Tuesday, December 31, 2019

Bauddha Dharm Ki Lokapriyata Ke Karan

बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारण

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बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों का आविर्भाव उत्तरी भारत में ही हुआ था, किन्तु महात्मा बुद्ध और उनके अनुयायियों के प्रयत्नों से बहुत कम समय में बौद्ध धर्म का प्रसार भारत और विदेशों में हो गया। इस धर्म के शीघ्र लोकप्रिय बन जाने के कई कारण थे, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं -

सरल सिद्धान्त-

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त सरल, व्यावहारिक, सुबोध एवं गृहस्थ लोगों के अनुकूल थे। बुद्ध ने अपने दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन न कर शुद्ध आचरण पर अधिक जोर दिया था। वस्तुतः उनके सिद्धान्त नैतिक जीवन व्यतीत करने की रीति-नीति को स्पष्ट करते थे। ऐसी स्थिति में जनता का गूढ़ रहस्यवादी तथा जटिल वैदिक धर्म से हटकर इस धर्म की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही था।

अनुकूल वातावरण-

बौद्ध धर्म का उदय उस समय में हुआ था, जब भारतीय जनता प्रचलित धर्म की रूढ़िवादिता, कर्मकाण्ड, रहस्यवाद और उनके पुजारी-पुरोहितों के आचरण में क्षुब्ध थी। ऐसे समय में गौतम बुद्ध ने प्रचलित व्यवस्था का खण्डन कर जीवन को उन्नत करने के लिए सरल एवं व्यावहारिक तरीकों को बताया, जिनका जनता ने हृदय से स्वागत किया। यदि बुद्ध वैदिक युग में हुए होते तो उनके विचारों को शायद ही लोकप्रियता मिल पाती।

जन-भाषा का प्रयोग-

महात्मा बुद्ध ने अपेन उपदेशों का प्रचार उसयुग की जन-भाषा पालि में किया था। अतः जनसाधारण उनकी बात को आसानी से समझ लेता था। ऐसी स्थिति में जनता पर उनके उपदेशों का प्रभाव पड़ना  स्वाभाविक था। बौद्ध धर्म का प्रारम्भिक साहित्य भी जन भाषा में ही लिखा गया था। इस कारण महात्मा बुद्ध के उपदेश शीघ्र ही जनप्रिय हो गये और उनक अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई।


समानता की भावना- 

जातिगत् भेदभाव से ऊपर उठकर सबको समान रूप से मोक्ष का अधिकारी मानना बौद्ध धर्म की सफलता का एक मुख्य कारण था। क्योंकि वैदिक व्यवस्था की जटिलता से निम्न जातियों को तो मोक्ष की आशा नहीं थी। और अन्य जातियों के निर्धन लोग भी मोक्ष पर विचार नहीं कर सकते थे। याज्ञिक-अनुष्ठानों को सम्पन्न कराने के लिए आवश्यक धन उनके पास नहीं था। ऐसे समय में जब बुद्ध ने जातीय समानता तथा मानव मात्र के लिए मोक्ष का द्वारा उन्मुक्त होने की घोषणा की तो हजारों लोग उनके अनुयायी बन गये क्योंकि सभी को अपना परलोक सुधारने की आकांक्षा थी।

सम्पन्न लोगों का संरक्षण-

बौद्ध धर्म के प्रसार से उस युग के शाक्य, लिच्छवी, मल्ल, कोलीय, मोरीय आदि गणराज्यों के सम्पन्न लोगों ने अत्यधिक रुचि ली थी। इसके साथ ही विद्वानों तथा व्यापारियों ने इसे अपनाया तथा तन, मन और धन से इसके प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया जिससे जन साधारण में बौद्ध धर्म तीव्र गति से फैला। बाद में समय में सम्राट अशोक, कनिष्क तथा हर्षवर्धन  ने इस धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसी स्थिति में अर्थात् प्रारम्भ और बाद के काल में राज्यश्रय और धनी वर्ग का सहयोग मिलने से बौद्ध धर्म का भारत और विदेशों में खूब प्रसार हो सका। अशोक का योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।


बौद्ध संघ- 

महात्मा बुद्ध ने जिस बौद्ध संघ प्रणाली को जन्म दिया था, वह अपने ढंग की अनूठी थी। उसके संघों की जीवन-प्रणाली जनतन्त्रात्मक होने के साथ-साथ संघीय भावना को लिए हुए थी। संघों में रहने वाले सभी भिक्षुगण एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बुद्ध के उपदेशों का प्रचार करते हुए संगठित रूप में त्याग, सदाचार, अध्यवसाय और अध्ययनशीलता के उत्तम गुणों का परिचय देते थे। साथ ही, वे प्रत्येक प्रकार की कठिनाई और आपत्ति का सामना करने को तत्पर रहते थे। ऐसी स्थिति में बौद्ध संघो की इस संगठन शक्ति का सामान्य जनता पर प्रभाव होना तथा इस धर्म के प्रति सम्मान बढ़ना स्वाभाविक था।

प्रतिस्पद्धी धर्मों का अभाव-

बौद्ध धर्म के शीघ्र और व्यापक प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण उस युग में उसका विरोध करने वाली धार्मिक विचारधाराओं अर्थात् धार्मिक सम्प्रदायों का भी अभाव था। वैदिक धर्म में प्रचार की प्रवृत्ति नहीं थी और उस युग में जनसाधारण को वैदिक धर्म से अरुचि होने लगी थी। जैन मत अधिक व्यापक नहीं हो पाया था और उसके सिद्धान्तों में शारीरिक क्लेश की प्रधानता के कारण भी वह अधिक लोकप्रिय नहीं बन पाया। ऐसी स्थिति में बौद्ध प्रचारकों को बिना विरोध के अपने धर्म का प्रचार करने में सफलता मिल गई।

बुद्ध का व्यक्तित्व- 

बौद्ध धर्म की लोकप्रियता तथा उसके दु्रतगामी प्रसार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण महात्मा बुद्ध का आकर्षक व्यक्तित्व था। उनकी रोमांचकारी जीवनी ने उनके व्यक्तित्व को एक विशेष स्तर प्रदान कर दिया था। राजा के पुत्र होते हुये भी सभी सुख-सुविधाओं के त्याग ने स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व को ऊँचा उठा दिया था। जनता स्वाभाविक रूप में उनके प्रति सम्मान से झुक जाती थी और विरोधी भी नतमस्तक हो जाते थे। इसके साथ ही गौतम ने कभी किसी धर्म का अनादर नहीं किया बल्कि तर्क के आधार पर प्रतिपक्षी धर्म का खण्डन करते थे। ऐसी स्थिति में जनता का उनके उपदेशों के प्रति श्रद्धावान होना स्वाभाविक था।

उपर्युक्त कारणों के अलावा बौद्ध धर्म की परिवर्तनशीलता ने भी इस धर्म के प्रसार में योगदान दिया। धर्म की कठोरता को त्याग कर इसमें उदारवादी महायान विचारधारा का जन्म हुआ जिसने बौद्ध धर्म के व्यापक प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसी के साथ बौद्ध शिक्षण संस्थाओं जैसे तक्षशिला, नालन्दा आदि द्वारा बौद्ध धर्म और साहित्य की समुचित शिक्षा व्यवस्था ने इस धर्म के भारत और विदेशों में प्रसार में भारी सहयोग दिया। इस प्रकार इन सभी कारणों से बौद्ध धर्म एक विश्व धर्म बन गया।

विदेशों में प्रसार- 

यद्यपि अपनी जन्मभूमि भारत में बौद्ध समय की गति के अनुसार उठता-गिरता रहा, किन्तु अपने जन्म के बाद से लेकर छठी शताब्दी ईसवी तक भिक्षुओं तथा कुछ भारतीय सम्राटों में प्रयत्नों से यह धर्म मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, जापान, बर्मा, दक्षिण-पूर्वी  एशिया तथा यूनान तक फैल गया।

बौद्ध धर्म के विदेशों  में प्रचार का कार्य विधिवत रूप में मौर्य सम्राट अशोक के काल में हुआ। अशोक ने इस धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका, बर्मा, मध्य एशिया तथा पश्चिमी एशिया आदि में अपने प्रचारक भेजे। अशोक के शिलालेखों से पता चलता है कि बौद्ध प्रचारकों ने सीरिया, मेसोपोटामिया तथा यूनान में मेसीडोनिया, एरिच तथा कोरिन्थ आदि राज्यों में जाकर इस धर्म को फैलाया। विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में इस धर्म की महायान शाखा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा और महायान विचारधारा के अनुयायी सम्राट कनिष्क के प्रयत्नों से मध्य एशिया, तिब्बत, चीन तथा जापान तक इस धर्म का खूब प्रचार हुआ। चीन में सम्राट मींगती के समय में बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। कई बौद्ध विद्वान चीन गये और उन्होंने चीनी भाषा में बौद्ध ग्रन्थों का अनुवाद किया। विद्वानों का कथन है कि चीन से बौद्ध धर्म कोरिया, मंगोलिया, फारमोसा तथा जापान में फैला। बौद्ध धर्म का इन देशों में जिस प्रभावशाली रूप से प्रसार हुआ, उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी जन्मभूमि से विलुप्त हो जाने पर भी इन देशों में से अधिकांश बौद्ध धर्म आज भी जीवित है।

 बौद्ध धर्म (Buddhism)

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त (Major Principles of Buddhism)

बौद्ध धर्म का विभाजन (bauddha dharm ka vibhaajan)



Friday, December 27, 2019

बौद्ध धर्म का विभाजन (Buddhism Vibhajan)

बौद्ध धर्म का विभाजन (Buddhism Vibhajan)


इतिहास के पन्नों को उठाकर देखते हैं। प्रायः सभी धर्म शाखाओं में विभाजित हैं। इसी प्रकार बौद्ध धर्म (Buddhism) का भी कुछ समय बाद अनेक शाखाओं में विभाजित हो गया। आइए दोस्तों इस पोस्ट में बौद्ध धर्म की कुछ प्रमुख शाखाओं की सूक्ष्म जानकारी प्राप्त करेंगे।


जैसे अन्य धर्मों में समय के साथ-साथ अनेक शाखाओं का जन्म हुआ है, उसी प्रकार बौद्ध धर्म (Buddhism)भी अपनी स्थापना के कुछ समय बाद कई शाखाओं में बँट गया। परन्तु उनमें दो शाखाएँ मुख्य हैं- 1. हीनयान 2. महायान्।


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बौद्ध धर्म का विभाजन (Buddhism Vibhajan)

हीनयान सम्प्रदाय-

हीनयान सम्प्रदाय बौद्ध धर्म  (Buddhismके प्राचीन स्वरूप (मूल रूप) को महत्त्व देता है। हीनयान सम्प्रदाय महात्मा बुद्ध को आदि धर्म-प्रवर्तक तथा निर्वाण प्राप्त एक सामान्य व्यक्ति मानता है। वह बुद्ध को ईश्वर का अवतार नहीं मानता। अर्थात् बुद्ध में देवी शक्ति प्रतिष्ठित करने का विरोध है।

हीनयान सम्प्रदाय कर्मवाद एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। परन्तु बुद्ध की भाँति हीनयान भी ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं रखकर स्वयं पर विश्वास रखता है। और उसका मानना है कि बुद्ध के द्वारा बताये गये मार्ग का अनुसरण करने से निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है। और निर्वाण प्राप्ति के लिए यही सही मार्ग है। इस सम्प्रदाय का कथन है कि अपने लिए स्वयं प्रकाश बनो। लेकिन, स्वयं के प्रकाश को पहचान सकना प्रत्येक के वश में नहीं होता है। हीनयान शाखा वाले इस बात को स्वीकार करते हैं कि शुभ और अशुभ दोनों तरह की वासनाएँ निषिद्ध हैं। वे लोग केवल निवृत्ति के ऊपर ही अधिक बल देते हैं। इसलिए इस सम्प्रदाय को ’’छोटी गाडी’’ कहा जाता था, क्योंकि इससे थोड़े व्यक्ति ही यह सुख प्राप्त कर सकते थे।

बौद्ध धर्म का विभाजन (Buddhism Vibhajan)

महायान सम्प्रदाय- 

बौद्ध धर्म (Buddhism) के जिन अनुयायियों ने इस कठिन मार्ग को सरल बनाने के लिए कुछ नई सरल मान्यताओं का विकास कर उनके अनुसार चलना आरम्भ किया, वे महायानी कहलाये। ईसवी सन् की शुरुआत के साथ-साथ बौद्ध धर्म  (Buddhismमें हीनयान और महायान का यह भेद स्पष्ट रूप से सामने आ गया। महायान शाखा के विकास के लिए कई कारण उत्तरदायी थे। उनमें से एक मुख्य कारण उन दिनों में भक्ति प्रधान भागवत धर्म की बढ़ती हुई लोकप्रियता थी, जिसके परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म की प्रगति रुक गई थी।

दूसरा मुख्य कारण उन दिनों में भारत से बाहर से आकर बसने वाले यवन, शक, कुषाण आदि लोगों को अपने मत में दीक्षित करने का था। मूल बौद्ध धर्म में गृहस्थों के लिए निर्वाण की व्यवस्था न थी और हीनयान मत भी इसी की पुष्टि करता था। परन्तु महायान सम्प्रदाय वाले सभी व्यक्तियों खास तौर से गृहस्थियों को निर्वाण-सुख का अधिकारी बनाना चाहते थे। उनका कहना था कि व्यक्ति को केवल आत्म-कल्याण ही नहीं करना है, बल्कि संसार के अन्य दुःखी प्राणियों की सेवा के साथ उन्हें भी निर्वाण का मार्ग बताना है। बुद्ध का जीवन इसी का उदाहरण है। 

