघीय भावना को लिए हुए थी। संघों में रहने वाले सभी भिक्षुगण एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बुद्ध के उपदेशों का प्रचार करते हुए संगठित रूप में त्याग, सदाचार, अध्यवसाय और अध्ययनशीलता के उत्तम गुणों का परिचय देते थे। साथ ही, वे प्रत्येक प्रकार की कठिनाई और आपत्ति का सामना करने को तत्पर रहते थे। ऐसी स्थिति में बौद्ध संघो की इस संगठन शक्ति का सामान्य जनता पर प्रभाव होना तथा इस धर्म के प्रति सम्मान बढ़ना स्वाभाविक था।

प्रतिस्पद्धी धर्मों का अभाव-

बौद्ध धर्म के शीघ्र और व्यापक प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण उस युग में उसका विरोध करने वाली धार्मिक विचारधाराओं अर्थात् धार्मिक सम्प्रदायों का भी अभाव था। वैदिक धर्म में प्रचार की प्रवृत्ति नहीं थी और उस युग में जनसाधारण को वैदिक धर्म से अरुचि होने लगी थी। जैन मत अधिक व्यापक नहीं हो पाया था और उसके सिद्धान्तों में शारीरिक क्लेश की प्रधानता के कारण भी वह अधिक लोकप्रिय नहीं बन पाया। ऐसी स्थिति में बौद्ध प्रचारकों को बिना विरोध के अपने धर्म का प्रचार करने में सफलता मिल गई।

बुद्ध का व्यक्तित्व- 

बौद्ध धर्म की लोकप्रियता तथा उसके दु्रतगामी प्रसार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण महात्मा बुद्ध का आकर्षक व्यक्तित्व था। उनकी रोमांचकारी जीवनी ने उनके व्यक्तित्व को एक विशेष स्तर प्रदान कर दिया था। राजा के पुत्र होते हुये भी सभी सुख-सुविधाओं के त्याग ने स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व को ऊँचा उठा दिया था। जनता स्वाभाविक रूप में उनके प्रति सम्मान से झुक जाती थी और विरोधी भी नतमस्तक हो जाते थे। इसके साथ ही गौतम ने कभी किसी धर्म का अनादर नहीं किया बल्कि तर्क के आधार पर प्रतिपक्षी धर्म का खण्डन करते थे। ऐसी स्थिति में जनता का उनके उपदेशों के प्रति श्रद्धावान होना स्वाभाविक था।

उपर्युक्त कारणों के अलावा बौद्ध धर्म की परिवर्तनशीलता ने भी इस धर्म के प्रसार में योगदान दिया। धर्म की कठोरता को त्याग कर इसमें उदारवादी महायान विचारधारा का जन्म हुआ जिसने बौद्ध धर्म के व्यापक प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसी के साथ बौद्ध शिक्षण संस्थाओं जैसे तक्षशिला, नालन्दा आदि द्वारा बौद्ध धर्म और साहित्य की समुचित शिक्षा व्यवस्था ने इस धर्म के भारत और विदेशों में प्रसार में भारी सहयोग दिया। इस प्रकार इन सभी कारणों से बौद्ध धर्म एक विश्व धर्म बन गया।

विदेशों में प्रसार- 

यद्यपि अपनी जन्मभूमि भारत में बौद्ध समय की गति के अनुसार उठता-गिरता रहा, किन्तु अपने जन्म के बाद से लेकर छठी शताब्दी ईसवी तक भिक्षुओं तथा कुछ भारतीय सम्राटों में प्रयत्नों से यह धर्म मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, जापान, बर्मा, दक्षिण-पूर्वी  एशिया तथा यूनान तक फैल गया।

बौद्ध धर्म के विदेशों  में प्रचार का कार्य विधिवत रूप में मौर्य सम्राट अशोक के काल में हुआ। अशोक ने इस धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका, बर्मा, मध्य एशिया तथा पश्चिमी एशिया आदि में अपने प्रचारक भेजे। अशोक के शिलालेखों से पता चलता है कि बौद्ध प्रचारकों ने सीरिया, मेसोपोटामिया तथा यूनान में मेसीडोनिया, एरिच तथा कोरिन्थ आदि राज्यों में जाकर इस धर्म को फैलाया। विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में इस धर्म की महायान शाखा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा और महायान विचारधारा के अनुयायी सम्राट कनिष्क के प्रयत्नों से मध्य एशिया, तिब्बत, चीन तथा जापान तक इस धर्म का खूब प्रचार हुआ। चीन में सम्राट मींगती के समय में बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। कई बौद्ध विद्वान चीन गये और उन्होंने चीनी भाषा में बौद्ध ग्रन्थों का अनुवाद किया। विद्वानों का कथन है कि चीन से बौद्ध धर्म कोरिया, मंगोलिया, फारमोसा तथा जापान में फैला। बौद्ध धर्म का इन देशों में जिस प्रभावशाली रूप से प्रसार हुआ, उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी जन्मभूमि से विलुप्त हो जाने पर भी इन देशों में से अधिकांश बौद्ध धर्म आज भी जीवित है।

 बौद्ध धर्म (Buddhism)

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त (Major Principles of Buddhism)

बौद्ध धर्म का विभाजन (bauddha dharm ka vibhaajan)



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