Tuesday, July 28, 2020

General Knowledge

General Knowledge (सामान्य ज्ञान) part-9

भारतीय इतिहास से सम्बन्धित प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की प्रश्नोत्तरी 


वैदिक कालः ऋग्वैदिक तथा उत्तर वैदिक काल, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक दशा
(Vedic Age : Rigvedic and Later Vedic-Polity, Society and Economy Religion)


General Knowledge
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  • भारत में आर्य कहाँ से आये - मध्य एशिया
  • कालीबंगा स्थित है - राजस्थान
  • ऋग्वेद में कितने श्लोक हैं - 1001
  • ऋग्वैदिक काल में ग्रामों के समूह को क्या कहा जाता था - विश
  • किस वेद में एकेश्वरवाद दर्शन पर कहा गया है कि परमात्मा एक है, किन्तु सन्तों ने उन्हें विभिन्न तरीकों और रूपों में वर्णन किया है - अथर्ववेद
  • उत्तर-वैदिक काल में प्रचलित आश्रमों की संख्या कितनी है - चार
  • ऋग्वैदिक काल में कितने यज्ञ प्रचलित थे - 5
  • ’’बोगाजकोई’’ शिलालेख कहाँ से प्राप्त हुआ है - एशिया माइनर से
  • वैदिक काल में प्रयुक्त ’’हल’’ को क्या कहा जाता था - सीर
  • वैदिक विचारधारा में भोर की देवी कौन थी - उषम् 
  • उत्तर वैदिक काल में करों की वसूली करने वाले अधिकारी को कहा जाता था - संग्रहीत
  • उत्तर-वैदिक कालीन देव मण्डल में किस देवता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था - प्रजापति
  • अध्वर्यु का अर्थ है - यज्ञ करने वाला पुरोहित
  • वैदिक साहित्य में सभा और समिति को किस देवता की दो पुत्रियाँ कहा गया है - प्रजापति
  • राजा के निर्वाचन से सम्बन्धित सूक्त पाए जाते हैं - ऋग्वेद में
  • ऋग्वेद के नवम मण्डल के मन्त्र किस देवता को समर्पित हैं - सोम
  • ऋग्वेद में मण्डलों की संख्या - 10
  • पुरुषसूक्त ऋग्वेद के मण्डल में है - दशम
  • ऋग्वेद के किन मण्डलों को वंश मण्डल के नाम से जाना जाता है - द्वितीय से सप्तम मण्डलों को
  • वेदांग-ज्योतिष के लेखक के रूप में कौन विख्यात है - लगध
  • मैत्रयी संहिता का सम्बन्ध है - यजुर्वेद से
  • संहिता क्या है - श्लोकों का संग्रह
  • ऋग्वेद का सर्वाधिक छन्द कौन-सा है - अनुष्टुप
  • वेदत्रयी के अन्तर्गत सम्मिलित हैं - सामवेद, यजुर्बेद, अथर्ववेद
  • वैदिक युग में राजा के पश्चात् महत्त्वपूर्ण अधिकारी थे - पुरोहित
  • पूर्व वैदिक काल में भूमि का स्वामित्व किसके पास था - सम्पूर्ण कबीले
  • वैदिक काल में ग्राम का मुखिया कौन होता था - गणपति
  • वैदिक धर्म आधारित था- यज्ञ पर
  • अथर्ववेद में वर्णित प्रथम कृषि वैज्ञानिक कौन था - पृथुवैन्य
  • औषधि वनस्पतियों के विषय में सूचना किस वेद में है - अथर्ववेद
  • शुल्वसूत्र सम्बन्धित है - व्याकरण से 
  • आर्य शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख प्राप्त हुआ है - गीता में
  • ऋग्वैदिक आर्यों द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त की गयी वस्तु थी - व्रिही
  • आर्यों का आदि देश तुर्किस्तान है, यह किसने कहा था - हर्ट्जफील्ड ने 
  • ऋग्वेद के मंत्रों की रचना करने वाले थे - विश्वामित्र, वामदेव, वशिष्ठ
  • आर्य सम्बन्धी यूरोपीय सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं - सर विलियम जोन्स
  • आर्य सम्बन्धी मध्य एशिया सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं - मैक्समूलर
  • आर्कटिक प्रदेश के सिद्धान्त के प्रतिपादक थे - बाल गंगाधर तिलक
  • एल.डी. कल्ला प्रतिपादक थे - कश्मीर व हिमाचल प्रदेश सिद्धान्त के
  • वैदिक काल में प्रयुक्त किया जाने वाला ’’क्रम्ब’’ था - माथे का टीका


