Saturday, November 30, 2019

Indus Valley of civilization

सिन्धु सभ्यता का विनाश  (Destruction of indus civilization)

पिछले अंक में हमने सिन्धुवासियों के सामाजिक जीवन के बारे में प्रकाश डाला था। आइए दोस्तों इस अन्तिम अंक में हम सिन्धु सभ्यता के विनाश एवं सिन्धु सभ्यता एवं वैदिक सभ्यता के जन्मदाता के बारे में अध्ययन करेंगे।

सिन्धु सभ्यता का विनाश कैसे हुआ? इस प्रश्न पर काफी भ्रान्तियाँ हैं। खुदाई में सात सतहें प्राप्त हुई हैं, जिससे पता चलता है कि यहाँ की सभ्यता का कई बार विनाश हुआ और कई बार निर्माण हुआ था। बार-बार विनाश और बार उसी स्थान पर पुनर्निर्माण करना सिद्ध करता है कि सिन्धुवासी अंधविश्वासी एवं रूढ़ीवादी थे। कई बार विनाश का कारण सिन्धु नदी में आयी बाढ़ भी होगी।
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Indus Valley Civilization Destruction


 कुछ विद्धानों का मानना है कि सिन्धु नदी ने धीरे-धीरे अपना मार्ग बदलने कारण यह प्रदेश सूखा हो गया और वहाँ लोग अन्य स्थानों पर चले गये। कुछ विद्धानों का मानना है कि सिन्धुवासी लोग शान्तिप्रिय थे। वे आये दिन आर्यों के आक्रमणों से परेशान होकर दक्षिण भारत की ओर चले गये। आर्यों के धर्मग्रन्थ में इस बात की पुष्टि होती है कि उन्होंने सिन्धुवासियों के भव्य नगरों एवं दुर्गों को नष्ट किया था। वास्तविक कारण का पता ही नहीं चला पाया।
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Indus Valley Civilization Destruction

Indus Valley & Vadik Sabhyata

सिन्धु सभ्यता और वैदिक सभ्यता - डॉ0 लक्षमणस्वरूप का मत है कि ''सिन्धु सभ्यता और वैदिक सभ्यता दोनों के जन्मदाता आर्य थे और वैदिक सभ्यता सिन्धु सभ्यता से भी अधिक प्राचीन थी।'' परन्तु अधिकांश विद्धान इस मत को स्वीकर नहीं करते हैं क्योंकि दोनों  सभ्यताओं में काफी विषमता देखने को मिलती है। सिन्धु सभ्यता में नागरीय एवं व्यापार प्रधान थी। विषाल भवन, चौड़े-चौडे राजमार्ग, सुव्यवस्थित नालियाँ, सुव्यवस्थित नगर, स्वशासन और नागरिक जीवन की सुख-सुविधाएँ हिन्दू सभ्यता की विशेषताएँ थीं। 

इसके विपरीत वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी। आर्य गांवों और आश्रमों में रहते थे। सिन्धु सभ्यता व्यापर प्रधान थी। उसमें घरेलू उद्योग-धन्धों के साथ-साथ बड़े कुटीर उद्योग भी प्रचलित थे। इसके विपरीत वैदिक सभ्यता कृषि प्रधान थी। वे लोग पशुपालन तथा ग्रामीण उद्योग-धन्धों को अधिक महत्त्व देते थे आर्यों के जीवन में घोड़े का विशेष महत्त्व था। परन्तु सिन्धुवासियों ने घोड़े का प्रयोग करना ही नहीं सीखा। 

इसी प्रकार आर्य लोग गाय को सम्मान की दृष्टि से देखते थे और उसी पूजा करते थे। परन्तु सिन्धुवासी बैल को श्रद्धा भाव से देखते थे। उसे शक्ति का रूप मानकर पूजा करते थे। सिन्धुवासी लोग मूर्ति पूजा में  विश्वास रखते थे। और आर्य लोग मूर्ति की पूजा नहीं करते थे। वे प्राकृतिक शक्तियों के उपासक थे। आर्य लोग सिन्धुवासियों की तरह शिव पूजा तथा लिंग की पूजा में विश्वास नहीं रखते थे। 

यह बताया जाता है कि  सिन्धु सभ्यता ताम्रकालीन थी। उसके निवासियों को तांबा, सोने और चांदी का ज्ञान था। फिर भी वे लोग पत्थर का प्रयोग अधिक करते थे। जहॉ तक लोहे का सवाल है, सिन्धुवासी इस धातु से सर्वथा अपरिचित थे। इसके विपरीत आर्य लोग लोहे के अलावा तांबा, सोना, चांदी, कांसी आदि सभी धातुओं का ज्ञान था। और वे लोग लोहे का अधिकतर प्रयोग करते थे। सिन्धु सभ्यता में अस्त्र-शस्त्र केवल आत्मरक्षा के लिये प्राप्त हुये लेकिन आर्य लोग ढा़ल, कवच और शिरस्त्राण धारण करते थे।

आर्य लोग युद्ध प्रिय थे। सामाजिक जीवन की दृष्टि से भी दोनों में अन्तर था। सिन्धुवासियों का जीवन सुख-समृद्ध एवं वैभवशाली था, जबकि आर्यों का जीवन सरल एवं सादा था। इस ऐतिहासिक रूप से यह कहना उचित होगा कि वैदिक सभ्यता सिन्धु सभ्यता के बाद की सभ्यता है और दोनों के निर्माता अलग-अलग जाति के लोग हैं। आर्यों ने ही शायद सिन्धु सभ्यता का विनाश किया होगा। 


धन्यवाद् दोस्तों सिन्धुघाटी सभ्यता के बारे मैंने सूक्ष्म जानकारी के माध्यम से सिन्धुघाटी सभ्यता के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है। आशा करता हूँ कि यह जानकारी आपको अच्छी लगी होगी।

Friday, November 29, 2019

Indus Valley of Civilization

Social Life of Indus Valley Civilization  (सिन्धुघाटी सभ्यता  सामाजिक जीवन) 

पिछले अंक में हमने सिन्धुवासियों के आर्थिक जीवन के बारे में प्रकाश डाला था। आइए दोस्तों इस अंक में हम सिन्धुवासियों के सामाजिक जीवन के बारे में   अध्ययन करेंगे कि उस समय सिन्धुवासियों का सामाजिक जीवन कैसा था? 