महायान की विशेषताएँ- 

महायान सम्प्रदाय की मान्यता है कि बुद्ध के पूर्व भी बौद्धधर्म  (Buddhismके अनेक प्रवर्त्तक हो चुके थे, जिन्हें वे ’’बोधिसत्व’’ कहते हैं। प्रत्येक ’’कुल पुत्र’’ बोधिचर्चा से अर्थात् करुणा, मुदिता, मैत्री और अपेक्षा के आचरण द्वारा या दान, शील, क्षमा, ध्यान और प्रज्ञा नामक 6 पारमिताओं की साधना द्वारा बुद्धत्व के मार्ग पर चल सकता है। किन्तु उसे बुद्ध बनने में रुचि नहीं है। वह अकेले बुद्धत्व को प्राप्त करना उचित नहीं समझता] जबकि उसके अन्य साथी दुःख और कष्टों के बन्धन में जकड़े हुए हैं। वह ऐसे लोगों की सेवा को बुद्धत्व से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण समझाता है। उसके लिए प्राणी मात्र की भलाई और सेवा ही जीवन का चरम लक्ष्य है और वह इसी को ’’निर्वाण’’ मानता है। ऐसे लोगों को महयानी ’’बोधिसत्व’’ कहते हैं। बोधिसत्वचर्या का एक अंग करुणा है। और दूसरा प्रज्ञा। करुणा से लोक सेवा और परोपकार की भावना विकसित होती है। प्रज्ञा से संसार का वास्तविक स्वरूप और आतंकित मर्म से साक्षात्कार होता है। इस दृष्टि से महायान सार्वजनिक और सार्वभौम मानवता का आदर्श प्रस्तुत करता है। 

भक्ति प्रधान भागवत धर्म और बाहर से आने वाले यवन, शक, कुषाण आदि लोगों के प्रभाव के परिणामस्वरूप महायान सम्प्रदाय में बुद्ध की मूर्ति-पूजा चल पड़ी। महायान वालों ने बुद्ध को परमात्मा और अवतार मानना शुरू कर दिया। बुद्ध तो अपने को सर्वज्ञ कहलाने के भी विरुद्ध थे। किन्तु उनके अनुयायी उनके मानव रूप से सन्तुष्ट न रहे। गान्धार और मथुरा में स्वतत्र शैलियों से बुद्ध की मूर्तियाँ बनायी जाने लगीं और बुद्ध की पूजा होने लगी। बुद्ध के साथ-साथ बोधिसत्वों की पूजा भी की जाने लगी। इस प्रकार, बौद्ध धर्म में मूर्ति-पूजा का रिवाज प्रचलित हुआ। यह माना जाने लगा कि दुःखी प्राणी जब निराश हो जाता है, तो ईश्वर के अवतार भगवान् बुद्ध उसे आशा प्रदान करते हैं। 

भागवत धर्म की भक्ति का प्रभाव भी महायान सम्प्रदाय पर पड़ा और उसने भी महात्मा बुद्ध के प्रति भक्ति को निवा्रण का सरल साधन मान लिया। जैसे वैष्णव मत की मान्यता थी कि भक्ति के द्वारा ईश्वर तथा मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है, उसी प्रकार महायान मत की मान्यता थी कि ईश्वर के अवतार बुद्ध तथा बोधिसत्वों की भक्ति के द्वारा निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार महायान सम्प्रदाय ने देश एवं काल की परिस्थिति के अनुसार अपने को व्यावहारिक और उपयोगी बनाने का प्रयास किया। यही उसकी लोकप्रियता का रहस्य था। 

बौद्ध संगीतियाँ-

बौद्ध धर्म (Buddhism) के विकास में बौद्ध संगीतियों (अधिवेशनों) का भी महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। बौद्ध धर्म के लम्बे इतिहास में चार संगीतियों का विशेष महत्त्व है। पहली संगीति महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण  के बाद राजगृह नगर में हुई थी। इस अवसर पर बौद्ध भिक्षुओं में नोंक-झोंक शुरु हो गई। इस सभा का मुख्य उद्देश्य महात्मा बुद्ध के उपदेशों का संकलन करना था। जो लोग परम्परागत कठोर-नियमों के अनुयायी थे। वे ’’स्थविर’’ कहलाये। परन्तु जो भिक्षु संघ के नवीन नियम लागू करने के पक्ष में थे, वे ’’महासांघिक’’ कहलाये।

जैसे-जैसे समय निकलता गया, दोनों में नोंक-झोंक बढ़ती गयी।  बुद्ध के निधन के सौ वर्ष बाद वैशाली में बौद्ध धर्म की दूसरी संगीति हुई और इस सभा में स्थविरवादी और महासांघिकों ने अपनी अलग महासमिति करके अपने ढंग से बौद्ध धर्म शास्त्रों का सम्पादन किया। तीसरी संगीति अशोक के समय में पाटलिपुत्र में हुई। इस अवसर पर ’’अभिधम्मपिटक’’ के भाग की रचना की गई। इस संगीति में स्थविरवादियों की प्रधानता रही। यद्यपि अशोक ने बौद्ध धर्म के सभी सम्प्रदायों को एकता के सूत्र में बाँधने का अथक प्रयास किया था। चौथी संगीति कनिष्क के शासन का में काश्मीर में हुई। इस संगीति में सर्वास्तिवाद नाम सम्प्रदाय की प्रधानता रही और इस अवसर पर बौद्ध ग्रन्थों पर जो टीकाएँ लिखी गईं वे ’’विभाषा’’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

 बौद्ध धर्म (Buddhism)

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त (Major Principles of Buddhism)

बौद्ध धर्म का विभाजन (bauddha dharm ka vibhaajan)

Monday, December 23, 2019

Bauddha Dharm Ke Pramukh Siddhant

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त  (Major Principles of Buddhism)


महात्मा बुद्ध जगत् और जीवन को मानकर चले। वे इस उलझन में नहीं पड़े कि संसार या मनुष्य अमर है या नश्वर, सीमित है या असीम, जीव और शरीर एक है या अलग। जब किसी ने उनसे इन प्रश्नों के उत्तर देने का आग्रह भी किया तो वे मौन रहे या उन्हें निरर्थक समझ कर टालते रहे। उन्होंने जीवन को, जैसा भी  है, वैसा मानकर व्यावहारिक दृष्टि से इसकी समस्या की खोज की। इस दृष्टि से उन्होंने अपने धर्म की अधिक नैतिक व्यख्या की ।
 महात्मा गौतम बुद्ध 


बौद्ध धर्म कोई पृथक दर्शन भी नहीं, क्योंकि बुद्ध ने सत्ता-सम्बन्धी किसी प्रश्न पर कभी अपना विचार प्रकट नहीं किया। आज जो कुछ भी बौद्ध दर्शन के नाम से विख्यात है, वह महात्मा बुद्ध के बाद का विकास है। बौद्ध धर्म आध्यात्म-शास्त्र भी नहीं है। क्योंकि बुद्ध ने सृष्टि सम्बन्धी विषय पर भी कभी अपने विचार प्रकट नहीं किये। उनका धर्म तो व्यावहारिक धर्म था। वह मनुष्य की उन्नति का साधन था। वह जीवन का विषय है और इसी जीवन में ’’निर्वाण’’ दिलाता है। वह नितान्त बुद्धिवादी है और उसमें अन्धविश्वासों तथा अन्ध परम्पराओं के लिए कोई स्थान नहीं। उनका धर्म किसी यान्त्रिक कर्मकाण्ड, सूक्ष्म दार्शनिकता अथवा पौराणिक अन्ध मान्यता के ऊपर आधारित न था। उसका आधार तो मानव मात्र का कल्या था। उसके मुख्य सिद्धान्त इस प्रकार थे -

Bauddha Dharm Ke Pramukh Siddhant

चार आर्य सत्य- बौद्ध धर्म की आधारशिला है, उसके चार आर्य सत्य। उसके अन्य भी सिद्धान्तों का विकास इन आर्य-सत्यों के आधार पर ही हुआ है। ये चार आर्य सत्य निम्नलिखित हैं -

(1) दुःख- बौद्ध धर्म भी दुःखवाद को लेकर चला। बुद्ध ने सम्पूर्ण मानवता को दुःखी देखा। किसी को किसी बात का दुःख तो किसी को अन्य किसी का दुःख, जन्म भी दुःख, बुढ़ापा भी दुःख, रोग भी दुःख, मृत्यु भी दुःख, धन-विनाश भी दुःख, प्रियजन का वियोग भी दुःख, इच्छित वस्तु का न मिलना भी दुःख। इस प्रकार चोरों ओर दुःख ही दुःख है।

(2) दुःख समुदाय- संसार में सर्वत्र दुःख है, यह वास्तविक सत्य है। तब प्रश्न उठता है कि आखिर इन दुःखों का कारण क्या है? महात्मा बुद्ध की दृष्टि में इसका मूल कारण तृष्णा (इच्छा) है। उनका कहना था कि यह तृष्णा पुनर्भव को करने वाली आसक्ति और राग के साथ चलने वाली और यत्र-तत्र रमण करने वाली हैं यह वैसे ही है जैसे कि काम-तृष्णा या भव तृष्णा। परन्तु इस तृष्णा का जन्म कैसे होता है? इसका समाधान करते हुये बुद्ध ने कहा था कि रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श तथा मानसिक वितर्क और विचारों से जब मनुष्य आसक्ति करने लगता है, तो तृष्णा का जन्म होता है। अर्थात् दूसरे आर्य सत्य का अर्थ है- दुःख का कोई न कोई कारण (समाज) अवश्य होता है। 

(3) दुःख निरोध- जिस प्रकार संसार में दुःख है और दुःख के कारण (समाज) है, उसी प्रकार, दुःख-निरोध (दुःख से छुटकारा) भी सम्भव है। दुःख के मूल कारण तृष्णा के मूलोच्छेदन से छुटकारा मिल सकता है। उनका कहना था, संसार में जो कुछ भी प्रिय लगा है, संसार में जिसमें रस मिलता है, उसे जो दुःखस्वरूप समझेंगे और उससे डरेंगे, वे ही तृष्णा को छोड़ सकेंगे। रूप, वेदना, सांज्ञा, संस्कार और विज्ञान का विरोध ही दुःख-निरोध है।

(4) दुःख निरोध मार्ग- दुःखों पर विजय प्राप्त करने का मार्ग है। कोई भी व्यक्ति उस मार्ग का अनुसरण कर दुःखों पर विजय प्राप्त कर सकता है। बुद्ध ने मार्ग बतलाया है वह ’’दुख निरोधगामिनी प्रतिपदा’’ के नाम से विख्यात है। इसमें आठ अंगों की व्यवस्था है। अतः इसे ’’आर्य अष्टांगिक मार्ग’’ भी कहते हैं।

Bauddha Dharm Ke Pramukh Siddhant

अष्टांगिक मार्ग- महात्मा बुद्ध ने बतलाया कि सांसारिक वस्तुओं को भोगने की  इच्छा ही सारे दुःखों का मूल कारण है, यह तृष्णा ही आत्मा को जन्म-मरण के बन्धन में जकड़े रखती है। अतः निर्वाण अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिए तृष्णा के मिटा देना आवश्यक है। इसके लिए मनुष्य को अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। यह मार्ग जीवन-यापन के बीच का रास्ता है। इसीलिए इसको ’’मध्यम मार्ग’’ भी कहा गया है। अष्टांगिक मार्ग के 8 अंग इस प्रकार हैं -

1. सम्यक दृष्टि- सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, सदाचार और दुराचार में भेद करना ही सही ज्ञान है। इसी से चार आर्य सत्यों का सही-सही ज्ञान प्राप्त होता है। यह ज्ञान श्रद्धा और भावना से युक्त होना चाहिए।

2. सम्यक-संकल्प- कामना और हिंसा से मुक्त आत्म-कल्याण का पक्का निश्चय ही सम्यक संकल्प है। 

3. सम्यक-वाणी- सत्य, विनम्र और मुदृ वचन तथा वाणी पर संयम ही सम्यक वाणी है। 

4. सम्यक-कर्मान्त- सब कर्मों में पवित्रता रखना। हिंसा, द्रोह तथा दुराचरण से बचते रहना और सत्कर्म करना।

5. सम्यक-आजीव- न्यायपूर्ण मार्ग से आजीविका चलाना जीवन-निर्वाह से निषिद्ध मार्गों का त्याग करना।

6. सम्यक-प्रयत्न- इसे सम्यक-व्यायाम भी कहते हैं। इसका अर्थ है कि सत्कर्मों के लिए निरन्तर उद्योग करते रहना। 
7. सम्यक-स्मृति- लोभ आदि चित्त के संतापों से बचना तथा उत्तम शिक्षाओं को सदैव याद रखना।

8. सम्यक-समाधि- राग तथा द्धेष से रहित होकर चित्त की एकाग्रता को बनाये रखना।

मध्यमा-प्रतिपदा- दुःख से छुटकारा पाने के लिए महात्मा बुद्ध ने जो अष्टांगिक मार्ग बतलाया था, वह विशुद्ध आचार तत्वों पर आधारित था। उसमें न तो शारिक कष्ट  एवं क्लेश से युक्त कठोर तपस्या को उचित बतलाया गया और न ही अत्यधिक सांसारिक भोग-विलास को।  इस प्रकार वह दोनों अतियों के बीच का मार्ग था। इसी से उसे मध्यमा-प्रतिपदा (मध्यम मार्ग) भी कहा गया। इसके पालन से मनुष्य निर्वाण पथ की ओर अग्रसर हो सकता है। 

Bauddha Dharm Ke Pramukh Siddhant

दस शील - अपनी शिक्षाओं में महात्मा बुद्ध ने शील या नैतिकता पर बहुत अधिक बल दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने को कहा। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित दस शील (नैतिक आचरण) का पालन करने को कहा। उन्हें हम सदाचार के नियम भी कह सकते हैं।
(1) अहिंसा व्रत का पालन करना।
(2) सदा सत्य बोलना।
(3) अस्तेय अर्थात् चोरी न करना।
(4) अपरिग्रह अर्थात् वस्तुओं का संग्रह न करना।
(5) ब्रह्मचर्य अर्थात् भोग-विलास से दूर रहना।
(6) नृत्य-ज्ञान का त्याग।
(7) सुगन्धित पदार्थों का त्याग।
(8) असमय में भोजन का त्याग।
(9) कोमल शय्या का त्याग।
(10) कामिनी कांचन का त्याग।