Tuesday, May 26, 2020

General Knowledge

General Knowledge (सामान्य ज्ञान) part-8

भारतीय इतिहास से सम्बन्धित प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की प्रश्नोत्तरी हडप्पा संस्कृति : विस्तार, नगर योजना, समाज, धर्म और कला

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  • मोहनजोदड़ो को किस सन् में खोजा गया था- 1922
  • ’’मुर्दो का टीला’’ कहा जाता था- मोहनजोदड़ो
  • कृषि के साक्ष्य किस स्थान से प्राप्त हुये थे- हडप्पा
  • जुते हुए खेत के साक्ष्य किस स्थल में पाये जाते हैं- कालीबंगा
  • विशाल स्नानागार प्राप्त हुआ था- मोहनजोदड़ो 
  • मोहनजोदड़ो किस देश में स्थित है- पाकिस्तान
  • कार्बन डेटिंग के आधार पर हड़प्पा सभ्यता का क्या काल है- 2300-1750 ई.पू.
  • हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख बन्दरगाह था- लोथल
  • सिन्ध सभ्यता का नामकरण सिन्धु सभ्यता से सिन्धु घाटी की सभ्यता किया गया - प्रारम्भ में माना गया कि यह सभ्यता अनिवार्यतः सिन्धु घाटी तक सीमित थी।
  • सिन्धु घाटी के लोगों का परिचय एक पशु से नहीं था, जिसे वैदिक आर्यों ने पालतू बनाया था उसका नाम बताइए - गाय
  • सिन्धु सभ्यता की खुदाई में प्राप्त सामग्री में कौन-सी धातु प्रयोग में नहीं लाते थे- लोहा
  • हड़प्पावासी क्या नहीं पहनते थे-चप्पल
  • उत्खनन में प्राप्त अवशेषों के आधार पर विद्वानों का मत है कि यह सभ्यता मूलतः थी- कृषि प्रधान
  • हड़प्पावासी पूजा नहीं करते थे- वृक्ष की
  • मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत कौन-सी है- सार्वजनिक स्नानागार
  • चावल के प्रमाण हड़प्पाकालीन संस्तरों से किस प्रदेश से प्राप्त हुए हैं - गुजरात
  • हड़प्पा संस्कृति के किस स्थल पर चावल के प्रमाण प्राप्त हुये हैं- लोथल
  • हड़प्पा संस्कृति से सम्बन्धित माण्डा नामक पुरातात्विक स्थल किस नदी पर स्थित है- झेलम
  • वर्तमान भारतीय जीवन का वह क्षेत्र जो आज भी सिन्धु घाटी सभ्यता से प्रेरणा ले रहा है- धर्म
  • लोथल एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था- हड़प्पा सभ्यता का
  • सिन्धु लिपि के प्राचीनतम नमूने कब देखने को मिले- 1853 ई.
  • सिन्धु सभ्यता के मापक किस गुणांक भार के थे- 16
  • सिन्धु घाटी के लोग कपड़ा (कपास) इस्तेमाल करते थे, इस बात का प्रमाण किस स्थान से मिलता है- मोहनजोदड़ो
  • मोहनजोदड़ो जाने वाला पहला व्यक्ति कौन था- राखालदास बनर्जी
  • घोड़े की हड्डियाँ कहाँ से प्राप्त हुई है-सुरकोटड़ा
  • सिन्धु घाटी के लोग किस वस्तु का सर्वाधिक आयात करते थे- धातु एवं बहुमूल्य रत्न
  • सैन्धव व्यापारिक केन्द्रों से मेसोपोटामिया के साथ व्यापार किस मध्यस्थ बन्दरगाह से होता था- दिल्मुन
  • सिन्धु सभ्यता से सम्बन्धित कौन-सा स्थल अफगानिस्तान में स्थित है- सोत्का-कोह
  • पक्की मिट्टी से बने हल की आकृति प्रतिवेदित है- बनमाली से
  • हड़प्पाकालीन चाँदी का मुकुट कहाँ से प्राप्त हुआ है- कुणाल
  • हड़प्पा संस्कृति का वह कौन-सा पुरास्थल है, जहाँ दुर्ग तथा नीचे का नगर दोनों अलग-अलग प्रचीर से घिरे हुए हैं- कालीबंगा
  • हड़प्पा कहाँ स्थित है- पंजाब के मॉण्टगोमरी जिले में
  • हड़प्पा सभ्यता की खोज की गयी थी- राखालदास बनजी द्वारा
  • हड़प्पा सभ्यता की खोज की गयी  थी- 1921 ई.
  • हड़प्पा सभ्यता का स्वरूप था- ग्रामीण
  • हड़प्पावासियों को जानकारी नहीं थी- घोड़ा
  • हड़प्पा सभ्यता थी- काँस्य सभ्यता 
  • उत्खनन में प्राप्त अवशेषों के आधार पर विद्वानों का मत है कि यह सभ्यता मूलतः थी-कृषि प्रधान
  • मातृसत्तात्मक परिवार था- हड़प्पा की सभ्यता में 