Indus Valley  Civilization : Nature of Society 

समाज का स्वरूप-  सिन्धु सभ्यता के विभिन्न केन्द्रों पर खुदाई में मिली वस्तुओं से उस समय के लोगों के विभिन्न प्रकार के काम-धन्धों की जानकारी प्राप्त की गई है। इस जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि सिन्धु समाज में सभी लोगों का सामाजिक स्तर एक समान नहीं था। समाज कई वर्गों में विभाजित था। पुजारी, पदाधिकारी, ज्योतिषी, वैद्य एवं जादूगर, इन लोगों को उच्च वर्ग का समझा जाता होगा। कृषक, बढ़ई, कुम्हार, मल्लाह, चरवाहे, गाडीवान आदि निम्न वर्ग के रहे होंगे।

Indus Valley Civilization : Family

परिवार - खुदाई में प्राप्त भवन और उनमें पृथक-पृथक परिवारों के रहने की योजना से लगता है कि सिन्धु सभ्यता काल में परिवार समाज की मूल इकाई थी। विद्धानों का अनुमान है कि उस समय में भी संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित रही होगी। और प्रत्येक परिवार में माता-पिता, भाई, बहिन, पुत्र-पुत्री आदि एक साथ रहते थे। उस समय परिवार पितृसत्तात्मक या मातृसत्तात्मक की परम्परा थी। इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। फिर भी खुदाई के दौरान प्राप्त नारी की मूर्तियों से यह अनुमान लगाया जाता है कि उस समय परिवार में माता का स्थान सर्वोपरि था। 

Indus Valley Civilization : Lady's Place

नारी का स्थान - खुदाई के दौरान ठोस प्रमाण प्राप्त न होने के कारण नारी के स्थान पर सही प्रकार से प्रकाश डालना सम्भव नहीं है। फिर भी विद्धानों ने अनुमान लगाया कि सिन्धु समाज में नारी आदरणीया थी। वह परिवार की मुखिया एवं पोषण कराने वाली समझी जाती थी। उस प्रमुख कार्य बच्चों का लालन-पालन करना तथा घर पर खाली समय में अपना घरेलू कार्य किया करती थीं। 

Indus Valley Civilization : Way of Life

रहन-सहन- खुदाई में प्राप्त वस्तुओं मे अस्त्र-शस्त्रों की अल्प मात्र में मिलने के कारण हम कह सकते हैं कि सिन्धुवासी लोग शान्तिप्रिय थे और समृद्ध जीवन बिताने की कामना करते थे। खुदाई में प्राप्त घोड़े, कलश, थालियाँ, कटोरे, तश्तरियाँ, गिलास, चम्मच आदि मुद्राओं पर अंकित पलंग, कुर्सियाँ आदि उकी सम्पन्नता को प्रकट करते हैं। वैसे खुदाई के दौरान अधिकांश मूर्तियाँ नग्न प्राप्त हुई हैं, परन्तु सूती वस्त्र प्राप्त होने से यह कह सकते हैं कि सिन्धुवासी कपड़े पहनते थे। सामान्य वर्ग के लोग निश्चित रूप से कमर तक कपड़ा पहनते थे। और उच्च वर्ग के लोग कमर के ऊपरी भाग को शाल से ढ़कते थे। ऋतुओं के अनुसार कपड़ों का प्रयोग किया जाता था। कुछ स्त्रियाँ सिर पगड़ी पहनती थी। कुछ स्त्रियाँ सिर पर टोपी पहनती थीं। ऐसा मूर्तियों में अंकित चित्र के अनुसार अनुमान लगाया गया है। 

सिन्धुवासियों को केश रखने का विशेष शौक था। खुदाई के दौरान प्राप्त सीसा, कंघी इस बात की पुष्टि करते हैं। मूर्तियों में अंकित चित्र के अनुसार जो लोग दाढ़ी और मूंछ रखते थे, वे अपने सिर के बालों को पीछे की तरफ बांध लेते थे। खुदाई के दौरान उस्तरा भी मिला था, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धु वासी लोग इसका प्रयाग हजामत बनाने में इस्तमाल करते थे। स्त्रियाँ आज कल हिन्दुओं की तरह अपने सिर के बालों में कंघी करती थीं। मांग निकालती थीं। सि़्त्रयाँ काजल, सुरमा, सिंदूर, बालों की पिन, इत्र एवं पाउडर का भी प्रयोग करती थीं। खुदाई के समय कुछ नारी की मूर्तियाँ ऐसी भी प्राप्त हुई हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि उस समय स्त्रियाँ अपने वर्ग के अनुसार आभूषण धारण किया करती थीं। 

Indus Valley Civilization : Food and Drink

खान-पान- सिन्धुवासियों के खान-पान का स्तर निश्चित ही उच्च स्तर का रहा होगा। गेहूँ, जौ, चावल, दाल, तिल तथा विविध फल एवं सब्जियाँ उनके मुख्य खाद्य पदार्थ थे। मोहरों में अंकित चित्रों से उनके मांसाहारी होने का प्रमाण भी मिलता है। सम्भवतः वे लोग मछली, भेड तथा मुर्गे का मांस खाते थे। गाय, भैस तथा बकरी के दूध पीने के लिये उपयोग में लेते थे। 

Indus Valley Civilization : Fancier

ओमोद-प्रमोद - सिन्धुवासी आमोद-प्रमोद शौकीन थे। मछली पकड़ना और शिकार इनके मनोरंजन के प्रिय साधन थे। एक मोहर पर कुछ लोगों को तीर-कमान से एक बारासिंगे का शिकार करते हुये दिखाया गया है। एक अन्य मोहर में पुरुष को दो पेरों के साथ लड़ते हुये दिखाया गया है। खेल-कूद और व्यायाम में भी उनकी रुचि थी। एक मोहर पर एक व्यक्ति को व्यायाम करते हुये दिखाया गया है। सिन्धुवासी शतरंज का भी खेल खेलते थे। उनका जुआ खेलना भी एक मनोरंजन का साधन था। 

Indus Valley Civilization : Dance and Music

नृत्य और संगीत- सिन्धुवासियों के आमोद-प्रमोद का मुख्य साधन था। धातुओं से निर्मित एक सुन्दर मूर्ति मिली। कुछ मुद्राओं पर तबले और ढ़ोल, तुरही की आकृति अंकित हैं। इस प्रकार अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय लोग नृत्य एवं संगीत भी काफी लोकप्रिय रहा होगा। 

उस समय सिन्धुवासियों ने अपने बच्चों के मनोरंजन का भी समुचित साधन थे। खुदाई में बच्चों के खेलने के बहुत से खिलौने मिले हैं, जिनमें सीटियाँ, झुनझुने, नर-नारियों तथा पशु-पक्षियों की आकृति के खिलौने मुख्य हैं।