सादाचार के इन नियमों में से प्रथम पाँच नियम महावीर स्वामी के पाँच अणुव्रतों के समान ही हैं। बुद्ध के अनुसार इन पाँच नियमों में से प्रथम पाँच नियमों का पालन करना गृहस्थ अनुयायियों तथा साधु उपासकों दोनों के लिए आवश्यक है। इनका पालन करते हुये संसार त्याग करने पर भी मनुष्य सन्मार्ग की ओर बढ़ सकता है। अर्थात् बुद्ध ने गृहस्थ लोगों को भी उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन दिया। लेकिन जो व्यक्ति संसार की मोह-माया को छोड़कर भिक्षु जीवन बिताता है, उसके लिए शील के सभी दस नियामों का पालन करना आवश्यक है। इस प्रकार, बोद्ध धर्म में शील के नियमों के पालन में भिक्षुओं की अपेक्षा गृहस्थों को अधिक ढ़ील दी गई थी।

 बौद्ध धर्म (Buddhism)

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त (Major Principles of Buddhism)

बौद्ध धर्म का विभाजन (bauddha dharm ka vibhaajan)

Saturday, December 21, 2019

बौद्ध धर्म (Buddhism)

 बौद्ध धर्म (Buddhism)

Buddhism- Mahatma Gautam Buddha

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारतीय समाज में प्रचलित यज्ञवाद, वेदवाद बहुवेदवाद, रूढिवादिता, आडम्बरयुक्त धार्मिक कर्मकाण्डों, ब्राह्मणों के नैतिक पतन और समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध आवाज बुलन्द करने वाले दूसरे महापुरुष महात्मा बुद्ध हुए थे।

महावीर स्वामी की भाँति महात्मा बुद्ध ने भी राजसी जीवन एवं सुखी दाम्पत्य जीवन को त्याग कर सत्य की खोज में घोर कष्टों एवं कठिनाइयों का सामना किया। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने ब्राह्मणों के यज्ञों, हवन तथा तीर्थों की निस्सारता का प्रचार करते हुए शील आचरण की शुद्धता, सत्य, धर्म, संयम, ब्राह्यचर्य आदि की महत्ता पर जोर दिया।

महात्मा बुद्ध ने मानव मात्र को बहुसंख्यक देवी-देवताओं की आधीनता मुक्त कराने का प्रयास किया और कहा कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य निर्माता है। उन्होंने वर्ण-भेद एवं जाति-भेद को निरर्थक बताया। उन्होंने दुखी मानवता को जीवन का सही और सरल मार्ग बतलाया बौद्ध धर्म  (Buddhism) के नाम से विख्यात हुआ।

Buddhism- Mahatma Gautam Buddha
महात्मा गौतम बुद्ध का जन्म

बौद्ध धर्म  (Buddhism) के संस्थापक गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य कुल में हुआ था, इसलिए उन्हें, शाक्य मुनि भी कहा जाता है। उनके पिता शुद्धोदन शाक्य गणराज्य के प्रधान थे। शाक्यों का गणराज्य उत्तरी-पूर्वी सीमा पर हिमालय की तराई में स्थित था तथा कपिलवस्तु इस गणराज्य की राजधानी थी। कपिलवस्तु एवं देवदह में मध्य नेपाल राज्य की तराई में आज के नौतनवां स्टेशन में 8 मील पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान है। वहॉ उस युग में लुम्बिनी नामक वन था।

बौद्ध सूत्रों के अनुसार ईसा से 563 वर्ष पूर्व कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन की महारानी माया देवी अपने पिता के घर आ रही थी कि रास्ते में लुम्बिनी वन में वैशाख मास की पूर्णिमा को उसने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम सिद्धार्थ रखा गया।

सिद्धार्थ के जन्म के एक सप्ताह पश्चात् ही उसकी माता का स्वर्गवास हो गया। इसलिए सिद्धार्थ का पालन पोषण उसकी मौसी एवं विमाजा प्रजापती (गौमती) ने किया। बाल्यावस्था से ही सिद्धार्थ विचारवान, करुणावान एवं एकान्तप्रिय थे। संसार के लोगों को कष्टों में देखकर उनका हृदय दया से भर जाता था।

सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन ने उन्हें संसारी बनाने के लिए सभी प्रकार की क्षत्रियोचित शिक्षा-दीक्षा दिलवाई तथा उन्हें विलासिता की हर प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराई, फिर भी सिद्धार्थ का मन सांसारिक बातों में नहीं लग सका। वे सदैव इन बातों की ओर उदासीन रहते थे तथा एकान्त में उदास बैठे रहते थे। पुत्र की ऐसी मनोवृत्ति देखकर पिता शुद्धोदन ने सोलह वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह दण्डपाणि की सर्वगुण सम्पन्न एवं रूपलावण्यमयी राजकुमारी यशोधरा के साथ कर दिया। साथ ही अपने पुत्र को सांसारिक प्रवृत्तियों में लगाने के लिए प्रत्येक मौसम के अनुकूल अलग-अलग प्रासाद बनवा दिये तथा प्रत्येक प्रासाद में विभिन्न ऋतुओं के अनुरूप सभी प्रकार के ऐश्वर्य और भोग-विलास की सामग्री भी उपलब्ध करवा दी।

शुद्धोदन को आशा थी कि इससे सिद्धार्थ का मन सांसारिक सुखों में लग जायेगा। परन्तु इस वैभव और विलास के बीच भी सिद्धार्थ के मन में जीवन की सुख-दुःख की समस्याओं के लेकर निरन्तर द्वन्द्व चलता रहता था।

लगभग 12-13 वर्ष तक सामान्य गृहस्थ जीवन का सुख भोग लेने पर भी सिद्धार्थ का मन सांसारिक प्रवृत्तियों में नहीं लग सका। अपने गृहस्थ जीवन में सिद्धार्थ के राहुल नामक एक पुत्र भी हुआ, फिर भी सिद्धार्थ का वैरागी मन संसार में नहीं लगा।

इसी वैराग्य भावना ने उन्हें तृष्णा की जंजीर को तोडने, अज्ञान का कोहरा दूर भगाने तथा अपनेपन की मिथ्या मति को मिटाने की प्रेरणा प्रदान की तथा एक रात्रि को अपने पुत्र, पत्नि और पिता तथा सम्पूर्ण राज्य वैभव को त्यागकर वे ज्ञान की खोज में निकल पड़े। उनके जीवन की इस घटना को बौद्ध धर्म एवं साहित्य में ‘महाभिनिष्क्रमण’ के नाम से पुकारा जाता है।

Buddhism- Mahatma Gautam Buddha
महाभिनिष्क्रमण की रात्रि

‘महाभिनिष्क्रमण’ की रात्रि में सिद्धार्थ अपने घोडे पर 30 योजन दूर निकल गये और गोरखपुर के समीप अनोमा नदी के तट पर उन्होंने अपने आभूषण तथा राजसी वस्त्र उतार दिये और तलवार से अपना जूडा काट कर संन्यास ले लिया। उस समय उनकी आयु 29 वर्ष की थी।

Buddhism- Mahatma Gautam Buddha
सत्य और ज्ञान की खोज 

संन्यासी हो जाने के बाद बुद्ध तप तथा साधना में लीन हो गये। सबसे पहले वे वैशाली के ‘‘आलारकालाम’’ नामक एक तपस्वी के पास ज्ञानार्जन हेतु गये किन्तु वहाँ उनकी ज्ञान-पिपासा शान्त नहीं हो पाई। इसके बाद वे राजगृह के ही एक अन्य ब्राह्मण ‘‘उद्रक रामपुत्त’’ के पास गये। उपर्युक्त दोनों गुरुओं से सिद्धार्थ ने योग साधना और समाधिस्थ होना सीखा। परन्तु इससे उन्हें संतोष नहीं मिला।

यहाँ से वे अरूवेला की सुरम्य वनस्थली में आये और तपस्या में लीन हो गये। यहाँ उन्हें कौण्डिन्य आदि पाँच ब्राह्मण साधक संन्यासी भी मिल गये। अपने इन ब्राह्मण साथियों के साथ वे उरूवेला में कठोर तपस्या करने लगे। सिद्धार्थ ने पहले तो तिल और चावल खाकर तप किया परन्तु बाद में उन्होंने आहार का सर्वथा त्याग कर दिया, जिससे उनका शरीर सूखकर काँटा बन गया। तप करते-करते सिद्धार्थ को 6 वर्ष बीत गये पर साधना में सफलता न मिली।
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महात्मा गौतम बुद्ध 

ऐसा बताया जाता है कि एक दिन नगर की कुछ स्त्रियाँ गीत गाती हुई उस ओर से निकली, जहाँ सिद्धार्थ तपस्यारत थे। उनके कान में स्त्रियांं का एक गीत पडा, जिसका भावार्थ इस प्रकार था -
’’वीणा के तारों को ढ़ीला मत छोड़ा। ढ़ीला छोड़ देने से उनसे सुरीला स्वर न निकलेगा, परन्तु तारों को इतना कसो भी मत जिससे वे टूट जाये।’’

सिद्धार्थ के हृदय ने गीत के भावों को ग्रहण किया। उन्होंने स्वीकार किया कि नियमित आहार-विहार से ही योग साधना सिद्ध हो सकती है। किसी भी बात की अति करना ठीक नहीं है। वास्तव में मनुश्य को मध्यम मार्ग ही अपनाना चाहिए।

अतः उन्होंने आहार करना शुरु कर दिया। गौतम में यह परिवर्तन देखकर उनके पाँचों ब्राह्मण साथी उन्हें पथ भ्रष्ट सझकर उनका साथ छोड़कर सारनाथ चले गये। किन्तु इससे गौतम विचलित नहीं हुए और उन्होंने ध्यान लगाने का निश्चय किया। वे वहीं एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान की अवस्था में बैठ गये। 

सात दिन तक ध्यान-मग्न रहने के पश्चात् वैसाख पूर्णिमा की रात को जब सिद्धार्थ ध्यान लगाने बैठे तो उन्हें ’’बोध’’ (आन्तरिक ज्ञान) हुआ। उन्हें साक्षात् सत्य का दर्शन मिला। तभी से वे ’’बुद्ध’’ नाम से विख्यात हुए। उस समय उनकी आयु 35 वर्ष की थी। जिस वृक्ष के नीचे उन्हें बोध प्राप्त हुआ था, उसका नाम ’’बोधिवृक्ष’’ पड़ा और जिस स्थान पर यह घटना घटी उसका नाम ’’बोधगया’’ हो गया। इस घटना के बाद भी महात्मा बुद्ध चार सप्ताह तक उसी बोधिवृक्ष के नीचे रहे और धर्म के स्वरूप का चिन्तन करते रहे।

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सत्य और ज्ञान की प्राप्ति प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध का ज्ञान का प्रचार

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् सबसे पहले ’’बोध गया’’ में ही बुद्ध ने अपने ज्ञान उपदेश तपस्यु और मल्लिक नाम दो बनजारों को दिया था। इसके बाद बुद्ध अपने ज्ञान एवं विचारों को जनसाधारण तक पहुँचाने के उद्देश्य से वहाँ से निकल पड़े और सारनाथ पहुँचे। यहाँ उन्हें वे पाँचों ब्राह्मण साथी मिल गये जो उन्हें छोड़कर चले आये थे।

बुद्ध ने उन्हें अपने ज्ञान की, धर्म के रूप में दीक्षा दी। यह घटना बौद्ध धर्म के इतिहास में ’’धर्म -चक्र-परिवर्तन’’ के नाम से महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। यहाँ से महात्मा बुद्ध काशी गये और वहाँ अपने ज्ञान का प्रचार करने लगे। कुछ ही समय में बुद्ध के शिष्यों की संख्या 60 हो गई। तब उन्होंने एक संघ की स्थापना की, जिसकी सहायता से लगभग 45 वर्ष तक बुद्ध ने अपने धर्म का प्रचार किया


बुद्ध ने अपने उपदेशों में  साधारण बोलचाल की भाषा को अपनाया तथा जाति-पाँति और ऊँच-नीच की भावना से दूर रहते हुए सभी को उपदेश दिया। कोसल के राजा प्रसेनजित तथा मगध के बिम्बिसार और अजातशत्रु, वैशाली की सुप्रसिद्ध गणिका आम्रपाली, स्वयं बुद्ध के पिता शुद्धोदन और पुत्र राहुल ने भी उनके धर्म को स्वीकार कर लिया। अपने प्रिय शिष्य आनन्द के विशेष आग्रह पर उन्होंने स्त्रियों को भी बौद्धधर्म की दीक्षा देना स्वीकार कर लिया। अन्त में 80 वर्ष की आयु में गोरखपुर के समीप कुशीनगर (कुशीनारा) नाम स्थान पर गौतम बुद्ध ने अपना शरीर त्याग दिया।

बुद्ध के शरीर त्यागने की घटना को बौद्ध लोग ’’महापरिनिर्वाण’’ कहते हैं। उनका अन्तिम उपदेश- ’’हे भिक्षुओं, तुम आत्मदीप बन विचरो। तुम अनी ही शरण में जाओ। किसी अन्य का सहारा मत ढूंढो। केवल धर्म को अपना दीपक बनाओ। केवल धर्म की शरण में जाओ।’’

Buddhism- Mahatma Gautam Buddha
बौद्ध धर्म का प्रमुख साहित्य

बौद्ध धर्म का साहित्य सामूहिक रूप से ’’त्रिपिटक’’ कहा जाता है। उनके नाम इस प्रकार हैं - 1. सुत्तपिटक 2. विनयपिटक 3. अभिधम्मपिटक। सुत्तपिटक के पाँच विभाग हैं - 1. दीर्घ निकाय 2. मज्झिम निकाय 3. संयुक्त निकाय 4. अंगुत्तर निकाय 5. खुद्दक निकाय।