                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               

Thursday, May 21, 2020

General Knowledge

General Knowledge (सामान्य ज्ञान) part-7

भारतीय इतिहास से सम्बन्धित प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की प्रश्नोत्तरी

General Knowledge
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  • सबसे प्राचीनतम वेद है - ऋग्वेद
  • जातक कथाएँ सम्बन्धित हैं- बौद्ध धर्म से
  • पंचतन्त्र पुस्तक के लेखक कौन है- विष्णु शर्मा
  • किस देवी/देवता को गायत्री मंत्र समर्पित है - सावित्री
  • पृथ्वीराज रासो के लेखक हैं- चन्दबरदाई
  • प्रसिद्ध दाशराज्ञ (दस राजाओं का युद्ध) का उल्लेख मिलता है- ऋग्वेद में
  • आजीवक धर्म-सम्प्रदाय के धर्मगुरु का नाम था- मक्खलिपुत्र गोशाल
  • ग्यारहवीं शताब्दी की पुस्तक ’’शून्य पुराण’’ का लेखक कौन था- रमई पण्डित
  • बेस नगर स्तम्भ अभिलेख में निम्नांकित में से किसे भागवत कहा गया है- हेलियोडोरस
  • चार वर्णों का उल्लेख सर्वप्रथम कहाँ मिलता है - पुरुषसूक्त
  • उस इतिहाकार का नाम बताइये, जिसने भारत के विषय में प्रथम उल्लेख किया और पाँचवीं शताब्दी बी.सी. में उत्तर पश्चिमी भारत से आचमेनियन साम्राज्य से सम्बन्ध के विषय में लिखा - डायडोरस
  • प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोतों को कितने भागों में बॉटा जा सकता है- तीन
  • अभिलेखों को कितने भागों में बॉटा जा सकता है- दो
  • प्राकृतिक बनावट के आधार पर भारत को कितने भागों में बॉटा जा सकता है- पाँच
  • ’’न्यूमिसमेटिक्स’’ में किसका अध्ययन किया जाता है- सिक्कों का
  • वेदों की संख्या कितनी है - चार
  • उपनिषद् कहलाते हैं- दार्शनिक ग्रन्थ
  • ’’तिब्बती लामा’’ कौन था, जिसने भारत के इतिहास पर लिखा- तारानाथ
  • मैगस्थनीज कहाँ का निवासी था- ग्रीक का 
  • ऋग्वेद में कितने मण्डल हैं- दस
  • इतिहास का पिता किसे कहा जाता है- हेरोडोट्स को
  • पुराणों की संख्या कितनी है- अट्ठारह
  • जब संस्कृत सम्भ्रान्त लोगों की भाषा थी तब जनसामान्य भाषा क्या थी- पाली
  • राजतरंगिणी में कितनी उपजातियों का उल्लेख मिलता है- 64
  • राजतरंगिणी के लेखक कौन हैं- कल्हण
  • ’’पृथ्वीराज रासो’’ किसने लिखा था- चन्दबरदाई
  • ’’कश्मीर के इतिहास ’’ का वर्णन किस ग्रन्थ में है- राजतरंगिणी
  • ब्राह्मण साहित्य में सर्वाधिक प्राचीन है- उपनिषद्
  • गायन विद्या का श्रेष्ठ उदाहरण है- सामवेद
  • ’पेरीप्लस ऑफ एरिथ्रियन सी’’ पुस्तक किसने लिखी थी- गुमनाम इतिहासकार
  • भारत के विषय में लिखी अलबरुनी की किताब का नाम क्या है- तहकीक-ए-हिन्द
  • अर्थशास्त्र के लेखक कौन हैं- कौटिल्य

General Knowledge (सामान्य ज्ञान)


  • पूर्व पाषाण काल को कितने भागों में विभाजित किया गया है- तीन भागों में
  • भारत में पाषाण कालीन सभ्यता का सर्वप्रथम अनुसंधान कब प्रारम्भ हुआ- 1863 ई. में
  • पाषाण कालीन संस्कृति की अवधि मानी गयी है- आज से लगभग 5 लाख वर्ष पूर्व
  • पाषाण कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं- हैदराबाद
  • पूर्व पाषाण काल को कितने भागों में विभाजित किया गया है- तीन भागों में
  • प्रसिद्ध पुस्तक इण्डिका का लेखक कौन है- मेगस्थनीज
  • अलबरूनी की किताब का नाम क्या है- तहकीक-ए-हिन्द
  • खुजराहो के मन्दिर किस वंश के राजाओं ने बनवाये थे- चन्देल 