Indus Valley Civilization : Education

शिक्षा - सिन्धुवासी लिखना-पढना जानते थे और उन लोगों ने अपने बच्चों एवं युवकों के लिए शिक्षा का एक विकसित पाठ्यक्रम भी अवश्य बनाया होगा। लिखने का काम मुख्य तख्तियों पर होता था। खुदाई में कुछ तख्तियॉ मिली भी हैं। लकडी की इन तख्तियों पर लकडी की कमल से लिखा जाता था। खुदाई में प्राप्त बहुसंख्यक खिलौने के आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि बच्चों को प्रत्यक्ष ज्ञान उपलब्ध कराने में इनका प्रयोग किया जाता था। तोल और माप के निश्चित साधनों से अनुमान होता है कि बच्चों को अंकगणित की शिक्षा दी जाती थी। खुदाई में प्राप्त बांटों की दशमलव इकाइयों के आधार यह अनुमान भी है कि सिन्धुवासी दशमलव पद्धति से परिचित थे। भवन और नगर-निर्माण की निश्चित योजना से स्पष्ट है कि विद्यार्थियों को ज्यामिति के उच्च सिद्धान्तों की शिक्षा दी जाती थी। विद्वानों का मानना है कि सिन्धुवासियों को ज्योतिष के सिद्धान्तों की भी जानकारी रही होगी। सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई के प्रति लोगों की गहरी रुचि इस बात का संकेत है कि वे लोग रोगों से बचने का उपाय जानते थे और उन्हें चिकित्सा सम्बन्धी ज्ञान भी था। इस प्रकार उनके पाठ्यक्रम में अंकगणित, ज्यामिति, ज्योतिष एवं चिकित्सा के विशय अवश्य रहे होंगे। सम्भव है कि विद्यार्थियों को संगीत, नृत्य एवं चित्रकला की भी शिक्षा दी जाती थी।

Indus Valley Civilization : Script

लिपि - सिन्धु सभ्यता के भग्नावशेषों में प्राप्त बहुत सी मुद्राओं ताम्रपत्रों और मिट्टी के वर्तनों पर अनेक प्रकार के लेख उत्कीर्ण हैं। लेख केवल एक या दो पंक्तियों वाले ही हैं। इसलिए विद्वान लोग इन लेखों को पढने अथवा लिपि की सही जानकारी प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाये है। 
हण्टर महोदय का मत है कि ये लेख चित्रलिपि में है और सिन्धु लिपि को चित्रात्मक लिपि चाहिए। लिपि का प्रत्येक चित्र किसी विशेष शब्द अथवा वस्तु को प्रकट करता है और विद्वानों का अब तक ऐसे 396 चिन्हों की सूची बनाई है। विद्वानों का मानना है कि यह लिपि पहली पंक्ति दाहिनी ओर से बांई ओर लिखी जाती थी और दूसरी पंक्ति बांई ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती थी। इस प्रकार की लिखावट को बस्त्रोफेदन कहा जाता है। विद्वानों का मानना है कि सुमेरिया और मिस्त्र की लिपियों की तुलना में अधिक उन्नत और परिष्कृत थी।

Indus Valley Civilization : Art

कला- सिन्धु सभ्यता की नगर निर्माण और भवन निर्माण कला के बारे में हम पहले कर चुके है। संगीत-नृत्य तथा केश-विन्यास का विवरण भी देखा जा चुका है मिट्टी के बर्तनों और मूर्तियों का उल्लेख भी यथास्थान पर किया जा चुका है। मूर्तिकला के क्षेत्र में पत्थर और धातु की बनी मूर्तियॉ विशेष उल्लेखनीय हैं। मोहनजोदडों में प्राप्त नर्तकी की एक मूर्ति इतनी सुन्दर है कि यह बिल्कुल सजीव प्रतीत होती है। नर्तकी त्रिभंगी मुद्रा में नृत्य करने के लिए तैयार दिखलाई पडती है।
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हडप्पा से प्राप्त दो पाषाण-मूर्तियों की भी विद्वानों ने काफी प्रशंसा की है। एक मूर्ति लाल पत्थर की बनी मानव-मूर्ति है। इस मूर्ति का सिर टूट कर कहीं खो गया है परन्तु शेष शरीर का अनुभव और सौष्ठव सराहनीय है। दूसरी मूर्ति काले पत्थर की है और वह किसी नर्तक की प्रतीत होती है। नर्तक नृत्य की मुद्रा में अपना बायां पैर पृथ्वी से ऊपर उठाया हुआ है। मोहनजोदडों से एक और खंडित प्रतिमा मिली है। यह मूर्ति किसी पुजारी अथवा योगी की प्रतीत होती है, क्योंकि मूर्ति की ऑखे अधखुली हैं और ऐसा लगता है मानों वह व्यक्ति योगस्थ है। पाषाण की मूर्तियों में पशु-पक्षियों की मूर्तियॉ कम मिली हैं परन्तु उनमें एक बैल की मूर्ति उल्लेखनीय है। इस मूर्ति का मुख्य शरीर पत्थर का है परन्तु सींंग और कान किसी दूसरी वस्तु के बने हुए है। सिन्धु सभ्यता की मूर्तिकला के सम्बन्ध में जान मार्शल ने लिखा है कि ‘‘सिन्धुघाटी की कला और धर्म भी उतने ही विचित्र है और उन पर अपनी एक विशिष्ट छाप है। इस काल में हम अन्य देशों में कोई ऐसी बस्तु नहीं जानते जो शैली की दृष्टि से यहॉ बनी मूर्तियों से साम्य रखती हो।’’ उनका कहना है कि ये मूर्तियॉ इतनी सुन्दर हैं कि चौथी शताब्दी ई0पू0 कोई भी यूनानी कलाकार इनको अपनी कृति बताने में गौरव अनुभव करेगा।

सिन्धुवासियों के चित्रकला ज्ञान की जानकारी उनके मिट्टी के बर्तनों पर बने चित्रों से होती है। सिन्धु चित्रकार रेखाओं और बिन्दुओं के माध्यम से बर्तनों पर चित्रकारी करते थे तथा उन पर हिरण, बकरी, खरगोश, कौआ, बतख, गिलहरी, मोर, सॉप, मछली आदि पशु-पक्षियों और पीपल, नीम, खजूर आदि पेड-पौधों के चित्र बनाते थे। हडप्पा से प्राप्त बर्तनों पर मानव आकृतियॉ भी बनी मिली है। एक बर्तन पर एक कछुए का चित्र बना है जो बॉस पर जाल लटकाये जा रहा है और उसके पैरों के पास मछली और कछुआ पडे है। कुछ बर्तनों पर बने चित्र बडे आकर्षक और वास्तविक लगते है।