इनमें बौद्ध धर्म  के विभिन्न अंगों, विश्व की उत्पत्ति, जाति व्यवस्था की कृत्रिमता, निर्वाह प्राप्ति के साधन, पुनर्जन्म, आत्मज्ञान, आत्मचिन्तन आदि विषयों का विवेचन है। विनयपिटक में भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम हैं। अभिधम्मपिटक में गौतम बुद्ध के उपदेशों का विवेचन है। यह सात अध्यायों में विभक्त है। इन त्रिपिटकों की अनेक टीकाएँ तथा व्याख्याएँ हैं, जिनमें बौद्ध विद्वानों ने बौद्ध धर्म के नैतिक नियमों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की है।

’’धम्पपद’ नाम एक ग्रन्थ जिसे बौद्ध धर्म की गीता कहा जा सकता है। इसमें 424 गाथाएँ हैं , जिनमें बौद्ध धर्म का सार है। जातक कथाओं का एक संग्रह है, जिसमें बुद्ध की 574 पूर्व जन्म की कथाओं का वर्णन है। बौद्ध धर्म का अधिकांश साहित्य पालि भाषा में है। बौद्ध विद्वानों ने संस्कृत भाषा में भी अनेक रचनाएँ लिखीं, परन्तु संस्कृत साहित्य के केवल थोड़े से अंश उपलब्ध हैं। 

Wednesday, December 18, 2019

Jainism Bibhajan, Bhartiy Sansakriti

जैन धर्म में विभाजन

महावीर स्वामी के जीवनकाल में ही जैन धर्म में दरार पैदा हो गयी थी। स्वयं उन्हीं के दामाद जमालि क्षत्रिय का महावीर स्वामी के साथ ’’क्रियमाणकृत’’ के सिद्धान्त पर मतभेद हो गया और वह जैनसंघ से अलग हो गया। महावीर स्वामी की पुत्री ’’प्रियदशर्ना’’ भी लगभग 1000 भिक्षुणियों के साथ जैनसंघ से पृथक हो गई। परन्तु बाद में वह अपनी समस्त अनुयायिनियों के साथ संघ में वापस लौट आई थी। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इस घटना से जैन धर्म के प्रसार-प्रचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा होगा। महावीर स्वामी के बाद जैन यतियों में धीरे-धीरे आचार सम्बन्धी परिवर्तन होने लगे। उस समय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये जैन संघ के प्रधान नेता संघभद्र ने जैनाचार में कुछ संशोधन किये। प्राचीन जैसे साधु नग्न रहते थे, परन्तु अब कुछ साधु वस्त्र धारण करने लगे।

इस प्रकार जैन धर्म की दो शाखाओं - दिगम्बर और श्वेताम्बर का आरम्भ हुआ। दोनों के मौलिक सिद्धान्तों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। अन्तर केवल इतना ही कि दिगम्बर सम्प्रदाय कट्टरपन्थी जैनियों का सम्प्रदाय है और ये लोग जैन धर्म के नियमों का पालन कठोरता से करते हैं। उनके मतानुसार जैन साधु को सब कुछ त्याग देना चाहिए। वस्त्र भी धारण नहीं करना चाहिए। इसके विपरीत श्वेताम्बर सम्प्रदाय में नियमों की कठोरता कम कर दी गई और मानवीय दुर्बलता को पूरा ध्यान से ओझल नहीं किया गया है। इस सम्प्रदाय के साधु वस्त्र धारण करते हैं। दिगम्बर सम्प्रदाय स्त्रियों को इसी जीवन में निर्माण प्राप्त करने की अधिकारिणी नहीं मानता, जबकि श्वेताम्बर वाले उनको अधिकारिणी मानते हैं। दिगम्बर मत का विश्वास है कि ’’केवल’’ ज्ञान की प्राप्ति के बाद व्यक्ति को आहार की आवश्यकता नहीं रहती। अर्थात् वह निराहार रह सकता है। परन्तु श्वेताम्बर सम्प्रदाय का मत है कि इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद भी व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता रहती है। दोनों सम्प्रदायां में भिन्नता का एक विषय महावीर स्वामी का पारिवारिक जीवन भी है। श्वेताम्बर मत की मान्यता है कि भगवान महावीर ने यशोदा के साथ विवाह किया था और उनके ’’प्रियदर्शना’’ नाम एक पुत्री भी हुई थी। परन्तु दिगम्बर सम्प्रदाय का उनके विवाह और पुत्री का जन्म-दोनों में विश्वास नहीं रखता। उसके मतानुसार महावीर स्वामी ने विवाह किया ही नहीं था। दोनों के मध्य अन्तर का एक कारण 19 वें तीर्थंकर मिल्लिनाथ भी हैं। श्वेताम्बर मत के अनुसार वे स्त्री थे, जबकि दिगम्बर वाले उन्हें पुरुष मानते हैं। कालान्तर में इन दो शाखाओं के अन्तर्गत भी तेरापन्थी, मन्दिर मार्गी, स्थानकवासी आदि अन्य उपशाखाओं का विकास हुआ और जैन धर्म भी अनेक मतों में विभाजित हो गया। 

जैन धर्म के प्रचार व प्रसार-

महावीर स्वामी के प्रयत्नों से प्रारम्भ में जैन धर्म का प्रचार बडे उत्साह से हुआ। इसका मुख्य कारण स्वयं महावीर स्वामी का इसके प्रचार-प्रसार में भाग लेना था। वे स्वयं वर्ष के आठ माह तक स्थान-स्थान पर घूम-घूम कर अपने मत का प्रचार करते थे तथा वर्षा ऋतु के चार मास किसी एक स्थान पर बिताते थे। महावीर स्वामी ने जनता की बोल-चाल की भाषा “पालि” में अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया जिससे लोगों की सरलता के साथ उनके विचार समझ में आने लगे और जनता उन्हें अंगीकार करने लगी। इसके अतिरिक्त अन्य लोक-सभाओं में जैन धर्म के साहित्य की रचना ने भी इसे लोकप्रिय बनाने में सहयोग दिया। इस धर्म के शीघ्र प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण सामाजिक समानता की भावना थी। महावीर ने अपने धर्म का द्वार सभी जातियों के लिए समान रूप में खेल रखा था। ऐसी स्थिति में कठोर वैदिक व्यवस्था में निम्न समझे जाने वाले लोगों ने शीघ्र ही उनके विचारों को अपना लिया।

जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में महावीर स्वामी द्वारा संस्थापित जैन-संघों ने भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया। जैन- मतावंलम्बी इन्द्रभूति, अग्नि भूति, वायुभूति, भद्रबाहु, जिनसेन, गुणभद्र, हेमचन्द्र आदि अनेक विद्वानों ने इस धर्म पर विविध ग्रन्थों की रचना का इसके प्रचार-प्रसार में योग दिया। महावीर स्वामी राजवंशीय थे और तत्कालीन भारत में कई राजवंशों के साथ उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे। उनकी सफलता ब्राह्मणों के विरुद्ध क्षत्रियों की सफलता थी। इस भावना से प्रेरित कई राजवंशों से भी अपूर्व सहयोग मिला। महावीर स्वामी ने समकालीन मगध के राजाओं- बिम्बिसार, अजातशत्रु और उसके उत्त्राधिकारी उदायीभद्र ने इस धर्म को संरक्षण प्रदान किया था। अवन्ती, वत्स, अंग, चम्पा, सिन्धु-सौबीर आदि राज्यों के शासकों ने भी इसे स्वीकार कर इसके प्रसार में राजकीय सहयोग दिया। अपने अन्तिम दिनों में मौर्य-सम्राट् चन्दगुप्त भी इस धर्म का अनुयायी बन गया था और उसके प्रपौत्र सम्प्रति ने दक्षिण भारत मे जैन धर्म को फैलाने में सहयोग दिया। इसी प्रकार, गुजरात के सोलंकी राजा कुमार कंलिग के राजा खारवेल तथा दक्षिण भारत के गंग, कदम्ब, चालुक्य एवं राष्ट्रकूट नरेशों में से बहुतों ने इस धर्म को आश्रय प्रदान कर इसके विकास में योग दिया। 

जैन धर्म के ग्रन्थ-

सम्पूर्ण जैन साहित्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- 1. आगम साहित्य। 2. अगमेतर साहित्य। आगम साहित्य के भी दो भाग हैं- एक अर्थागम और दूसरा सूत्रागम। तीर्थंकर भगवान् द्वारा उपदिष्ट वाणी आर्थागम है। तीर्थंकरों के प्रवचन के आधार पर गणधरों द्वारा रचित रचित साहित्य सूत्रागम है। ये आगमज्ञान के अक्षय भण्डार होने के कारण ’’गणिपिटक’’ तथा संख्या में बारह होने से ’’द्वादशांगी’’ नाम से भी पुकारे जाते हैं। आचरंग सूत्र में जैन भिक्षुओं के आचरण सम्बन्धी नियम दिये हैं। भगवती सूत्र में महावीर स्वामी के माध्यम से जैन-धर्म के सिद्धान्तों की विवेचना की गई है। ऐसे सूत्रों में आचार्य भद्रबाहु द्वारा रचित ’’कल्पसूत्र’’ बहुत प्रसिद्ध है। जैन धर्म का मूल साहित्य प्राकृत में है, विशेष रूप से वह मागधी भाषा में लिखा गया है। जैन विद्वानों ने कन्नड, तमिल और तेलगू भाषाओं में भी अनेक ग्रन्थ लिखे। महावीर स्वामी के बाद जैन विद्वानों ने संस्कृत भाषा में अनेक ग्रन्थों की रचना की ।
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जैन धर्म ग्रन्थ



जैन धर्म की भारतीय संस्कृति को देन


जैन धर्म का प्रचार-प्रसार अधिक नहीं हो पाया, फिर भी इस धर्म ने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को बहुत प्रभावित किया और भारतीय दर्शन, साहित्य तथा कला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, जोकि निम्नवत् है-

दार्शनिक क्षेत्र में-


जैन विचारधारा ने ज्ञान-सिद्धान्त, स्याद्वाद और अहिंसा आदि के विचारों को पनपाकर भारतीय दार्शनिक चिन्तन को अधिक तटस्थ और गौरवपूर्ण बनाने में योगदान दिया। ज्ञान-सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक जीव की आत्मा पूर्ण ज्ञानयुक्त है और सांसारिक का पर्दा उसके ज्ञान प्रकाश को प्रकट नहीं होने देता। प्राणिमात्र को इस पर्दो को हटाकर ज्ञान को समझना चाहिए। ऐसा करने वह ’’निग्रन्थ’’ हो जाता है। विचार-समन्वय के लिए अनेकान्त दर्शन की देने अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। भगवान् महावीर ने इस दर्शन की मूल भावना का विश्लेषण करते हुए सांसारिक प्राणियों को बोध दिया-’’किसी बात को, सिद्धान्त को एक तरफ से मत देखो। एक ही तरह उस पर विचार मत करो। तुम जो कहते हो वह सच होगा, पर दूसरे जो कहते हैं, वह भी सच हो सकता है। इसलिए सुनते ही भड़को मत। वक्ता के दृष्टिकोण से विचार करो।’’ आज संसार में जो तनाव और द्वन्द्व है, वह दूसरों के दृष्टिकोण को न समझने के कारण है। संस्कृति के रक्षण और प्रसार में जैन धर्म की यह देन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाकर जैन धर्म ने भारतीय जीवन में नवीन चेतना को बढ़ावा दिया, जिसका सहारा महात्मा बुद्ध और आगे के कई महात्माओं तथा महात्मा गाँधी ने भी लिया। अहिंसा आज भारत देश की आन्तरिक एवं बाह्य नीतियों का प्रमुख अंग बनी हुई है, जो जैन-दर्शन की ही देन है।

साहित्य के क्षेत्र में-


भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भी जैन धर्म सांस्कृति समन्वय को प्रोत्साहन दिया। जैनाचार्यों ने संस्कृत को ही नहीं, अपितु अन्य सभी प्रचलित लोक भाषाओं को अपनाकर उन्हें समुचित सम्मान दिया। जहाँ-जहाँ भी वे गये, वहाँ-वहाँ की भाषाओं को चाहे वे आर्य परिवार की हो, चाहे द्रविड़-परिवार की-अपने उपदेश और साहित्य का माध्यम बनाया। 

संस्कृत और प्राकृत भाषा साहित्य को जैन लेखकों ने बहुत समृद्ध किया और समस्त भारतीय पौराणिक सामग्री को अपनी मान्यताओं के साथ समन्वित किया। इससे भारत के आध्यात्मिक चिन्तन को सर्वसाधारण तक पहुँचाने में बड़ी सहायता मिली। विमल सूरी ने प्राकृत भाषा में ’’षडमचरिय’’ (पद्यचरित) लिखकर राम-कथा को जैन रूप दिया। सातवीं सदीं में रविषेण ने ’’पद्यपुराण’’ की रचना की स्वयम्भू ने अपभ्रंश में ’’षडमचरिउ’’ लिखा। आठवीं सदी में जिनसेन द्वितीय ने ’’हरिवंश पुराण’’ की रचना की जो महाभारत और हरिवंश का जैन रूपान्तर था। तेरहवीं सदी में देवप्रभ ने ’’पाण्डव चरित’’ लिखा। सोलहवीं सदी में शुभचन्द्र ने ’’पाण्डव पुराण’’ की रचा की। कथा साहित्य के विकास में तो जैन लेखकों का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। पादलिप्त ने ’’तरंगवती’’ की रचना की। चौदहवीं सदी  में इसी रचना के आधार पर ’’तरंगलीला’’ बनी। आठवीं सदी में हरिभद्र ने ’’समरादित्य कथा’’, दसवीं सदी में सिद्धर्षि ने ’’उपभीति प्रपंच कथा’’, चौदवीं सदी में धर्मचन्द्र ने ’’मलय सुन्दरी कथा’’, और बाद में बुद्धि विजय ने ’’पद्मावती कथा’’, की रचना की। नाटक और गीत काव्य के क्षेत्र में भी जैन लेखकों की बडी ही देन है। उनके लिखे ’’हमीर-मद मर्दन’’ ’’मोहराज पराजय’’ और प्रबुद्ध-रौहिणेय’’ बहुत अच्छे नाटक हैं। नीति दर्शन और व्याकरण, ज्योतिष तथा चिकित्सा पर भी अनेक ग्रन्थों की रचना की गयी। जैन ग्रन्थों की क उपयोगिता इस बात में भी निहित है कि वे प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी के महत्त्वपूर्ण साधन भी हैं।