Saturday, March 21, 2020

Tuslidas ka jivan parichay

सन्त कवि तुलसीदास जी का जीवन परिचय


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Tuslidas


भारतीय सन्तों के जीवनी के प्रमाण इतिहास के पन्नों में बहुत ही अल्प मात्रा में उपलब्ध होते हैं। कबीरदास, सूरदास, जायसी, तुलसीदास आदि सन्त कवि मध्यकाल के हैं, किन्तु उनके सम्बन्ध में आज भी हमें प्रामाणिक साक्ष्य और निर्विवाद तथ्य नहीं मिल पाये हैं।

तथ्यपरक जानकारी के अभाव में अनेक प्रकार की जनश्रुतियाँ/किवदन्ती प्राचारित हो जाती हैं। इस कारण परस्पर विरोधी मतों की प्रतिष्ठा होनी लगती है। उनके जन्म स्थान, माता-पिता, परिवार, कुल-गोत्र आदि के सम्बन्ध में अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं।

Tuslidas ka jivan parichay

तुलसीदास जी का जीवन परिचय के बारे में दोस्तो प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख किया गया है। जैसे कि श्री नाभादास द्वारा रचित ’’भक्तमाल’’ में तुलसीदास जी को वाल्मीकि का अवतार होने का उल्लेख किया है। श्री प्रियादास द्वारा रचित ’’भक्तमाल की टीका’’ में तुलसीदास जी की चमत्कारिक सिद्धियों का उल्लेख है। वेणीमाधवदास द्वारा रचित गोसाईचरित में तुलसीदास जी के जीवन वृत्त का  विस्तृत वर्णन किया गया है।

यह भी कहा जाता है कि वेणीमाधवदास तुलसीदास जी के समकालीन थे और वे उन्हीं के पास रहते थे, लेकिन इसमें चमत्कारिक घटनाओं की अधिकता के कारण इसकी प्रमाणिकता पर संशय होता है। जनपद हाथरस में 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जन्में श्री तुलसी साहेब द्वारा रचित ’’घट रामायण’’ में वे अपने को तुलसीदास जी का अवतार मानते थे और वे यह भी दावा करते थे कि उनको पूर्वजन्म की सभी घटनाएँ स्मरण हैं। 

उपर्युक्त वर्णित ग्रन्थों के अलावा गोस्वामी तुलसीदास जी की कृतियों में तुलसीदास जी के जीवन परिचय से सम्बन्धित कुछ सांकेतिक साक्ष्य उपलब्ध हुये  हैं। इन साक्ष्यां को सत्य के रूप में स्वीकार कर तुलसीदास जी के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे जन्म  स्थान, कुल, माता-पिता, गुरु देहान्त आदि के सम्बन्ध में प्रकाश डालते हैं। 

Tuslidas ka jivan parichay
जन्म  एवं स्थान (Birth and Place):-

सन्त कवि गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्म एवं स्थान के बारे में पर्याप्त मतभेद है, परन्तु अधिकांश विद्धान उनकी जन्मतिथि सम्वत् 1554 श्रावण शुक्ल सप्तमी मानते हैं। जन्म स्थान के बारे में दो मत प्रचलित हैं। कुछ विद्धान इनका जन्मस्थान बाँदा जिला के अन्तर्गत ग्राम राजापुर को मानते हैं। ग्राम राजापुर की कुछ सामाजिक रीति-रिवाज, मन्दिर में रखी तुलसी की मूर्ति एवं राजापुर निवासी उपाध्यायों के पास उपलब्ध सनदें इस बात का प्रमाण हैं कि राजापुर से तुलसीदास जी का किसी न किसी रूप में नाता अवश्य रहा होगा।

कुछ विद्धानों द्वारा बाँदा गजेटियर के अनुसार बताया गया कि तुलसीदास ऐटा जनपद के सोरों नाम स्थान से आये थे और उन्होंने मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में ग्राम राजापुर की स्थापना की थी। 

कुछ विद्धान कहते हैं कि तुलसीदास जी का जन्म न तो बाँदा जनपद के ग्राम राजापुर में और न ही एटा जनपद के ग्राम सोरो में हुआ। उनका जन्म सूकर क्षेत्र के किसी समीपवर्ती स्थान पर हुआ था, जहाँ से वे सोरो आये और बाद में राजापुर चले गये थे। 

Tuslidas ka jivan parichay

तुलसीदास जी का जन्म अभुक्त मूल ऩक्षत्र में हुआ था, जिसके कारण उन्हें परिवार के लिये अमंगलकारी समझा गया और उनके प्रति उपेक्षा का व्यवहार किया गया। यह भी कहा जाता है कि गोस्वामी जी ने जन्म लेते ही रामनाम का उच्चारण किया था, इसीलिए उनका नामकरण ’’रामबोला’’ से हुआ था।