Indus Valley Civilization : Funeral Ceremony

मृतक संस्कार - मोहनजोदड़ों में कोई शव स्थान अथवा समाधि नहीं मिली है। हड़प्पा कालीबंगा में आवश्य कुछ स्थानों पर कब्रें मिली हैं। जिनके शव का सिर उत्तर दिशा में रखा जाता था। उत्तर दिशा में शव का सिर रखा जाना किसी धार्मिक आस्था का ही आधार होगा। सिन्धुवासियों के शवों पर अनेक आभूषण प्राप्त हुये हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह परलोक में भी सुख-समृद्धि की कामना करते होंगे। सिन्धुवासी तीन प्रकार से शवों का अन्तिम संस्कार करते थे। पहला पूर्ण सामाधिकरण, जिसमें में शव को पूर्णरूप से जमीन में गाढ़ दिया जाता था। दूसरा आंशिक समाधिकरण, जिसमें पशु-पक्षियों के खाने के बाद बचे शव को गाढ़ा जाता था। तीसरा अग्नि संस्कार, जिसमें शव को जलाया जाता था तथा उसकी भस्म को गाढ़ दिया जाता था। खुदाई के समय कलशों में शवों की भस्म व हड्डियाँ प्राप्त हुई हैं।


दोस्तो अगले अंक में हम सिन्धु सभ्यता के विनाश एवं वैदिक सभ्यता के बारे मेंं प्रकाश डालेंगे।

Thursday, November 28, 2019

Indus Valley of Civilization

पिछले अंक में हमने सिन्धुवासियों के धार्मिक जीवन के बारे में प्रकाश डाला था। आइए दोस्तों इस अंक में हम सिन्धुवासियों के आर्थिक जीवन के बारे में अध्ययन करेंगे कि उस समय सिन्धुवासियों का आर्थिक जीवन कैसा था?

Indus Valley Civilization :  Economic Life 

सिन्धुवासियों का  आर्थिक जीवन-

सिन्धु सभ्यता में खुदाई के दौरान विद्धानों ने यह माना है कि उनका आर्थिक जीवन काफी समृद्ध एवं उन्नतशील था। उनके आर्थिक जीवन को विद्धानों ने कृषि, पशु पालन, घरेलू उद्योग-घन्धे तथा व्यापार-वाणिज्य आजीविका के मुख्य साधन माना है। 

Indus Valley Civilization : Agriculture

कृषि-
प्राचीन समय में सिन्ध प्रदेश आज ही तरह रेतेला नहीं था। वहाँ की भूमि काफी उपजाऊ थी। समयानुसार समुचित मात्रा में वर्षा होती थी। खुदाई के दौरान गेहूँ और जौ दोनों दानों के अवशेष प्राप्त हुये हैं। गेहूँ एवं जौ के अलावा सिन्धुवासी मटर, तिल, चावल की खेती किया करते थे। मोहजोदड़ां से सूती कपडों के भी अवशेष प्राप्त हुये हैं। साथ फलों की भी खेती की जाती थी।  गेहूँ, जौ आदि खाद्यान्न पदार्थो को पीसने हेतु ओखली एवं चक्की का प्रयोग किया जाता होगा। खाद्यान्नों को खेतों से घर ले जाने हेतु बैलगाडियां का प्रयोग किया जाता था। 

पशु पालन सिन्धुवासी कृषि के साथ-साथ पशु पालन का व्यवसाय करते थे। उस समय लोग बैल, गाय, भैंस, सूअर, कुत्ते आदि पालते थे। गाय और भैंसों को दूध के लिये पाला जाता था। खुदाई के दौरान सूअर के कंकाल एवं खिलौने मिले हैं। मोहर पर अंकित चित्र के अनुसार यह कहा जा सकता है कि बिल्ली, बन्दर, खरगोश, मुर्गा, मोर, तोता आदि से वे परिचित थे। 

Indus Valley Civilization : Domestic industry

घरेलू उद्योग धन्धे - 
श्री दयाराम साहनी को एक चांदी के घड़े पर सूती वस्त्र और अन्य स्थानों पर सूत के धागे मिले हैं। खुदाई में प्राप्त बहुत सी मूर्तियों पर भी वस्त्र बने दिखाए गये हैं। इस प्रकार अनुमान लगाया जा सकता है कि सिन्धुवासी सूत तथा ऊन को कातना तथा उनके कपड़े बुनना जानते थे। मिट्टी की मूर्ति, खिलौने और बर्तनों आदि प्राप्त अवशेषों के अनुसार यह का जा सकता है कि सिन्धुवासी मिट्टी के बर्तन बनाने में निपुण थे। मोहनजोदड़ों की खुदाई के दौरान कुछ भट्टे मिले हैं। सम्भवतः इन भट्टों पर बर्तनों को पकाया जाता होगा। 

सिन्धुवासी अपने यहाँ अनेक प्रकार की धातुएँ मॅगवाते थे। वे लोग धातुओं के गलाने तथा उनका मिश्रण करने में काफी निपुण थे। वे धातु के औजार, हथियार, आभूषण, मूर्तियाँ तथा खिलौनी आदि बनाने का कार्य किया करते थे। मोहनजोदड़ो में एक नर्तकी की मूर्ति बड़ी ही प्रसिद्ध है। वहाँ पर एक गला हुआ तांबे का एक ढ़ेर प्राप्त हुआ है। इस प्रकार अनुमान लगाया जा सकता है कि धातु को गला कर धातु की बस्तुओं को सांचे में ढालकर तैयार किया जाता होगा। सिन्धुवासी रत्न जड़ने के काम में काफी निपुण थे

धातुओं के अलावा वे लोग शंख, सीप, हाथीदॉत आदि कशीदाकारी काम में भी निपुण थे। हड़प्पा की खुदाई में शंख से बना हुआ एक बैल मिला है। सिन्धुवासी शान्तिप्रिय स्वभाव होने के कारण हथियार के नाम पर चाकू ही प्राप्त हुआ है। खुदाई में गाडी के पहिये और तख्तों से यह अनुमान लगाया जाता है कि उस समय बढ़ाई का कार्य काफी अच्छा रहा होगा। इस प्रकार कह सकते हैं कि उस समय घरेलू उद्योग-धन्धे काफी उन्नत रहा होगा। 

Indus Valley Civilization : Trade and commerce

व्यापार-वाणिज्य-
सिन्धु सभ्यता की खुदाई के समय प्राप्त अवशेषों में अनेक वस्तुएँ ऐसी मिली, जो इस प्रदेश की नहीं थीं। इस प्रकार विद्धानों ने अनुमान लगाया कि ऐसी वस्तुओं को विदेशों से प्राप्त किया जा सकता है। सिन्धु घाटी क्षेत्र में तांबा, चांदी, सोना आदि धातुएँ प्राप्त नहीं होती थीं। इन धातुओं को अफगानिस्तान, ईरान एवं अन्य देशों से ही प्राप्त किया जा सकता है।