कला क्षेत्र में-

जैन धर्म की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन कलात्मक-स्मारक, मूर्तियाँ, मन्दिर, मठ और गुफाओं के रूप में आज भी सुरक्षित हैं। उड़ीसा के पुरी जिले में उदयगिरि और खण्डगिरि में 35 जैन गुफाएँ मिली हैं। ऐलोरा में भी कई जैन गुफाएँ हैं। इन गुफाओं में जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियों की कला देखते ही बनती है। मध्य भारत में खुजराहो में कई मन्दिर 10वीं तथा 11वीं शताब्दी के बने हुये हैं। राजस्थान में आबू पर्वत पर प्रसिद्ध देलवाड़ा के जैन मन्दिर हैं, जो संगमरमर के बने हुए हैं। इन मन्दिरों में मूर्ति कला के अलावा बेल-बूटों, तोरण-द्वारों, नक्काशी आदि का काम मन को मुग्ध कर देता है। कठियावाड़ की गिरनार और पालीताना पहाडियों पर, राजस्थान में रणकपुर नामक स्थान पर, बिहार में पारसनाथ और मैसूर में श्रवण-बेलगोला पर जैन मन्दिर के बड़े समूह बने हुये हैं। शत्रुंजय पहाडी पर 500 जैन मन्दिर हैं। यहाँ जैन तीर्थंकर की चतुर्मुखी मूतियाँ भी हैं। श्रेवण बेलगोला से प्राप्त गोमतेश्वर की प्रति दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देती है। यह प्रतिमा 60 फीट ऊँची है और एक पर्वत-शिखर पर स्थित है।
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जैन मन्दिर

इस प्रकार कहा जाता है कि जैन धर्म ने संसार को दुःखमूलक बताकर निराशा की भावना फैलाई है, जीवन में संयम और विराग की अधिकता पर बल देकर उसकी अनुराग भावना और कला-प्रेम को कुण्ठित किया है। परन्तु इस प्रकार के विचार भ्रान्तिमूलक हैं। जैन धर्म ने यह सब कुछ किसलिए किया? अखण्ड आनन्द की प्राप्ति के लिए, शाश्वत सुख की उपलब्धि के लिए। उसमें तो मानव को महात्मा बनाने की आत्मा को परमात्मा बनाने की आस्था का बीज छुपा हुआ है। उसी ने दैववाद के नाम पर अपने को असहाय और निर्बल समझी जाने वाली जनता को आत्म जागृति का सन्देश दिया था। उसी ने मानव हृदय में छिपे पुरुषार्थ को जगाया और मनुष्य को अपने भाग्य का विधाता बनायां जैन धर्म की यह विचारधारा युगों बाद आज भी बुद्धिजीवियों की धरोहर बनी हुई है तथा संस्कृति को वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान कर रही है। 

आधुनिक भारत के नवनिर्माण की सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रवृत्तियों में जैन धर्मावलम्बियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। 

Tuesday, December 17, 2019

hindi kahaniyan

hindi kahaniyan- अभ्यास का महत्त्व

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hindi kahaniyan- अभ्यास का महत्त्व

एक गांव में ब्राह्मण रहता था। उसका एक बेटा था, नाम सुखीराम, अपने पिता के कहने पर गुरु के गुरुकुल में पढ़ने के लिए गया। वह मंद-बुद्धि बालक था तथा पढ़ने में कोई विशेष रुचि भी नहीं रखता था। गुरुजी उसको बहुत समझाते थे, किन्तु उसमें कोई भी बदलाव नहीं आया था। अंत में निराश होकर गुरुजी ने उसे घर भेज दिया।

सुखीराम को घर जाते समय रास्ते में एक कुआँ पड़ा था। वह निराश मन से वहाँ कुछ देर रुक गया। कुएँ की मुंडेर (घाट) पर बैठकर ध्यान से उसके पत्थर को देखने लगा। तब उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उसने देखा किया पत्थर पर काफी गहरे-गहरे निशान पड़े हुए हैं। वह सोचने लगा कि ये निशान इतने मजबूत पत्थर पर कैसे पड़ गए?

रस्सी के बार-बार आने-जाने से कठोर पत्थर पर भी निशान पड़ गए थे। वह सोचने लगा कि बार-बार अभ्यास करने से वह भी मूर्ख से बृद्धिमान बन सकता है। यही सोचकर वह वापस आश्रम की ओर चल दिया। वहाँ गुरुजी को देखकर उस बालक ने उनके चरणों में अपना सिर रख दिया।

उसने रस्सी वाली बात गुरुजी को बता दी। गुरुजी को उसकी लगन देखकर बहुत प्रसन्नता हुई तथा उन्होंने पुनः उसे पढ़ाना आरम्भ कर दिया। सुखीराम प्रतिदिन थोडा-थोड़ा अभ्यास करके पढ़ने लगा। आगे चलकर वह मंदबुद्धि बालक संस्कृत का विख्यात विद्धान बना।

शिक्षा- बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्धान बन जाते हैं। 


Sunday, December 15, 2019

Jainism

जैन धर्म के सिद्धान्त  (Principle of Jainism)


जैन धर्म (Jainism) के कौन-कौनसे सिद्धान्त हैं। दोस्तों इस पोस्ट में इसके बारे में सूक्ष्म जानकारी दी गयी है।

निवृत्ति मार्ग-

जैन धर्म(Jainism) आर्यों के प्रवृत्तिमूलक धर्म के विरुद्ध निवृत्तिमार्ग था। वह आर्यों की भाँति इस संसार के समस्त सुखों की कामना नहीं करता। उसके लिए तो संसार के समस्त सुख दुःखमूलक है, व्याधि रूप है। क्योंकि इनसे कामनाएँ शान्त नहीं होती उल्टे बढ़ती हैं। मनुष्य जन्म और मृत्यु के आवागमन के चक्र से पीड़ित है। गृहस्थ-जीवन में भी उसके लए कोई सुख-शान्ति नहीं है।

जैन धर्म (Jainism) के अनुसार सारा संसार दुःखमय है। इस दुःख का मूल कारण कभी तृप्त न होने वाली तृष्णा है, जिससे मनुष्य आजीवन घिरा रहता है। बौद्ध की भाँति जैन धर्म(Jainism) की मुख्य समस्या भी दुःख और दुःख-निरोध है। उसके अनुसार मनुष्य का सुख सांसारिक सुखों को भोगने में नहीं है, अपितु इस संसार को ही त्यागने में है। मनुष्य को सब कुछ त्याग कर कभी अन्त न होने वाले दुःख को छोड़कर संसार से कोई सम्बन्ध न रखकर, भिक्षु बनकर जीवन व्यतीत करना चाहिए।

इस प्रकार जैन धर्म(Jainism) एक भिक्षु धर्म है। यह निवृत्ति मार्ग है जो आर्यों की प्रवृत्तिमूलक विचारधार के विपरीत था।


Principle-Jain-dharm-mahavir-swami
महावीर स्वामी 

जीव और आजीव-

जैन धर्म (Jainism) मुख्य रूप से दो तत्वों में विश्वास करता है। एक जीव और दूसरा आजीव। दोनों ही तत्त्व शाश्वत हैं, अनादि और अनन्त हैं। इनसे ही मिलकर यह जगत् बनता है। इसीलिए वह अनादि और अनन्त है। जीव ही आत्मा है, दोनों एक ही तत्व हैं। जैन धर्म (Jainism) में आत्मा के अस्तित्व को विश्वास सहित और ज्ञानपूर्वक माना गया है। जीव चैतन्य द्रव्य है और अजीव चेतन्य रहित है। जीव का विस्तार शरीर के अनुसार होता है। इसका कार्य अनुभूति है। अर्थात् सुख-दुःख, सन्देह, ज्ञान आदि सभी का अनुभव होता है। जीवन, अजीव के ढाँचे (शरीर) में रहता है। अजीव अवस्था जड़ पदार्थ को ’’पुद्गल’’ कहते हैं।

पुद्गल उस वस्तु को कहते हैं, जिसे जोड़कर बड़ा किया जा सके। अथवा तोड़कर छोटा किया जा सके। इसका लघुतम भाग परमाणुओं के आपस में मिलने से ही इस भौतिक संसार के विभिन्न रूप बनते हैं, जिनके पाँच गुण हैं। ये इस प्रकार हैं -स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, और शब्द। इस प्रकार जीव और अजीव के मिलने से जगत् की रचना होती है।

जीव और अजीव के सम्बन्ध का माध्यम ’’कर्म’’ है। पुद्गल ही कर्म है जो जीव को घेरे रहता है जैसे खान में धातु मिट्टी में मिली रहती है, इसी प्रकार जीव इस ’कर्म’ नाम के बारीक मैटर से सना रहता है। वह हर समय जीव से चिपटा रहता है। कर्म जीव पर रूप, रंग, रस और गन्ध की विशिष्ट छाप लगाते हैं, जिसे ’’लेश्या’’ (लेस्सा) कहते हैं। इनके पृथक् होना अर्थात् पुद्गल से अलग होना, कर्म के बन्धन को तोड़ना है। कर्म के बन्धन को तोड़ने का अर्थ है- जन्म-मरण और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होना। इसी का नाम ’’मोक्ष’’ है।

बन्ध और मुक्ति-

बन्ध के मुख्य कारण हैं- राग और द्वेष। इनसे ही चार कषायों -क्रोध, मान, माया और लोभ का उदय और विकास होता है। राग और द्वेष जीव में आसक्ति या कामना का दुर्भाव पैदा करते हैं। इससे जीवन अपना विवके खो बैठता है और दुनिया में भटकता रहता है। वह राग और द्वेष से उत्पन्न कषायों -हिंसा, झूठ, चोरी, लोभ आदि का आश्रय लेता है। जैनागमन में ’’कर्म’’ क्रिया को नहीं कहते है बल्कि ’पुद्गल परमाणुओं’ को कहते हैं। पुद्गल परमाणुओं का बहना या बनना ’आश्रव’’ कहलाता है।

यही आश्रव व्यक्ति के कर्मबन्ध का कारण होता है। वह हिंसा आदि को सत्य और पाने योग्य समझकर ज्योंही तद्नुसार आचरण करता है, तो कर्मों के बन्धनों से बँध जाता है। इसी को ’’बन्ध’’ कहते हैं। इसी प्रकार ’आश्रव’ और ’बन्ध’ पुनर्जन्म के मुख्य कारण हैं। राग और द्वेष केवल दुःख ही पैदा नहीं करते अपितु सुख भी पैदा करते हैं। जो कर्म दुःख के कारण होते हैं, उन्हें पाप कहा जाता है और सुख के कारण होते हैं। उन्हें पुण्य कहा जाता है। पाप और पुण्य- दोनों का जन्म आसक्ति के कारण होता है। पुण्य बन्ध से जीव का जो शरीर बनता है वह पाप बन्ध से बनने वाले शरीर से भिन्न किस्म का होता है। पाप बन्ध की अवस्था में जीव पूर्णरूप से कषायग्रस्त हो जाता है। परन्तु पुण्य बन्ध की अवस्था में कषाय जीव की विवके शक्ति को पूरी तरह से दबा नहीं पाते। इसलिए पुण्य बन्ध की अवस्था में जीवन में यह विवेक बना रहता है कि क्या चीज ग्रहण करने योग्य है और क्या चीज छोड़ने योग्य है। इस प्रकार की जिज्ञासा का उदय ही राग-द्वेष पर रोक लगाता है। इस रोक को ’’संवर’’ कहते हैं।

इस संवर के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे संचित कर्म कटते या नष्ट हो जाते हैं। कर्म-नाश की इस प्रक्रिया को ’’निर्जरा’’ कहते हैं। पूर्ण निर्जरा की स्थिति का ही दूसरा नाम मुक्ति है।

निर्वाण-

राग-द्वेष या असक्ति के बन्धन से मुक्ति ही मोक्ष है। मोक्ष का ही दूसरा नाम निर्वाण है। निर्वाण जैन धर्म का चरम लक्ष्य है। इसके लिए कर्म-फल से मुक्ति आवश्यक है। निर्वाण की अवस्था में मनुष्य सभी प्रकार की कामनाओं से मुक्त हो जाता है। उसे अनन्त शान्ति मिल जाती है। निर्वाण का अर्थ अस्तित्व की समाप्ति नहीं है। इसका अभिप्राय जीव के भौतिक अंश के विनाश से है। जीव का अत्मिक तत्त्व कभी समाप्त नहीं होता है। निर्वाण का अर्थ शून्यता, अकर्मण्यता अथवा निष्क्रियता भी नहीं है। निर्वाण प्राप्त व्यक्ति भी विशुद्ध रूप से देख-सुन सकता है। निर्वाण प्राप्ति के लिए एक निश्चित कार्यक्रम या आचार संहिता बनाई गई है, जिसका पालना करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है। इस आचार संहिता के तीन अंग हैं - सम्यक् दर्शन, सम्यक ज्ञान, और सम्यक चरित्र। इसे ’’त्रिरत्न’’ कहा जाता है।