जन्म के कुछ समय बाद गोस्वामी जी की माता का निधन हो गया और उनका लालन-पालन चुनियाँ नामक दासी के द्वारा किया गया। कुछ समय पश्चात् उनके पिता का साया भी सिर से उठ गया।

इस प्रकार रामबोला बचपन में बिना माँ-बाप के हो गये थे। गोस्वामी जी लगभग पाँच वर्ष की आयु के थे, तब चुनिया दासी का भी स्वर्गवास हो गया। बाल्यअवस्था में ही रामबोला अनाथ होकर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गये।

Tuslidas ka jivan parichay
शिक्षा-दीक्षा (Education) :-

इसी अवस्था में बालक रामबोला भटकते-भटकते सूकर क्षेत्र पहुँचकर नरहरिदास के शिष्य बने। गुरु महिमा का वर्णन करते समय गोस्वामी जी ने इन्हीं नरहरिदास जी का स्मरण किया गया है और उन्हीं के द्वारा ही सर्वप्रथम रामकथा सुनी, उन्हीं के द्वारा गोस्वामी जी का रामबोला के स्थान पर तुलसी नाम दिया गया। गुरु नरहरिदास जी ने तुलसीदास को काशी के प्रसिद्ध विद्धान शेष सनातन की पाठशाला में विभिन्न शास्त्रों का गहन अध्ययन किया।

शिक्षा समाप्त होने के उपरान्त तुलसीदास जी राजापुर आ गये। पौराणिक ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है कि राजापुर में रहकर वे कथा-पुराण कथावचक बनकर अपनी आजीविका चलते थे। तुलसीदास जी की कृतियों में उनके पिता के नाम का कोई उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन श्री कृष्णदास रचित ’’सूकर क्षेत्र माहत्म्य’’ में उनके पिता का नाम आत्माराम  एवं रहीमदास जी के दोहे के अनुसार उनकी माता का नाम हुलसी बताया गया है। 

Tuslidas ka jivan parichay
विवाह (Marriage):-

तुलसीदास जी का विवाह एक विदुषी ब्राह्मण कन्या के साथ हुआ था। श्री मुरलीधर चतुर्वेदी के अनुसार यह कन्या बन्धु पाठक की पुत्री थी, जिसका नाम रत्नावली था। विवाहोपरान्त के कुछ समय बाद तुलसीदास की पत्नी रत्नावली ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम तारापति था, परन्तु यह बालक अधिक दिनों जीवित नहीं रहा सका। तुलसीदास जी अपनी पत्नी में अत्यधिक अनुरक्त थे। 

गोस्वामी जी का दाम्पत्य जीवन का सुख अधिक समय तक स्थाई नहीं रह सका। एक बार रत्नावली गोस्वामी जी को बिना बाताये अपने मायके चली गयी। पत्नी में अनुरक्त होने के कारण तुलसीदास जी रात में नदी को पार कर सुसराल पहुँच गये। इस पर रत्नावली ने गोस्वामी जी के प्रेम को दुर्बलता के रूप में ग्रहण किया और आक्रोश में गोस्वामी जी को फटकारते हुये कहा कि :-

’’हाड़ मांसमय देह मम, तासो जैसी प्रीती। वैसी जो श्रीराम में, होत न भव भय प्रीत।।’’


तुलसीदास जी ने उक्त दोहा के शब्दों का मर्म को समझा और अपने गुरू नरहरिदास ने राम भक्ति का जो बीज उनके मन में बोया था, वह पत्नी के शब्दों से सुनकर अति प्रषन्न होकर उसी रात में गृह त्याग दिया। 

Tuslidas ka jivan parichay
आध्यात्मिक खोज(Spiritual quest) :- 

गृह त्याग करने के पश्चात् गोस्वामी जी ने अनेक स्थानों पर घूमते रहे, सन्त-महात्माओं और विद्धानों की संगति में रहकर अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान खोजते रहे। भारतीय संस्कृति एवं समाज को उन्होंने निकटता से देखकर अध्ययन किया। इस प्रकार उनकी रामभक्ति निष्ठा और भी बढ़ती गयी। 

प्रसिद्ध  ग्रन्थ श्री रामचरित मानस की रचना एवं उस समय का परिवेश(The composition of the famous Book Sri Ramcharit Manas and ht environment of that time) :-

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Shri Ramcharitmanas

घट रामायण के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी ने सन् 1631 में अयोध्या में अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ’’रामचरित मानस’’ की रचना आरम्भ की। रामचरित मानस का लेखन अयोध्या और काशी में किया गया। यह प्रसिद्ध ग्रन्थ अवधी भाषा में होने के कारण अल्प समय में ही इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी।