इससे प्रतीत होता है कि सिन्धुवासियों का व्यापार-वाणिज्य काफी उन्नत रहा होगा। आवगमन के साधन भी उन्नत थे। उस समय व्यापार हेतु जल मार्ग एवं थल मार्ग का भी प्रयोग किया जाता था। इन्हीं मार्गों से व्यापारी वर्ग का आना-जाना होता होगा। प्राप्त मोहरों पर नौकाओं एवं जहाजों के चित्र अंकित थे, जाहिर सी बात है कि व्यापार को बढ़ावा देने हेतु जहाजों एवं नौकाओं को प्रयोग करते थे। उस समय स्थल मार्ग पर माल ढोने के लिये बैलगाडियों, बैल, घोड़ा, गधों आदि का प्रयोग किया जाता था।

Indus Valley Civilization : Weights and Measures

नाप और तौल के साधन -

सिन्धु सभ्यता की खुदाई के समय नाप और तोल बहुत से बट्टे मिले हैं, जो चौकोर पत्थर के आकार के हैं। यदि सबसे छोटे बांट को एक इकाई मान लिया जाये, 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64 इकाइयों के बांट उपलब्ध हुये हैं। जो हमारे पुराने बांटों जैसे एक आना, आधा पाव, पाव, आधासेर, सेर  आदि से मिलते जुलते हैं। सिन्धु सभ्यता के लगभग सभी बांट छोटे-बड़े व्यापारिक केन्द्रों पर उपलब्ध होने का अनुमान लगाया जाता है।

वस्तुओं को तोलने के लिये तराजू का प्रयोग किया जाता था। मोहन जोदड़ों में छोटे-छोेटे सीप के टुकडों को धातु से जोड़कर बनाया गया फुटा भी प्राप्त हुआ है। विद्धानों का मत है कि इस फुटा से लम्बाई चौड़ाई नापने में उपयोग लाया जाता होगा।

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दोस्तो अगले अंक में हम सिन्धु सभ्यता के सामाजिक जीवन के बारे में प्रकाश डालेंगे, किस उस सिन्धुवासियों का सामाजिक जीवन कैसा था।

Indus Valley of Civilization (सिन्धुवासियों का धार्मिक जीवन)

सिन्धुवासियों का धार्मिक जीवन


पिछले अंक में हमने सिन्धु सभ्यता के नगर भवन-निर्माण के बारे में प्रकाश डाला था। आइए दोस्तों इस अंक में हम सिन्धुवासियों के धार्मिक जीवन के बारे में  अध्ययन करेंगे कि उस समय सिन्धुवासियों का धार्मिक जीवन कैसा था? 

Indus Valley Civilization

सिन्धुवासियों के धार्मिक विश्वासों के बारे में काफी मतभेद है। निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। फिर भी खुदाई के समय प्राप्त मूर्तियों, मोहरों तथा ताबीजों के अधार पर पुरात्वतेत्ताओं ने उनके धार्मिक जीवन के बारे में समझाने का प्रयास किया है कि सिन्धुवासी बहुदेववादी थे। वे प्राकृतिक शक्तियों की विभिन्न रूपों में पूजा-उपासना करते थे। वे एक ईश्वर में विश्वास रखते थे, उसी इष्ट देव को सृष्टि का निर्माता मानते थे। और इसी विश्वास से उस समय परमपुरुष और परमनारी की पूजा लोकप्रिय हो गयी थी। 

Indus Valley Civilization

परम पुरुष की उपासना सिन्धु प्रदेश में एक मोहर मिली थीं। इस पर एक नग्न व्यक्ति योग मुद्रा में बैठा है। इस व्यक्ति के तीन मुख हैं। उसके मस्तक पर शिरस्त्राण के दोनों ओर दो सींग हैं और दूर से देखने पर त्रिशूल जैसा दिखाई देता है। इस व्यक्ति के बांई ओर एक गैंडा और एक भैंसा है और दांई ओर एक हाथी और एक बाघ है। मोहर के ऊपरी हिस्से पर छः शब्द अंकित हैं, जिन्हें पढ़ा नहीं जा सकता। फिर भी कुछ विद्धानों का मत है कि मोहर पर अंकित आकृति भगवान शिव की है। उनके अनुसार शिव को योगीश्वर, त्रिशूलधारी, पशुपति आदि रूप में माना जाता होगा। खुदाई के समय एक और मुद्रा/मोहर मिली है, जिस पर एक योगासीन व्यक्ति का है। चित्र के दोनों ओर एक-एक नाग तथा सामने दो नाग बैठे हैं। विद्धानों का मानना है कि नागों से घिरा हुआ यह चित्र भगवान शिव का ही है। एक अन्य मुद्रा पर धनुर्धारी शिकारी का चित्र अंकित पाया गया। इस चित्र को विद्धानों ने किरात वेश में भगवान शिव को माना गया है। इससे प्रतीत होता है कि सिन्धुवासी परम पुरुष की आराधना किये करते थे। 

Indus Valley CivilizationUltimate lady worship

परम नारी की पूजा 
सिन्धुवासियों में परमनारी की पूजा भी काफी लोकप्रिय रही होगी। खुदाई में मिट्टी की बनी हुई बहुस सारी नारी की मूर्तियाँ मिली हैं। मातृदेवी की मूर्तियाँ प्रायः नग्न रूप में मिली हैं। विद्धानों का मत है कि ये मूर्तियाँ मातृदेवी अथवा प्राकृतिकदेवी की हैं। प्राचीन काल में मातृदेवी की पूजा काफी लोकप्रिय रही थी। मातृदेवी को खुश करने हेतु पशुबलि अथवा नरबलि भी दी जाती थी। सम्भावना व्यक्त की जाती है कि मातृदेवी की इस उपासना से ही शक्ति पूजा की परम्परा का विकास हुआ होगा।
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मातृदेवी की मूर्ति की कमर में पटका और मेखला तथा गले में हार प्रदर्शित किया गया है। सिर पर कुल्हाडी से मिलती-जुलती आकृति की कोई वस्तु दिखाई देती है। एक मूर्ति में एक स्त्री बनी हुई है, जिसके गर्भ से एक वृक्ष निकलता हुआ प्रदर्शित किया गया है। सम्भवतः इसे वानस्पतिक-जगत देवी के रूप में माना जाता होगा। एक अन्य मूर्ति के शीश पर एक पक्षी पंखा फैलाये बैठा है। इससे स्पष्ट होता है कि सिन्धुवासी मातृदेवी को सारे लोक की पालनहार अथवा जननी मानते थे। 