त्रिरत्न-

सम्यक् दर्शन- सम्यक् दर्शन का अर्थ है सही विश्वास या श्रद्धा। जैन धर्म (Jainism) के अनुसार ‘सत्’ में विश्वास रखना ही सम्यक् श्रद्धा है इसके आठ अंग हैं- 
(1) सन्देह को दूर करना, (2) सांसारिक सुखों की इच्छा को मिटाना, (3) आसक्ति-विरक्ति से बचना, (4) गलत रास्ते की तरफ न जाना, (5) अधकचरे विश्वासों से भ्रमित न होना, (6) सही विश्वास पर जमे रहना, (7) सभी के लिए समान प्रेम रखना, (8) जैन सिद्धान्तों में पूर्ण आस्था तथा विश्वास रखना। इसके लिए तीन प्रकार की मूर्खताओं से बचना जरूरी है-
(1) लोक- अन्धविश्वास, (2) देवी-देवताओं के पूजन से पुण्य प्राप्ति की आशा, और (3) छली-कपटी साधु-सन्तों के बहकावे में आना।

सम्यक् ज्ञान- 

सम्यक् ज्ञान का अर्थ है सही विचार। अर्थात् सत् और असत् का भेद समझ लेना। जैन धर्म के अनुसार ज्ञान पॉच प्रकार का होता है- 
(1) मति ज्ञान- जो इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होता है जैसे नाक के द्वारा गन्ध ज्ञान। (2) श्रुतिज्ञान- वह ज्ञान जो सुनकर अथवा वर्णन के द्वारा प्राप्त होता है। इसे शास्त्र-ज्ञान भी कहते है। (3) अवधिज्ञान- दूर देश और काल का ज्ञान। (4) मनःपर्याय- अन्य व्यक्तियों के भावों और विचारों को जान लेने वाला ज्ञान और (5) केवल ज्ञान- देश काल की सीमाओं से परे का सम्पूर्ण ज्ञान। यह पूर्ण ज्ञान है, जो निग्रन्थों को प्राप्त होता है। जीव में पूर्ण ज्ञान रहता है परन्तु भौतिक आवरण के कारण वह छिप जाता है। भौतिक तत्व का नाश होते ही जीव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह “निग्रन्थ” हो जाता है।

सम्यक् चरित्र-सम्यक् चरित्र का अर्थ है सही काम अथवा आचरण। इन्द्रियों जीव के बाह्य उपकरण हैं। और इनकी सहायता से वह बाह्य जगत् की जानकारी प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए ऑख हटा लेगा। अर्थात् सुन्दर दृश्य में उसकी आसक्ति है। परन्तु जो जीव सुन्दर-असुन्दर के भेद के प्रति उदासीन होकर अनासक्त हो जाता है, उसके लिए सभी दृश्य एक समान हो जाते है। इसी को सम्यक् आचरण करते हैं। जैन धर्म के अनुसार बाह्य जगत् के विषयों के प्रति सम दुःख-सुख भाव से उदासीनता ही सम्यक् आचरण है और इसी को सम्यक् चरित्र कहते है।

जैन धर्म (Jainism) के अनुसार पूर्व जन्म के कर्म-फल को नष्ट करने तथा इस जन्म के कर्म-फल से बचने के लिए त्रिरत्नों का पालन करना अति आवश्यक है। इसी से मनुष्य ‘निर्वाण’ की ओर अग्रसर हो सकता है।

पाँच अणुव्रत-  जैन धर्म में चरित्र-निर्माण के लिए दस भाव धर्म की व्यवस्था है। ये दस भाव हैं- क्षमा, मार्दव (कोमलता), आर्जव (सरलता), सत्य, शौच (पवित्रता), संयम, तप, त्याग (दान) अंकिचन्य (परिग्रह त्याग) और ब्रह्मचर्य। इस दस भावों का संक्षेप पॉच भावों में भी किया गया है- अंहिसा (क्षमा, मार्दव और आर्जव), सत्य, अचौर्य (शोच), ब्रह्मचर्य (संयम और तप) और अपरिग्रह (त्याग और किंचनता)। गृहस्थ दशा में इनका पूरा अभ्यास नहीं हो सकता, इसलिए उनका पालन अणुव्रतों के रूप में किया जाता है। साधु दशा में इनका आचरण व्यापक हो जाता है, तब वे महाव्रत बन जाते हैं। अर्थात् गृहस्थियों के लिए अणुव्रत और साधुओं के लिए ’’महाव्रत’’।

अहिंसा- 

अहिंसा महावीर स्वामी की शिक्षा और जैन धर्म के सिद्धान्तों का मूल मंत्र है। अहिंसा का अर्थ प्राणिमात्र के प्रति दया, समानता और उपकार की भावना से है। मन, वचन और कर्म से किसी के प्रति अहित की भावन न रखना ही वास्तविक अहिंसा है। सर्व जीवों के के प्रति संयमपूर्ण जीवन-व्यवहार ही अहिंसा है। परन्तु सांसारिक मनुष्यों के लिए पूर्ण अहिंसाव्रत धारण करना कठिन है। इसलिए गृहस्थों के लिए ’’स्थूल अहिंसा’’ का विधान किया गया है। ’’स्थूल अहिंसा’’ का अर्थ है- निरपराधियों की हिंसा न करना।

सत्य-

अहिंसा के साथ-साथ महावीर स्वामी ने सत्य वचन पर भी बहुत जोर दिया, क्योंकि बिना सत्य भाषण के अहिंसा का पालन करना सम्भव नहीं है। अतः महावीर स्वामी का उपदेश था कि प्रत्येक मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में सत्य बोलना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य को झूठ से बचना चाहिए और सच्चाई के साथ रहना चाहिए।

अस्तेय-

अस्तेय का अर्थ है -चोरी न करना। महावीर स्वामी ने चोरी को महान् अनैतिक कार्य बताया तथा इस दुर्गुण से हमेशा दूर रहने की शिक्षा दी। इसका व्यापक अर्थ है, दूसरों की चीज अथवा हक न लेना।

अपरिग्रह-

अपरिग्रह का अर्थ है - संग्रह न करना। महावीर के अनुसार जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का संग्रह नहीं रखता, वह संसार के माया जाल से दूर रहता है। इसका व्यापक अर्थ है- वस्तुओं और पदार्थों का संग्रह न करना, सम्पत्ति न जुटाना और जो कुछ भी अपने पास हो उसे दूसरों के आराम के लिए प्रस्तु करना।

ब्रह्मचर्य-

उपर्युक्त चारों का पालन तब तक नहीं हो सकता जब तक कि मनुष्य विषय-वासनाओं से दूर नहीं रहता। इसलिए महावीर ने पार्श्वनाथ के इन चार व्रतों में पाँचवा व्रत जोड़कर इन्हें त्रिरत्नों की प्राप्ति के साधन बताये। ब्रह्मचर्य का एक अर्थ शरीर की अपवित्रताओं को दूर करना भी है।

सात शील व्रत-

जैन धर्म के अनुसार पाँच व्रतों के साथ-साथ व्रतों का पालन करना भी जरूरी है। ये इस प्रकार हैं - 
1. दिग्व्रत- अपनी क्रिया को कुछ विशिष्ट दिशाओं में सीमत करना। 2. देशव्रत- अपना कार्य कुछ विशिष्ट देशों तक सीमित रखना। 3. अनर्थ दण्डव्रत- बिना कारण अपराध का भागी न बनना। 4.  सामयिक- अपने ऊपर विचार करने के लिए समय का कुछ भाग निश्चित करना। 5. प्रोषधोपवास- मास के दोनों पक्षों की अष्टमियों और चतुर्दशियों को उपवास करना। 6. उपभोग-प्रतिभोग परिमाण- दैनिक उपभोग की वस्तुओं और पदार्थों को नियमित करना। 7. अतिथि-संविभाग- घर आये साधु या उपासक को भोजन कराने के बाद भोजन करना। जैन धर्म के गृहस्थ अनुनायायियों के लिए इन शील व्रतों का पालन करना आवश्यक था।

पाँच समिति-

जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में पाँच बातों की सतर्कता बरतनी चाहिए-
1. ईर्या समिति- चलते फिरते समय सावधानी रखना ताकि किसी जीव को कष्ट न पहुँचे। 2. भाषा समति- सावधानी से बोलना ताकि किसी मानव को ठेस न पहुँचे। 3. एषणा-समिति- खाना खाते समय सावधानी बरतना, ताकि कोई जीव मर न जाये। 4. आदान निक्षेप समिति- वस्तुओं को उठाते, रखते और प्रयोग करते समय सावधानी रखना जिससे दूसरे को कष्ट न पहुँचे। 5. उत्सर्ग समिति- लघुशंका और दीर्घशंका से निपटते समय सावधानी रखना तथा गन्दी न फैलाना। इन बातों का दैनिक जीवन में प्रयोग करने पर बहुत जोर दिया गया है। ये सभी बातें अहिंसा से ही सम्बन्धित हैं।

अनेकान्तवाद अथवा स्याद्वाद-

जैन धर्म का जो दर्शन है उसके अनुसार वस्तु के अनन्त स्वरूप हैं। केवल ज्ञानी अथवा जीवनमुक्त या अर्हत् ही उन स्वरूपों की अनन्तता को जानते हैं। शेष लोग तो उसके कुछ स्वरूपों को ही जानते हैं। ज्ञान की यह विभिन्नता सात प्रकार की हो सकती है- 
1. है। 2. नहीं है। 3. है और नहीं है। 4. कहा नहीं जा सकता। 5. है, किन्तु कहा नहीं जा सकता। 6. नहीं है और कहा नहीं जा सकता। 7. है और नहीं, किन्तु कहा नहीं जा सकता। जैन धर्म में इसे अनेकान्तवाद, स्याद्वाद अथवा सप्त भंगी का सिद्धान्त कहते हैं।

तपस्या और उपवास-

महावीर ने आत्मा को वश में करने तथा पाँच आचरणों का पालन करने के प्रयत्न में तपस्या और उपवास पर अधिक बल दिया। उन्होंने दो प्रकार की तपस्या बतलाई- एक बाह्य और दूसरी आन्तरिक। बाह्य तपस्या में व्रत, अन्नत्याग, भिक्षाचार्य तथा कष्ट सहन करना मुख्य हैं। आन्तरिक तपस्या में नम्रता, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान तथा शरीर त्याग सम्मिलित हैं। बाह्य तपस्या करने से व्यक्ति में आन्तरिक तपस्या करने की क्षमता आती है। और उससे आदमी में अच्छे विचारां का विकास होता है। महावीर स्वामी ने तपस्या का सबसे सरल उपाय उपवास बताया है। इससे शरीर एवं आत्मा शुद्ध होती है और मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है।

इसके अलावा महावीर स्वामी ने उस युग में प्रचलित धार्मिक और सामिजिक बुराइयों के सम्बन्ध में कई बातें बताई थीं, जोकि निम्नवत् हैं-

1. वेदों को मान्यता नहीं - महावीर ने सैद्धान्तिक दृष्टि से ब्राह्मण धर्म के वेदवाद, यज्ञवाद और कर्मकाण्ड का विरोध किया। उनका कहना था कि यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि वैदिक प्रान ही एकमात्र पूर्ण और निर्विवाद है। अतः महावीर स्वामी ने वेद-प्रमाण्य को अस्वीकृत कर दिया। उसके अनुसार वेद ईश्वरीय कृति न होकर मानव कृति थे। इसलिए उन्होंने वैदिक यज्ञों तथा कर्मकाण्डों का घोर विरोध किया तथा जीवन में नैतिकता ओर अच्छे नियमों के पालन पर जोर दिया।

2. ईश्वर सम्बन्धी विचार- जैन धर्म का ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास था या नहीं, इस विषय पर विद्वानों में काफी समय तक मतभेद बना रहा। परन्तु अब यह निश्चित हो गया कि जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं करता। वह ईश्वर को इस सृष्टि का निर्माता नहीं मानता। उसके अनुसार संसार वास्तविक है और इसका कभी भी मूलतः विनाश नहीं होता। 

संसार 6 द्रव्यों का समुदाय है। ये द्रव्य हैं-जीवन, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश  और काल। ये सभी द्रव्य शाश्वत हैं, नित्य हैं और अनश्वर हैं। अतः यह सृष्टि भी अनादि और अनन्त है। उपर्युक्त द्रव्यों में जो उत्पाद-व्यय होता है, इनका जो संगठन-विघटन होता है, उसी के कारण इनसे निर्मित पदार्थों का रूप-परिवर्तन होता रहता है। इसमें ईश्वर की सहायता अथवा हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ती। महावीर स्वामी का विचार था कि मनुष्य की आत्मा में जो कुछ महान् है और शक्ति और नैतिकता है, वही भगवान् है।

3. आत्मावाद- ईश्वर के अस्तित्त्व में विश्वास न रखते हुए भी जैन धर्म में अनात्मवादी नहीं है। महावीर स्वामी आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे। उनके अनुसार प्रकृति में परिवर्तक हो सकते हैं। किन्तु आत्मा अजर-अमर है और सदैव एक-सी बनी रहती है। वे जीव को ही आत्मा मानते हैं और उसके अनुसार जीव कवल मनुष्य कह सकते हैं।
डॉ0 राधाकृष्णन ने कहा है कि ’’ईश्वर मनुष्य की आत्मा में अन्तनिर्हित शक्तियों का उच्चतम श्रेष्ठतम और पूर्णतम व्यक्तीकरण मात्र है।''

4. पुनर्जन्म और कर्मवाद- जैन धर्म ईश्वर में विश्वास नहीं करता। वह मनुष्य को स्वयं अपना भाग्य विधाता मानता है। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्नति अवनति स्वयं उसके कर्मों पर निर्भर करती हैं इस दृष्टि से जैन धर्म कर्म की प्रधानता को स्वीकार करता है। उसका विश्वास है कि पूर्व जन्म के कर्मों से ही इस बात का निर्णय होता है कि किस वंश में हमारा जन्म होगा और कैसा हमारा शरीर होगा। क्योंकि अपने सांसारिक एवं आध्यात्मिक जीवन में मनुष्य जो भी कर्म करता है, उसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। मनुष्य के समस्त सुख-दुख का कारण उसके अपने कर्म ही हैं।