ऐसा माना जाता है कि लोकप्रियता बढ़ने के कारण उस समय के प्रतिष्ठित पंडितों ने गोस्वामी जी के विरुद्ध अनेक प्रकार के षड्यन्त्र रचे गये थे। रामायण की प्रतियाँ चुराने अथवा नष्ट करने का प्रयास किया गया। परिणामस्वरूप गोस्वामी जी ने रामचरित मानस की प्रतियों की सुरक्षा का भार अपने मित्र टोडर को दिया, जो काशी के जमींदार थे।

Tuslidas ka jivan parichay
वृद्धावस्था(Old Age) :-

अपने जीवन के अन्तिम दिनों में गोस्वामी जी ने कांशी में वास किया। वृद्धावस्था में गोस्वामी को अनेक प्रकार के असहनीय शारीरिक कष्टों से गुजरना पड़ा था, लेकिन उनकी श्रीराम के प्रति भक्ति एवं निष्ठा में कोई कमी नहीं आयी। गोस्वामी जी की श्रीराम के प्रति एकनिष्ठ भक्ति थी। वे अपने जीवन में किसी भी उपलब्धि का श्रेय श्रीराम को ही देते थे।

गोस्वामी जी की सांसारिक मोह माया का यह प्रमाण मिलता है कि एक बार सम्राट अकबर ने उन्हें मनसबदार बनाने का प्रस्ताव भेजा था, जिसकों उन्होंने अस्वीकार कर कर दिया। गोस्वामी जी की कृतियों में यह प्रमाण मिलता है कि वे अंध-विश्वास, पाखण्डी रूढ़ियों के खिलाफ थे।

Tuslidas ka jivan parichay
देहान्त(Dead):- 

गोस्वामी जी की देहान्त की तिथि के बारे में भी मतभेद हैं, किन्तु अधिकांश विद्धानों के मतों द्वारा समर्थित उनका देहान्त सम्वत् 1680 में श्रावण महीने के कृष्णपक्ष की तृतीय शनिवार को कासी में गंगा के किनारे असी घाट पर हुआ। असी घाट पर तुलसीदास के उत्तराधिकारियों के वंशज आज भी निवास करते हैं, वे भी इसी तिथि को गोस्वामी जी की पुण्यतिथि मानते हैं।

वृद्धावस्था में अनेक प्रकार के शारीरिक कष्टों को सहन करने के बावजूद भी उनका देहान्त बडे ही शान्तिपूर्ण हुआ। वे अपने अन्तिम क्षणों में श्रीराम नाम का गुणगान करते रहे। उनकी काव्य साधना ज्ञानोपार्जन के उपरान्त आजीवन चलती रही। श्री राम नाम का गुणगान करते करते इस संसार से अलौकिक परमधाम को प्रस्थान किया।  






Thursday, March 12, 2020

Samrat Ashok

सम्राट अशोक (Samrat Ashok) 

इस Post में Samrat Ashok Ke Jivan ki Hindi में जानकारी दी गई है कि Samrat Ashok  ने अपने जीवन में ऐसे कौन-कौनसे कार्य किये, जिनके कारण Samrat Ashok  का नाम आज भी विश्व के इतिहास में एक नक्षत्र की भाँति चमकता दिखाई देता है।

 

Samrat Ashok
Samrat Ashok

Samrat Ashok के समान सर्वगुण सम्पन्न भारत के इतिहास में कोई सम्राट नहीं हुआ है। बिन्दुसार की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अशोक राजा बना। Samrat Ashok का शासनकाल भारतीय इतिहास का अत्यन्त गौरवशाली समय माना जाता है, क्योंकि Samrat Ashok ने अपनी असाधारण कुशलता एवं क्षमता से भारत को सभी प्रकार से उन्नति प्रदान की थी। उसका विश्व की महान् विभूतियों में गिनती की जाती है। सर्वश्रेष्ठ प्रशासनिक व्यवस्था, धर्म संरक्षण, हृदय की उदारता, कला का विकास एवं प्रजा के प्रति प्रेम आदि की दृष्टि से सम्राट अशोक एक महान् शासक बना था।

Samrat Ashok ने शस्त्र विजय के स्थान पर सभी धर्मों की अच्छाई के सार पर महत्त्व दिया। उसकी राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ विश्व के इतिहास में अतुलनीय हैं। सम्पूर्ण संसार का उत्थान उसके जीवन का परम आदर्श था। 