Indus Valley CivilizationFertility worship

प्रजनन शक्ति की पूजा
 परम पुरुष और परम नारी की पूजा के साथ-साथ सिन्धुवासी प्रजनन-शक्ति की लिंग एवं योनि के प्रतीकों के रूप में भी पूजा करते थे। हड़प्पा और मोहनजोदड़ों में बहुत से लिंग मिले हैं। ये सामान्य पत्थर, लाल पत्थर अथवा नीले पत्थर के बने हुये हैं। छोटे-छोटे आकर से लेकर चार फीट की ऊँचाई तक के लिंग मिले हैं। विद्धानों का मत है कि लिंगों की पूजा लोग अपने-अपने घरों में ही करते थे और बड़े आकर के लिंग विशेष स्थानों पर प्रतिष्ठित कर पूजे जाते थे। ऐसा माना जाता है कि आधुनिक हिन्दू धर्म में लिंग पूजा शायद सिन्धुवासियों की ही देन है।
खुदाई में पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीप के बने बहुत से छल्ले मिले हैं, जिनका आकार आधा इन्च से लेकर चार इंच तक है। कुछ विद्धानों ने इस छल्लों को योनियों का प्रतीक मानकर यह मत प्रकट किया कि सिन्धुवासी योनि की भी पूजा करते थे। 

Indus Valley CivilizationTree worship

वृक्ष पूजा
सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई के दौरान कुछ मुद्राओं पर वृक्षों के अनेक चित्र प्राप्त हुये हैं। जिसके आधार पर विद्वानों का मत है कि सिन्धुवासी वृक्षों की पूजा करते थे। एक मुद्रा पर दो पशुओं के शीश पर नौ पीपल की पत्तियॉ अंकित है। एक अन्य मुद्रा पर एक नग्न स्त्री का चित्र है जिसके दोनों ओर एक एक टहनी बनी है। उसके सामने पत्तियों का मुकुट पहने एक अन्य आकृति का चित्र है।

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विद्धान मार्शल महोदय का मत है कि मोहर में अंकित टहनियॉ पीपल की हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि वृक्ष पूजा के दो रूप प्रचलित थे। एक वृक्ष को उसके प्राकृतिक रूप में पूजना जैसे कि तुलसी का पूजन। दूसरा, वृक्ष को किसी देवता के प्रतीक के रूप में पूजना जैसे कि पीपल की पूजा। ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्धु निवासियों में तुलसी, पीपल, नीम, खजूर, बबूल आदि वृक्षों की पूजा अधिक प्रचलित रही होगी। भारत में वृक्ष पूजा की परम्परा काफी पुरानी है। बौद्ध लोग भी पीपल की पूजा करते थे। आज हिन्दू धर्म में आज भी वृक्षों की पूजा की जाती है।

Indus Valley CivilizationAnimal worship

पशु पूजा
वृक्ष पूजा के साथ-साथ सिन्धुवासी पशु-पूजा में भी आस्था रखते थे। एक मोहर पर बैल के चित्र मिले हैं। खिलौने के रूप में भी बैल मिले हैं। मोहनजोदडों में एक ताम्र-पत्र पर कुबडदार बैल अंकित किया गया है। विद्वानों का अनुमान है कि शक्ति के प्रतीक के रूप में बैल की पूजा-अर्चना काफी लोकप्रिय रही होगी। बैल का भांति भैंस और भैंसा की पूजा भी की जाती थी क्योंकि अनेक मुद्राओं पर इनके चित्र मिले हैं। नाग पूजा काफी प्रचलित थी। एक मुद्रा पर नाग की पूजा करते हुए एक मनुष्य का चित्र अंकित है। एक चबूतरे पर लेटे हुए नाग को दिखलाया गया है। मुद्राओं पर हाथी, बाघ, भेड बकरी, गैंडा, हिरन, ऊंट, घडियाल, गिलहरी, तोता, मुर्गा, मोर आदि पशुओं के चित्र भी मिले हैं। प्रतीत होता है कि सभी पशु-पक्षी सिन्धुवासियों के देवी-देवताओं के वाहन रहे होंगे। इससे यही अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धुवासी इनमें दैवी अंश मानकर इनकी पूजा करते थे।

Indus Valley CivilizationSymbol money

प्रतीक मुद्रा
खुदाई  के दौरान प्राप्त अनेक अवषेशों पर सींग, स्तम्भ और स्वस्तिका के चित्र मिले हैं। विद्वानों का मत है कि इन चिन्हों का भी कुछ धार्मिक महत्व रहा होगा। हो सकता है कि यह चिन्ह किसी देवी-देवता के प्रतीक रहे हों अथवा किस धर्मिक भावना के प्रतीक के रूप में इनकी पूजा की जाती होगी। कुछ विद्वानों का मानना है कि ये सिन्धुवासी अन्धविश्वास के प्रतीक रहे हों और इनके माध्यम से अनेक रोगों को दूर भगाया जाता हो। कुछ मुद्राओं पर बने चित्रों में नर नारियों को सींग युक्त दिखलाया गया है। शीश पर सींग धारण करने का भी कुछ धार्मिक महत्व रहा हो। हिन्दू धर्म में आज भी स्वस्तिका के चिन्ह को पवित्र का प्रतीक माना जाता है।

Indus Valley CivilizationReligious practices

धार्मिक प्रथायें
सभ्यता की खुदाई के दौरान मोहरों पर अंकित देवी-देवताओं के चित्रों तथा प्रतीकों के अंकन से इतना तो कहा जा सकता है कि सिन्धुवासी साकार उपासना करते थे और उनमें मूर्ति-पूजा का प्रचलन रहा होगा, परन्तु सिन्धुवासी अपनी मूर्तियों को कहॉ प्रतिष्ठित करते थे। यह विवादास्पद है, क्योंकि खुदाई में अभी तक कोई ऐसा भवन नहीं मिला है जिसे हम मन्दिर अथवा उपासना स्थल कह सकें। कुछ विद्वानों का मानना है कि मोहनजोदडों में जिस स्थान पर कुषाणकालीन बौद्ध स्तूप खडा है, उसके नीचे सिन्धुवासियों का मन्दिर दबा पडा है।


दोस्तो यह थी छोटी सी जानकारी सिन्धु सभ्यता के धार्मिक जीवन के बारे में, आशा करता हूँ आपको अच्छी लगी होगी।

Wednesday, November 27, 2019

Indus Valley of Civilization (सिन्धु सभ्यता के नगर एवं भवन निर्माण )

Indus Valley of Civilization- City and Building Construction

पिछले अंक में हमने सिन्धु सभ्यता के विस्तार क्षेत्र एवं सभ्यता के काल के बारे में प्रकाश डाला था। आइए दोस्तों इस अंक में हम सिन्धु सभ्यता के नगर भवन-निर्माण के बारे में अध्ययन करेंगे कि उस समय भवन-निर्माण की कला कैसी थी? 