मनुष्य के कर्मों के कारण पैदा होने वाली सांसारिक वासना के बन्धनों से आत्मा का बार-बार आवागमन होता रहता है और जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। किए हुए कर्मों का फल भोगे बिना जीव का छुटकारा नहीं हो सकता। इस प्रकार कर्म ही पुनर्जन्म का कारण है। इसलिए महावीर स्वामी का कथन है कि यदि वासनाओं पर विजय कर ली जाये तो कर्मों क बन्धन नष्ट हो सकेंगे और कर्म फल से विमुक्ति ही निर्वाण-प्राप्ति का साधन है। उनका उपदेश था, ’’मनुष्य अपने पूर्व जन्म के कर्म फल का नाश करें और इस जन्म में किसी प्रकार का कर्म-फल संगृहीत न करें।’’ ऐसा करने से मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जायेगी।

5. सामाजिक समानता- जैन धर्म मुख्यतः सामाजिक समानत के सिद्धान्त पर आधारित था। महावीर ने ब्राह्मणों की वर्ण-व्यवस्था का घोर विरोध किया था और बिना किसी भेद-भाव के अपने धर्म का द्वारा सभी वर्णों के लिए खोल दिया था। उनकी मान्यता थी कि सभी देहधारियों की आत्मा एक-सी है। मोक्ष प्राप्ति के लिए किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं किया जा सकता है। इसका मुख्य आधार यह था कि चूंकि निर्वाण पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त था, और पुरुषार्थ कोई भी व्यक्ति कर सकता था, इसलिए भेद-भाव की आवश्यता नहीं होनी चाहिए। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि महावीर स्वामी के बाद उनके अनुयायी उनके इस सिद्धान्त को पूर्णतः व्यवहार में न लागू कर सके और उनमें जाति-भेद के संस्कार विद्यमान रहे। यही कारण है कि जैन धर्म शूद्रों को न अपना सका।

6. नारी स्वातन्त्र्य- पार्श्वनाथ ने नारियों को भी निर्वाण-प्राप्ति की अधिकारिणी माना था। महावीर स्वामी ने भी उनके विचारों का अनुसरण किया। उन्होंने भी अपने धर्म तथा संघ के द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिये थे। परिणामस्वरूप अनेक स्त्रियों ने भी जैन धर्म की दीक्षा ली। पुरुषों की भॉति स्त्रियों के भी दो वर्ग थे- एक श्रमणियों का और दूसरा श्राविकाओं का।

जैन धर्म का इतिहास


धन्यवाद् दोस्तों, अगले अंक में हम जैन धर्म में विभाजन एवं जैन धर्म की भारतीय संस्कृति योगदान के बारे में प्रकाश डालेंगे।

Friday, December 13, 2019

Jain Dharm ka Itihas

Jainism जैन धर्म


भारतीय इतिहास में ईसा पूर्व छठी शताब्दी भी अपना विशेष महत्त्व रखती है। इस समय को सामान्यतया बौद्धिक एवं अध्यात्मिक उथल-पुथल का समय माना जाता है। प्राचीन युग में भारत, चीन, ईरान, और यूनान ने समृद्ध संस्कृतियों का विकास किया था। परन्तु ईसा पूर्व छठी शताब्दी आते-आते धर्म और समाज के क्षेत्र में रूढ़िवादिता, अन्धविश्वासों और जटिल कर्मकाण्डों तथा पुरोहितों के बढ़ते हुये एकाधिकार के कारण प्राचीन सभ्यताओं का रूप विकृत हो गया, जिसके परिणामस्वरूप तर्कशील और मननशील लोगों का प्राचीन मान्यताओं एवं परम्मपराओं से विश्वास ठ गया और वे सत्य की खोज में लीन हो गये।

इस प्रकार इस युग में लोगों में बौद्धिक एवं तार्किक चिन्तन का विकास हुआ और वे किसी भी बात को स्वीकार करने से पूर्व उसे परखना चाहते थे। उनके मन में अपनी पुरानी मान्यताओं एवं विश्वासों की सत्यता को जानने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो रही थी। वे लोग लोक और परलोक के विषयों का तर्कसंगत अनुसन्धान कर, उसे सर्वसाधारण के लिए सुलभ एवं सरल बनाना चाहते थे। उनके इस चुनौती भरे प्रयास से प्राचीन सभ्यताओं की मान्यताओं की जड़े उखड़ने लगीं। इस दृष्टि से हम इस युग को धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आन्दोलन का युग भी कह सकते हैं। यह सुधारवादी आन्दोलन विश्वव्यापी था।

प्रत्येक सभ्य देश में कुछ ऐसे मननशील विचारकों ने जन्म लिया जिन्होंने परम्परागत धार्मिक अन्धविश्वासों तथा रूढ़ियों और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने प्रयास किया तथा मानव जीवन को एक नई दिशा प्रदान करने का प्रयास किया।

इस सुधारवादी आन्दोलन का नेतृत्व चीन में महात्मा कन्फ्यूशियस और लाओत्से ने, यूनान में हिराक्लिटस और पाइथोगोरस ने ईरान में महात्मा जरथुष्ट ने और भारत में महावीरस्वामी तथा महात्मा बुद्ध ने किया। इन प्रचारक महापुरुषों के प्रयास से मनुष्य के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तक हुये जिससे मानव सभ्यता समृद्ध एवं अधिक विकसित हुई।

भारत में सामाजिक एवं धार्मिक जागृति के कारण

ऋग्वैदिक काल के आर्यों का धर्म यज्ञ प्रधान होते हुए भी सरल था। उस समय के यज्ञ अति सरल, शुद्ध ओर व्यक्तिगत होते थे, जिसमें किसी प्रकार का आडम्बर  नहीं होता था। प्रत्येक मनुष्य स्वयं मन्त्रों का उच्चारण कर यज्ञों को सम्पादित करने में समर्थ था। सामाजिक व्यवस्था भी कर्म पर आधारित थी। परन्तु धीरे-धीरे वैदिक धर्म का स्वरूप जटिल एवं कठिन हो गया। यज्ञ पुरोहित प्रधान बन गये और वे अत्यधिक जटिल जटिल भी बन गये तथा कर्म पर आधारित वर्ण व्यवस्था के स्थान पर व्यवस्था जन्म प्रधान हो गयी। यज्ञों तथा कर्मकाण्डों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया ओर उनमें आड़म्बरों का प्रवेश हो गया।

ईसा पूर्व छठी शताब्दी तक आते-आते आर्यों की सरल धार्मिक एवं उदार सामाजिक व्यवस्था में अनेक रूढ़ियाँ, बन्धन एवं विकृतियाँ उत्पन्न हो गयीं, जिसके फलस्वरूप सामान्य एवं निम्न स्तर के लोगों को कई प्रकार की सुविधाओं से वंचित होकर दयनीय जीवन बिताने के लिए विवश होना पड़ा। महावीर तथा महात्मा बुद्ध ने इस स्थिति को सुधारने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, उनके समय में होने वाली सामाजिक एवं धार्मिक जागृति के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

ब्राह्मणों का प्रभुत्व-

अपने साधनामय सरल जीवन और ज्ञान के कारण वैदिक युग में ब्राह्मण वर्ण की स्थिति सर्वोपरि हो गई थी। वह पठन-पाठन के माध्यम से समाज की बौद्धिक एवं आध्यात्मिक तथा धार्मिक जरूरतों को पूरा करता था। इस प्रकार उन्हें सम्पूर्ण समाज श्रद्धा की दृष्टि से देखता था।

पौराणिक काल तक आते-आते समाज में ब्राह्मणों का प्रभुत्व सर्वोपरि हो गया था। यज्ञों तथा धार्मिक कर्मकाण्डों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ ब्राह्मणों की प्रधानता भी बहुत अधिक बढ़ गई। क्योंकि उस युग में जीवन की प्रत्येक समस्या को सुलझाने का एकमात्र आधार वेद ही माने जाते थे। और वेदों को पढ़ने और उनकी व्याख्या करने का विशेषाधिकार ब्राह्मण वर्ग के पास ही था। जन्म से लेकर मृत्यु तक ऐसा कोई भी काम नहीं बचा था, जो कि ब्राह्मणों से पूछे बिना पूरा हो सके। इससे ब्राह्मण वर्ग अत्याचारी, अहंकारी और शोषक बन गया। ब्राह्मणों के इस प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिक्रिया उठना स्वाभाविक ही थी। जैन एवं बौद्ध मत- ब्राह्मण प्रभुत्व के विरुद्ध उत्पन्न प्रतिक्रिया के ही परिणाम थे।

ब्राह्मणों के प्रभुत्व को सर्वप्रथम पूर्वी भारत में चुनौती मिली। ब्राह्मणों के विरुद्ध असन्तोष का एक बड़ा कारण वेद-वाद था। ब्राह्मणों के सभी ग्रन्थ वेदों पर आधारित थे। ब्राह्मणों की दृष्टि में वेद ईश्वर-प्रदत्त थे। अतः वे वेदों को ही धर्म का मूल समझते थे। वेद विरुद्ध कोई भी बात ब्राह्मणों की दृष्टि में अधर्म थी। परन्तु इस समय तक समाज में एक ऐसे प्रबुद्ध वर्ग का उदय हो चुका था, जो वेदों को पूर्ण मानने को तैयार नहीं था। उनकी दृष्टि में वैदिक ज्ञान भी सीमित था और उसमें भी त्रुटियाँ थीं। उनका मानना था कि केवल वेद मन्त्रों में आस्था रखने और मन्त्रों का उच्चारण करते रहने से हम अपनी सभ्यता का अधिक विकास नहीं कर पायेंगे। उपनिषदों में भी इसी प्रकार की भावना दिखाई देती है। बौद्ध साहित्य में ऐसे बहुत से साक्ष्य उपलब्ध हैं, जिनसे पता चलता है कि समाज का एक वर्ग वेद-प्रामाण्य के विषय को लेकर ब्राह्मणों का कट्टर आलोचक बनता जा रहा था। महावीर स्वामी जी और महात्मा बुद्ध ने भी इसी प्रकार के विचारों को व्यक्त किया था।

बहुदेववाद- 

वैदिक धर्म बहुदेववादी था। उसमें अनेक देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। सृष्टि की लगभग सभी शक्तियाँ देव समूह में सम्मिलित थीं। राजा-रानियाँ और बड़े-बड़े शूरवीरों को भी देवताओं की पंक्ति में बैठा दिया था। इन समस्त देवी-देवताओं को संतुष्ट करने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ, होम, उपासना, जप-तप आदि किया जाता था। धीरे-धीरे पुनः इस युग में ऐकेश्वरवाद ने जोर पकड़ने लगा और लोग सोचने लगे कि जब सर्वत्र ब्रह्म व्याप्त है, तो इतने सारे देवी-देवताओं की उपासना करना व्यर्थ है। उनका यह भी मानना था कि मनुष्य को अपने आत्मोत्कर्ष के लिए देवताओं पर निर्भर रहने की आवश्यकता है। मानव के कर्म ही उसके भाग्य विधाता हैं। इस प्रकार की विचारधारा के विकास के कारण बहुदेववादी ब्राह्मण-धर्म के विरुद्ध विरोध होना स्वभाविक ही था।

यज्ञ एवं कर्मकाण्ड-

वैदिक काल के प्रारम्भ में आर्यों का धर्म सरल तथा आडम्बरहीन था। वे अपने यज्ञ और अनुष्ठान स्वयं कर लेते थे। इसके लिए पुरोहित की सहायता की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे इसमें कर्मकाण्ड और विभिन्न प्रकार के विधि-विधानों की प्रधानता बनी एवं पुरोहितों की सहायता लेना आवश्यक हो गया। इस प्रकार पुरोहितों का महत्त्व बढ़ गया। उन्हें भी देवताओं के समान समझा जाने लगा। पहले एक पुरोहित से काम चल जाता था। बाद में इनकी संख्या 7 हो गई और सात से बढ़कर 17 हो गई। उस समय कुछ यज्ञ तो ऐसे हो गये जो वर्षों तक चला करते थे।

इस प्रकार ब्राह्मणों ने यज्ञों को अपनी रोटी-रोजी का मुख्य साधन बना लिया था और इसका अधिक समय तक लाभ उठाने के कामना से उन्होंने धर्मिक यज्ञों को कर्मकाण्डी, अधिक जटिल, कठोर एवं खर्चीला बना दिया। अनेक देवी-देवताओं की कल्पना की गई और उनकी पूजा होने लगी तथा यज्ञों में पशुबलि व अत्यधिक जोर दिया जाने लगा। इस प्रकार साधारण व्यक्ति को ऐसे यज्ञों को करवाना असम्भव हो गया।

दूसरी तरफ ब्राह्मणों वर्ग ने कर्म के आधार पर पुनर्जन्म और स्वर्ग-नरक की धारणाएँ पैदा करके जनता का शोषण करना शुरु कर दिया। इस स्थिति में जादू-टोना, झाड-फूंक, मन्त्र-तन्त्र आदि अन्धविश्वास समाज में बढ़ने लगे। ऐसी स्थिति में सामान्य लोगों में विरोध की भावना पैदा होना स्वभाविक था, क्योंकि वे लोग मौजूदा धर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने में असमर्थ थे और उन्हें भी मोक्ष प्राप्त करने की अभिलाषा थी। विरोध का दूसरा कारण पशुबलि था। तीसरा कारण आडम्बर, रूढ़िवाद एवं अन्धविश्वास था। यही कारण था कि जब महावीर तथ बुद्ध ने धर्म के सरल स्वरूप को प्रस्तुत किया तो लाखों में संख्या में लोग शीघ्र ही उनके अनुयायी बन गये।