सम्राट अशोक का परिवार
Samrat Ashok ka Parivar 

Samrat Ashok के पिता नाम बिन्दुसार तथा माता का नाम सुभद्रांगी था। वह चम्पा के एक ब्राह्मण की पुत्री थी। अशोक की माता को दर्शनीया, प्रसादिका और जनकल्याणी आदि नामों से पुकारा जाता था। बिन्दुसार की 16 रानियाँ थी तथा उनसे उत्पन्न सन्तानों की संख्या 101 थी, जिसमें सुसीम नाम का पुत्र सबसे बडा था। 

सम्राट अशोक का प्रान्तीय शासक के रूप में जीवन
Samrat Ashok Ka Prantiy Shasak ke Roop Mai Jivan


Samrat  बनने से पूर्व पिता बिन्दुसार के शासनकाल में अशोक ने प्रान्तीय सूबेदार के रूप में शासन सम्बन्धी अनुभव प्राप्त कर लिया था। सबसे पहले Samrat Ashok को अवन्ति प्रान्त का सूबेदार नियुक्त किया गया था, जहाँ पर उसने विद्रोहियों का दमन करके शान्ति व्यवस्था स्थापित की थी।

Samrat Ashok की इस प्रकार की कार्यप्रणाली एवं योग्यता से प्रभावित होकर बिन्दुसार ने उसे तक्षशिला का सूबेदार नियुक्त किया, क्योंकि तक्षिशिला में भ्रष्ट राज्य के अधिकारियों के शोषण के कारण वहाँ की जनता ने विद्रोह कर दिया था।

Samrat Ashok तक्षशिला में भी विद्रोह को समाप्त कर शान्ति स्थापित करने में सफलता रहा, जिससे उसे राज्य के कई मन्त्रियों का समर्थन प्राप्त हुआ। कुछ समय बाद बिन्दुसार की मृत्यु हो गई। सम्राट अशोक ने अपने विश्वासपात्र मन्त्रियों के सहयोग से मगध के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। 

सम्राट अशोक का उत्तराधिकारी के लिये संघर्ष
Samrat Ashok's Struggle for Successor

बिन्दुसार की मृत्यु के बाद बिन्दुसार के पुत्रों में गृहयुद्ध हुआ था। इस गृहयुद्ध में अशोक ने अपने बड़े भाई सुसीम को पराजित कर मार डाला और अपने विश्वासपात्र मंत्री राधागुप्त की सहायता से मगध के सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया।

Samrat Ashok  के मगध सम्राट बनने तथा उसके राज्याभिषेक में चार वर्ष का अन्तर बताया जाता है, जिसका मुख्य कारण मगध के उत्तराधिकार का संघर्ष ही था।

सम्राट अशोक की प्रसिद्ध कलिंग-विजय
Samrat Ashok ki Prasiddh Kaling-Vijay


Samrat Ashok  की Kaling Yuddh Vijay विश्व के इतिहास में अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। मगध के पड़ौस में ही कलिंग नाम एक शक्तिशाली राज्य था। Kaling पर नन्दों का अधिकार था। अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। हालांकि इस युद्ध में कलिंग हार गया, परन्तु सम्राट अशोक की सेना का Kaling की सेना ने बड़े ही बहादुरी के साथ युद्ध किया था। 

ऐसा कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष में Kaling को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला  लिया था। कलिंग युद्ध में लगभग डेढ़ लाख सैनिकों को कैद कर लिया गया था। लगभग एक लाख सैनिक मारे गये। चारों तरफ युद्धभूमि लाल रक्त से सनी हुई थी। वहाँ पर कराह वेदना, चीखने की आवाजें सुनाई दे रही थीं।

इस युद्ध से हुई असहनीय भीषणता के दृश्य को देखकर सम्राट अशोक प्रभावित होकर उसका हृदय परिवर्तित हो गया। कैद किये गये सैनिको अथवा मनुष्यों को छोड़ने का आदेश देकर कहा -कि अब मेरी इच्छा यह है कि संसार के सभी प्राणी संयमी और शान्त तथा प्रसन्न रहें। शस्त्र वास्तविक विजय नहीं है। वास्तविक विजय धर्म विजय है।

Samrat Ashok  ने कलिंग विजय के बाद उसने अपने शस्त्र त्याग कर मुख्य विजय को धर्म विजय माना। इसीलिये कलिंग का युद्ध विश्व में युगान्तकारी युद्धों में से एक माना जाता है।

सम्राट अशोक का धर्म परिवर्तन
Samrat Ashok ka Dharm Privartan

कलिंग के इस महायुद्ध से पूर्व सम्राट अशोक अपने पिता के समान ब्राह्मण धर्म को मानने वाला था। राजतरंगिणी के अनुसार वह शिव भक्त था। उसे हिंसा एवं पशु-वध से घृणा नहीं थी। वह स्वयं मांसाहारी था। उसके भोजनालय में प्रतिदिन पशुओं का वध होता था। 