Indus Valley of Civilization- City and Building Construction 

 सिन्धु सभ्यता के प्रमुख केन्द्रों में जो खुदाई हुई थी, उससे पता चला कि इन नगरों की रचना एक योजनाबद्ध तरीके के अनुसार की गई थी। इन नगरों के स्थापत्य शिल्प और उनकी आधार योजना में समानता व उच्च कोटि की व्यवस्था देखकर यही लगता है कि सिन्धुवासी अपने नगरों का निर्माण योजनाबद्ध तरीके से करते थे और योजना बनाने वाले तथा रचना करने वाले इंजीनियर लोग नगर-रचना-शास्त्र के अनुभवी ज्ञात रहे होंगे।
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सिन्धु सभ्यता के नगर एवं भवन निर्माण

Indus Valley of Civilization- City and Building Construction 

सिन्धु सभ्यता के नगर नदियों के मुहाने पर बसाये गये थे। हडप्पा, रावी तथा मोहनजोदडो, सिन्धु नदी के किनारे स्थित है। इन नदियों से नगर की सुरक्षा करने के लिये बांधो का निर्माण भी किया जाता था, उनके योजनाबद्ध नगर निर्माण की आधार-पीठिका नगरों की प्रमुख सड़कें थी। ये सडकें पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण की ओर सीधी समानान्तर जाती थीं और एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं, जहाँ चौराहे बने होते थे। नगर की मुख्य सडकें काफी चौडी होती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि मोहनजोदडो की मुख्य सडकें तैतीस फीट चौडी थी। सडक की इतनी अधिक चौडाई इस बात को इंगित करती है कि उस समय भी यातायात काफी रहा होगा। सहायक सडकें नौ फीट से अठारह फीट तक चौडी थीं। सडकों को मिलाने वाली गलियाँ भी काफी चौडी थीं। सभी सड़कें मिट्टी की बनी हुई थीं। केवल मुख्य सडकों पर इस बात के चिन्ह पाये गये हैं कि उसे ईटों के टुकडों से पक्का करने का प्रयत्न किया गया होगा। मिट्टी की सड़कें होने कारण भी सड़कों की सफाई का बडा ध्यान रखा जाता था। सडकों पर स्थान-स्थान पर कूडा-करकट के लिये मिट्टी के पात्र रखे जाते थे या फिर सडकों के किनारे जगह-जगह  पर गढ्ढे खोदे जाते थे। इससे पता चलता है कि यहाँं के लोग अपने नगरों की साफ-सफाई एवं स्वच्छता का विशेष ध्यान रखते थे।
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नगर निर्माण

Indus Valley of Civilization- City and Building Construction 

नगर निर्माण की पूर्व योजना का संकेत नगर के गन्दे पानी को शहर से बाहर दूर ले जाने की व्यवस्था से भी मिलता है। सिन्धु घाटी के अक्सर सभी नगरों में नालियों का जाल बिछा हुआ था। मकानों से आने वाली नालियाँ गली की नालियों से मिल जाती थीं और गली की नालियाँ सहायक सडकों की नालियों से मिल जाती थीं और सहायक सडकों की नालियाँ मुख्य मार्गों की बडी नालियों से मिल जाती थीं। इस प्रकार घरों, गलियों और सडकों का गन्दा पानी नगर के बाहर निकाल दिया जाता था। नालियाँ पक्की होती थीं और उनके निर्माण में ईंटों, पत्थरों, चूने तथा जिप्सम का प्रयोग किया जाता था। नालियों को ईटों तथा पत्थर की पट्टियों से पाट दिया जाता था। समय-समय पर नालियों को साफ भी किया जाता था। इन नालियों में थोडी दूर पर शोषक-कूप भी बनाये गये थे, ताकि कूडे से पानी का बहाव रुक न सके। नालियों की ऐसी उत्तम व्यवस्था यूरोप के प्रमुख नगरों में भी 18वीं शताब्दी के आसपास की विकसित हो पाई थी। 

Indus Valley of Civilization- City and Building Construction 

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई से सिन्धुवासियों की भवन-निर्माण कला के बारे में भी काफी कुछ जानकारी मिलती है। इन नगरों के मकानों की एक विशेषता यह थी कि उनके दरवाजे या खिड़कियाँ मुख्य मार्ग की ओर नहीं खुलती थीं, अपितु गलियों और सहायक सड़कों की ओर खुलती थीं। भवन निर्माण करने हेतु ईटों को पकाने के लिये लकड़ी का प्रयोग करते थे। शायद शहर के बाहर ईंटों को पकाने हेतु भट्टे रहे होंगे। दीवारों में ईंट जोड़ने के लिये मिट्टी का गारा प्रयोग में लाया जाता था। मकानों का निर्माण नींव डालकर किया जाता था। पहली मंजिल से दूसरी मंजिल तक जाने हेतु सीढ़ियाँ लकड़ी अथवा पत्थर की बनाई जाती थीं। अधिकतर मकानों के दरवाजे तीन या चार फुट चौड़े होते थे। कमरों में दीवारों के साथ आलमारियाँ बनाने की प्रथा थी। मकानों के बीच में आंगन बनाया जाता था। आंगन के एक कोने में रसोईघर होता था। प्रवेशद्वार के पास वाले कोने में स्नानागार तथा शौचालय भी होते थे। प्रत्येक मकान में पानी के लिये पक्की ईंटों का एक कुआ भी बनाया जाता था। सिन्धु सभ्यता की खुदाई के समय यह भी साक्ष्य प्राप्त हुये हैं कि नगरों और गलियों के दोनों ओर दुकानों का निर्माण किया जाता था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि उस समय भवन निर्माण की शिल्पकला काफी उन्नतशील रही होगी

Tuesday, November 26, 2019

Indus Valley of Civilization (सिन्धु घाटी सभ्यता)