वर्णों का आपसी संघर्ष-

आर्यों की प्रारम्भिक सामाजिक व्यवस्था काफी उदार तथ लचीली थी। उस समय की वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी और कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था। चारों वर्णों का समाज में समान महत्त्व था। परन्तु धार्मिक जटिलता के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था भी जटिल होने लगी। अब चारों वर्णों की निश्चित सीमाएँ बाँध दी गई और कर्म का स्थान जन्म ने ले लिया था। प्रारम्भ में तो ब्राह्मणों को अपने साधनामय सरल जीवन के लिए समाज में सर्वोपरि स्थान दिया गया था। क्षत्रिय को देश की रक्षा तथा शासन-व्यवस्था का भार सौंपा गया था। इस प्रकार समाज में उनकी स्थिति श्रेष्ठ थी। ब्राह्मण वर्ग अपनी सुरक्षा तथा आजीविका के लिये क्षत्रिय वर्ण पर आश्रित था। परन्तु बाद में क्षत्रियों को ब्राह्मणों की प्रभुता अखरने लगी। वे अपने आपको ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानने लगे।

उपनिषद्काल में ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष और अधिक बढ़ गया। इस काल में क्षत्रियों ने भी दार्शनिक एवं अध्यात्मिक क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा कायम करने का प्रयत्न किया। भारतीय दर्शन की एक विशेष शाखा में ’’ब्रह्मविद्या’’ की स्थापना का श्रेय क्षत्रिय विद्वानों को ही है। ब्राह्मण और क्षत्रियों के इस संघर्ष की झलक साहित्यिक रचनाओं में भी मिलती है। उदाहरणार्थ- अनेक ब्राह्मण ग्रन्थों में जहाँ कहीं भी चतुर्वर्णों का उल्लेख है, वहाँ सदैव पहले ब्राह्मणों का ही उल्लेख मिलेगा, बाद में क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का। इसके विपरीत जितने भी बौद्ध-ग्रन्थ हैं उनमें पहले क्षत्रिय वर्ण का उल्लेख मिलेगा और फिर ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र वर्णों का।

क्षत्रियों की इस चुनौती ने भारत में धर्म-सुधार आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। वैश्य वर्ग के पास धन-सम्पत्ति की कमी नहीं थी, परन्तु ब्राह्मण वर्ग उसे अपने बराबर का सम्मान देने को तैयार नहीं थे। वैश्यों में भी ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न हो गया और उन्होंने क्षत्रियों का साथ दिया। शूद्र लोग तो उपेक्षित जीवन बिता रहे थे। उन्हें मौजूदा धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्था से कोई लगाव नहीं था। यही कारण है कि जब महावीर स्वामी और महात्मा बुद्ध ने एक नवीन धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था प्रस्तुत की तो क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों ने उसका स्वागत किया।

अन्य कारण-

उपरोक्त कारणों के अलावा कुछ अन्य कारण भी थे। इस समय बोलचाल की भाषा प्राकृत तथा पालि थी। परन्तु समस्त धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में थे। धार्मिक कर्मकाण्ड भी संस्कृत भाषा में संकलित कराये जाते थे। केवल ब्राह्मण वर्ग ही इस भाषा में दक्ष होता था। सामान्यता जनता को न तो संस्कृत लिखना-पढ़ना आता था और न वह संस्कृत में बोले जाने वाले मन्त्रों का अर्थ समझा पाती थी। इस प्रकार भाषा के विरुद्ध भी असन्तोष उठ रहा था। जनता उस समय किसी सरल भाषा के उपयोग के लिये उत्सुक थी, जिसको वे समझ सकें।

धर्म सुधार आन्दोलनों को औपनिषद्क विचारधारा से भी महत्त्वपूर्ण प्रेरणा मिली थी। उपनिषदों में वैदिक धर्म की बुराइयों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया गया था और इन बुराइयों का विरोध भी किया गया।उपनिषदों के कर्मकाण्ड की भी पर्याप्त आलोचना की गई। उनके अनुसार यज्ञ करने और कराने वाले को बुद्धिहीन कहा गया। उपनिषदों ने ज्ञान की प्राप्ति को मोक्ष का साधन बताकर अहिंसा तथा आचरण की पवित्रता पर जोर दिया गया। उपनिषदों ने ही जैन धर्म एवं बौद्धमत की पृष्ठभूमि तैयार की थी।

छठी शताब्दी ई0पू0 तक आते-आते लोग इन धार्मिक रूढ़ियों तथा सामाजिक बन्धनों से ऊब गये थे। वैदिक धर्म तथा धार्मिक कर्मकाण्डों एवं उस समय की सामाजिक व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठने लगा था। इस प्रकार भारतीय समाज में प्रचलित यज्ञवाद, वेदवाद एवं बहुदेववाद के साथ ब्राह्मणों के नैतिक पतन, ब्राह्मण प्रतिस्पर्धा एवं सामजिक असन्तोष ने मिलकर आन्दोलकर का रूप धारण कर लिया।

Jainism जैन धर्म


जैन धर्म(Jainism) ईसा पूर्व छठी शताब्दी की देन नहीं है। जैन साहित्य एवं परम्परा के अनुसार जैन धर्म(Jainism) आर्यों के वैदिक धर्म से भी पुराना है। जैन धर्म(Jainism) की स्थापना एवं विकास में योगदान देन वाले विद्वान, महात्माओं को ’’तीर्थंकर’’ कहा गया है। और ऐसा माना जाता है कि महावीर स्वामी के पहले 23 जैन तीर्थंकर हुये थे। पहले तीर्थंकर ’’ऋषभदेव’’ थे और तेईसवे तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। प्रथम बाईस तीर्थंकर की ऐतिहासिकता के बारे में विद्वानों को शंका है। लेकिन हाँ तेईसवे तीर्थंकर अवश्य ऐतिहासिक पुरुष थे।

पार्श्वनाथ-

जैन साहित्य के अनुसार पार्श्वनाथ का जन्म महावीर स्वामी से लगभग 250 वर्ष पूर्व आठवीं सदी ईसा पूर्व में हुआ था। उनका उल्लेख ब्राह्मण साहित्य में भी मिलता है। वे काशी के राजा अश्वसेन (अससेन) के पुत्र थे। इनकी माता का नाम वामा था। इनका विवाह कुशस्थल की राजकन्या प्रभावती के साथ हुआ था। 30 वर्ष की अवस्था तक इन्होंने वैभव-विलास का जीवन व्यतीत किया। उसके बाद ग्रहस्थ जीवन को त्याग कर सत्य की खोज में निकल पड़े। 83 दिनों की घोर तपस्या के बाद सम्मेद पर्वत पर इन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्रप्ति के बाद लगभग 70 वर्ष तक इन्होंने धर्म-प्रचार का काम किया तथा 100 वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हो गई।

पार्श्वनाथ द्वारा प्रशस्त मार्ग का अनुसरण करने वाले ’’निग्रन्थ’’ कहलाये, क्योंकि सांसारिक बन्धनों (ग्रन्थियों) से विमुक्त हो जाते थे। उनके अनुयायियों की संख्या काफी थी। महावीर स्वामी जी के माता-पिता भी पार्श्वनाथ के अनुयायी थे। जैन साहित्य में पार्श्वनाथ के अनुयायिनी स्त्रियों का भी उल्लेख मिलता है। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयायियों को संगठित करने के लिए चार गणों (संघो) की स्थापना की थी।

पार्श्वनाथ ने अपने अनुयायियों को चार सिद्धान्तों पर चलने को कहा। अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह। पार्श्वनाथ ने ब्राह्मणों के बहुदेववाद और यज्ञवाद का विरोध किया। वे वेदों की प्रमाणिकता में भी विश्वास नहीं रखते थे। हिंसात्मक यज्ञों के तो वे घोर विरोधी थे। इसी प्रकार जन्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था में ही उनका विश्वास नहीं था। उनके मत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य मोक्ष का अधिकारी है।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं थे। उनके जन्म से सैकड़ों वर्ष पूर्व जैन धर्म सुसंगठित हो चुका था। उसके अपने विधि-विधान थे। जीवन-यापन की विशेष व्यवस्था थी। उनके अपने चार(अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह) संघ थे। प्रत्येक संघ एक-एक गणधर की देख-रेख में काम करता था। महावीर स्वामी जी ने उनकी मौजूदा व्यवस्था में सुधार करके उसे लोकप्रिय बनाया। इसलिए कुछ विद्वान उन्हें जैन धर्म का सुधारक मानते हैं।

महावीर स्वामी की जीवन


जैन धर्म(Jainism) के चौबीसवें तथा अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के समीप कुण्डग्राम में ज्ञातृक क्षत्रिय कुल में 599 0र्पू0 (कुछ विद्वानों के अनुसार 540 0पू0) के आसपास हुआ था। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रियों के छोटे से राज्य कुण्डग्राम के सरदार थे। महावीर की माता का नाम त्रिशला था। वह लिच्छवी वंश के प्रसिद्ध राजा चेटक की बहिन थी। महावीर स्वामी का बचपन का नाम वर्धमान था। उनके जन्म पर ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि बड़ा होने पर वह या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा अथवा परमज्ञानी भिक्षु। वर्धमान को बचपन से ही क्षत्रियोचित शिक्षा दी गई थी। युवावस्था में उनका विवाह यशोदा नाम सुन्दर राजकन्या के साथ किया गया। इस वैवाहिक सम्बन्ध से उनके एक पुत्री भी हुई, जिसका विवाह जमालि नाम क्षत्रिय सरदार के साथ किया था। वर्धमान जब 30 वर्ष के हुए तब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। इस घटना से उनकी निवृत्ति प्रवृत्ति और भी अधिक मजबूत हो गयी और उन्होंने अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से आज्ञा लेकर गृह-त्याग कर दिया और वे भिक्षु बन गये।

भिक्षु महावीर ने एक वर्ष एक मास तक वस्त्र धारण किये और घोर तपस्या की। परन्तु उन्हें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता न मिली। इससे वह असन्तुष्ट होकर पार्श्व के सम्प्रदाय को छोड़ दिया और अकेले ही तपस्या करने लगे। उनके वस्त्र जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गये थे। वर्धमान ने नंगे रहना प्रारम्भ किया। उनके नग्न शरीर पर अनेक प्रकार कीटाणु चढ़ने लगे और उन्हें काटने लगे। परन्तु बारह वर्ष तक वे अपने शरीर की पूर्णतः उपेक्षा कर सब प्रकार के कष्ट सहते रहे।

उन्हांने संसार के समस्त बन्धनों को त्याग कर सर्वथा निर्लिप्त हो गये। अन्त में जम्भियगाम (जुम्भिका) के समीप उज्जुवालिया (ऋजुपालिका) सरिता के तट पर महावीर को कैवल्य (ज्ञान) प्राप्त हुआ। उसी समय उन्हें ’’केवलिन्’’ की उपाधि मिली। अपनी इन्द्रियों को जीत लेने के कारण वे ’’जिन’’ कहलाये। तपस्या के समय अद्वितीय साहस दिखलाने के कारण वे महावीर’’ के नाम से पुकारे जाने लगे। उन्होंने समस्त सांसारिक बन्धनों को तोड़ दिया था। इसलिए वे ’’निग्रन्थ’’ भी कहलाये।
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चौबीसवें तथा अन्तिम तीर्थंकर

सत्य का ज्ञान हो के बाद महावीर स्वामी जी ने जनता को जीवन-यापन का सही मार्ग दिखाने का कार्य प्रारम्भ किया। जनता में अपने विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमने लगे। मगध, काशी, कोसल आदि राज्य उनके प्रचार क्षेत्र थे। क्योंकि महावीर स्वामी का कई राजवंशों से निकटता का सम्बन्ध था। इसलिए उन राजवंशों से उन्हें अपने धर्म-प्रचार में काफी सहायता मिली होगी। स्वामी जी सत्यवाणी तथा जीवन के सरल मार्ग से प्रभावित होकर सैकड़ों लोग उनके अनुयायी बनने लगे। राजा-महाराजा, वैश्य-व्यापारी तथा अन्य सामान्य लोग उनकी बातों का अनुसरण करने लगे। इस प्रकार उनके अनुयायियों की संख्या काफी हो गई। 

जैन साहित्य से पता चलता है कि लिच्छवी राज्य का चेटक, अवन्ती का प्रद्योत, मगध के बिम्बिसार और अजातशत्रु, चम्पा का दधिवाहन और सिन्धु-सौवीर का उदयन आदि राजा महावीर के प्रति परम श्रद्धा भाव रखते थे। और वे उनके अनुयायी बन गये। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार बिम्बिसार और प्रद्योत महात्मा बुद्ध के अनुयायी थे। इस प्रकार हमें पता चलता है कि उस युग के हिन्दू शासक धार्मिक दृष्टि से काफी उदार एवं श्रद्धा भाव रखते थे। वे ज्ञानी पुरुषों का आदर सत्कार करते थे।

अन्त में 527 0पू0 (कुछ विद्वानों के अनुसार 467 0पू0) के आस-पास 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (पटना) में महावीर स्वामी को मोक्ष प्राप्त हुआ। उनकी मृत्यु के बाद भी उनका धर्म खूब फलता-फूलता रहा और वह आज विद्यमान है।

महावीर स्वामी और पार्श्वनाथ के सिद्धान्तों में ज्यादा मतभेद नहीं था। पार्श्वनाथ ने चार व्रतों की आवश्यकता पर जोर दिया था, वहाँ महावीर स्वामी जी ने ’’ब्रह्मचर्य’’ नाम एक और व्रत जोड़कर पाँच व्रतों पर जोर दिया। पार्श्व ने अपने अनुयायियों को वस्त्र पहनने की स्वीकृति दे दी थी, परन्तु महावीर स्वामी ने जैन भिक्षुओं को निर्वस्त्र रहने को कहा था।