Indus Valley of Civilization


भारतवर्ष का इतिहास तो मानव सभ्यता के प्राचीन पाषाण युग के साथ ही प्रारम्भ हो जाता है, लेकिन देश की सुविकसित सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास वैदिक सभ्यता से भी प्राचीन सिन्धु घाटी सभ्यता से ही प्रारम्भ होता है। इस सभ्यता के अधिकतर साक्ष्य सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों के किनारे उपलब्ध हुये। इसलिये इसे  ''सिन्धु घाटी की सभ्यता'' के नाम से पुकारा जाता है। इसे हडप्पा संस्कृति (Culture of Hadappa)  के नाम से भी पुकारा जाता है, क्योंकि हडप्पा नगर और उसके आस-पास का क्षेत्र इस सभ्यता का केन्द्र बिन्दु रहा था।

Indus Valley Civilization:

इस सभ्यता की खुदाई का कार्य सर्वप्रथम 1920 ई. में हडप्पा नगर में शुरु किया गया था, जिसका नेतृत्व श्री दायाराम साहनी तथा श्री माधोस्वरूप वत्स ने किया था। हड़प्पा पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) के माण्टगोमरी जिले में लाहौर से लगभग 100 मील दूर रावी नदी के तट पर स्थित है। यहाँ की खुदाई में एक भव्य नगर के भग्नावशेष मिले थे। इसके बाद 1922 ई. में श्री राखलदास बनर्जी के नेतृत्व में सिन्धु प्रान्त(पाकिस्तान) के लरकाना जिले में खुदाई का कार्य किया गया, जिसके परिणास्वरूप मोहनजोदड़ो के भव्य नगर के अवशेष मिले थे।
Indus Valley Civilization ( सिन्धु घाटी सभ्यता
प्राचीन सिन्धु घाटी सभ्यता

यद्यपि उक्त दोनों स्थानों में लगभग 350 मील का अन्तर था, किन्तु दोनों स्थानों की खुदाई में उपलब्ध अवशेषों में बेजोड़ सभ्यता थी। इस प्रकार विभिन्न पुरातत्ववेत्ताओं ने इस सभ्यता की खुदाई के कार्य को आगे बढ़ाया। परिणामस्वरूप यह ज्ञात हुआ कि यह सभ्यता केवल सिन्धु घाटी तक सीमित नहीं रही, बल्कि पंजाब, राजस्थान, बलूचिस्तान से भी इस सभ्यता से सम्बन्ध रखने वाले अवशेष प्राप्त हुये थे।
भारत की स्वतंत्रता के बाद वृह्दस्तर पर खुदाई का कार्य किया गया, जिसके परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों के बहुत से स्थानों पर हड़प्पा सभ्यता के भी अवशेष प्राप्त हुये हैं। 

Indus Valley Civilization:

सभ्यता के विस्तार क्षेत्र (Extension Area of Civilization) के बारे में पुरातात्त्विक खोजों से यह सिद्ध किया कि इस सभ्यता का विस्तार अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, सिन्धु, पंजाब, पश्चिमी राजस्थान, गुजरात एवं उत्तरी भारत में गंगा घाटी तक व्याप्त था।  

सभ्यता का काल (Era of Civilization) सिन्धु सभ्यता के काल के बारे में पुरातत्ववेत्ताओं में भारी मतभेद है। बुलीहॉल, गार्डन चाइल्ड आदि विश्व की नदी-घाटी सभ्यताओं में सुन्धु सभ्यता को सबसे प्राचीन एवं प्रारम्भिक मानते हैं। जॉन मार्शल और डॉ0 राधकुमुद मुखर्जी के अनुसार सिन्धु सभ्यता का प्रारम्भ 3250 ई.पू. से पहले माना है।

डॉ. राजवली पाण्डेय के अनुसार ''यहाँ की खुदाई में जल के धरातल तक प्राचीन नगरों के खण्डहरों के एक के ऊपर दूसरे सात स्तर मिले हैं। मोटे तौर पर यदि एक नगर के बसने और उजड़ने के लिये 500 वर्ष का समय दिया जाये, तो सात नगरों के बसने और उजड़ने में लगभग 3500 वर्ष लगे होंगे। सबसे नीचे का स्तर भी सभ्य नगर का अवशेष है, जिसके पूर्व सभ्यता विकसित हो चुकी थी और यदि भूगर्भ का पानी बीच में बाधा न डालता तो सातवें स्तर के नीचे भी खण्डहरों के स्तर मिल सकते हैं। इस प्रकार सिन्धु सभ्यता कम से कम ईसा पूर्व चार हजार वर्ष की है।''

Indus Valley Civilization:

सभ्यता का निर्माता (Creator of Civilization) सिन्धु सभ्यता के निर्माता कौन थे। इसके बारे में काफी मतभेद है। यद्यपि विद्धानों की तीन मान्यताएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार लोग मिश्रित जाति के थे। दूसरी मान्यता के अनुसार लोग द्रविड थे और तीन मान्यता के अनुसार वे लोग आर्य थे।

पहली मान्यता के  विद्वान कर्नल स्युअल और डॉ. गुहा का कहना है कि सिन्धु सभ्यता का निर्माण किसी एक नस्ल अथवा जाति के लोगों ने नहीं किया। सिन्धु सभ्यता नागरीय सभ्यता थी। इसके मुख्य नगर व्यापार-वाणिज्य के प्रमुख केन्द्र बने हुए थे। अतः आजीविका की तलाश में अनेक प्रजातियों के लोग यहाँ आकर बस गये थे।

दूसरी मान्यता के विद्वानों का कहना कि खुदाई में प्राप्त नर कंकालों में भूमध्य सागरीय नस्ल की प्रधानता है, अतः इस सभ्यता के निर्माण का श्रेय द्रविडों को था। द्रविड़ लोग भूमध्य सागरीय नस्ल की ही एक शाखा थे। कुछ का मत है कि बलूचिस्तान आदि भागों में बोली जाने वाली ’ब्राहुई’ भाषा तथा द्रविड़ों की भाषा में समानता के कारण भी द्रविड़ों को इस सभ्यता का निर्माता मानते हैं।

तीसरी मान्यता के विद्वानों के अनुसार इस सभ्यता के निर्माता आर्य थे अथवा आर्यों ने भी इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान अवश्य दिया होगा।

डॉ. पुसालकर ने कहा है कि ''यह आर्य और अनार्य सभ्यताओं के मिश्रण का प्रतिनिधित्व करती है। अधिक से अधिक हम यह कह सकते हैं कि सम्भवतः उस समय में ऋग्वैदिक आर्य वहाँ की जनता का एक महत्त्वपूर्ण भाग थे और उन्होंने भी सिन्धु घाटी की सभ्यता के विकास में अपना योगदान दिया।''

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धन्यवाद् दोस्तों अगले अंकों में सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई के प्राप्त साक्ष्य/अवशेषों  के अनुसार कुछ नया सीखने का प्रयास करेंगे।