लेकिन कलिंग युद्ध के बाद वह पूर्णतः बदल गया। सम्राट अशोक महात्मा बुद्ध के उपदेशों से काफी प्रभावित होकर उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। बौद्ध धर्म धारण के बाद सम्राट अशोक ने अनेक बौद्ध तीर्थस्थानों की यात्रा की। 

Samrat Ashok  ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था और वह बौद्ध हो गया था, लेकिन उसने सर्वसाधारण में जिस धर्म का प्रचार किया था, वह बौद्ध धर्म से भिन्न था। और वह था- मानव धर्म, विश्व धर्म।

बौद्ध धर्म सम्राट अशोक का व्यक्तिगत धर्म था न कि वह राजधर्म था। उसने अपनी प्रजा पर इस व्यक्तिगत धर्म को अपनाने के लिए कभी प्रेरित नहीं किया। फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि सम्राट अशोक के बौद्ध हो जाने पर बौद्ध धर्म अशोक के समय काफी उन्नतशील बन गया। और इतना ही नहीं विम्बसार और आजतशत्रु जैसे शासकों का आश्रय पाकर बौद्ध धर्म का मगध साम्राज्य में तेजी से प्रचार-प्रसार हुआ था। 

बौद्ध धर्म किसी राज्य के आश्रय का अभाव होने के कारण एक क्षेत्र में ही सीमित था, लेकिन सम्राट अशोक का आश्रय पाकर बौद्ध धर्म का इतना तेजी से विस्तार हुआ कि बौद्ध धर्म भारत में नहीं अपितु अन्य देशों में भी फैल गया। बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिये सम्राट अशोक ने अनेक धर्म यात्राएँ की थी। 

सम्राट अशोक का बौद्ध बनने के बाद जीवन
Samrat Ashok Ka Bauddh' Banane Ke Bad Jivan

Samrat Ashok  का बौद्ध बनने पश्चात् अपना विशाल साम्राज्य का परित्याग कर एक साधारण भिक्षु के समान अपना जीवन व्यतीत करने लगा। उसने प्रायः यज्ञों में होने वाले पशु-वध पर रोक लगा दी। भोजन की सामग्री में उपयोग लाने वाले पशु-वध पर रोक लगा दी।

Samrat Ashok ने अपनी पाकशाला में पशु-वध पर रोक लगा दी। पूरे साम्राज्य में निर्देश जारी कर दिये कि पशु-वध पाप है। इसलिये अब पशुओं को मारा नहीं जायेगा। इस प्रकार आचरण ने सम्राट अशोक को एक महान सम्राट की उपाधि दी गई। और इन्हीं आचरणों से वहाँ की प्रजा प्रेरित होकर बहुत से लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे। 

सम्राट अशोक के समय बौद्ध धर्म में उत्पन्न मत-भेद
Samrat Ashok Ke samay Bauddh Dharm Mai Utapann Mat-Bhed

Samrat Ashok  के समय बौद्ध धर्म में मत-भेद उत्पन्न हो गये थे, जिसको दूर करने के लिये एवं धर्म को संगठित करने हेतु अशोक ने पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध महासभा का आयोजन करवाया था। इस महासभा में बौद्ध धर्म में उत्पन्न मतभेदों एवं दोषों को दूर किया गया था। जिसके परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म उसके शासनकाल में खूब फला-फूला।

सम्राट अशोक का धम्म
Samrat Ashok Ka Dhamm

हम आपको पूर्व में उल्लेख कर चुके हैं कि बौद्ध धर्म को Samrat Ashok  ने एक व्यक्तिगत धर्म के रूप में स्वीकार किया था। उसने अपनी प्रजा को बौद्ध धर्म को अपनाने के लिये न तो कोई वजन लादा और न ही प्रेरित किया।

प्रजा स्वेच्छानुसार बौद्ध धर्म को अपना सकती  थी, लेकिन सम्राट अशोक ने अपनी प्रजा का नैतिक एवं अध्यात्मिक स्तर को उन्नतशील बनाने के लिये जिस धर्म पर जोर दिया था, वह था- धम्म। धम्म का अर्थ- विभिन्न रूपों में था जैसे- राजधर्म, सभी धर्मों की अच्छाई का सार, राजाओं को अपने धर्म का पालन करना, जिसमें अहिंसा, दया, दान, सत्य, आत्मीय शुद्धि, सामाजिक कर्तव्य आदि तथ्यों का समावेश था।

Samrat Ashok का धम्म मानव जाति के कल्याण तक ही सीमित नहीं था। वह तो जगत के सारे जीव को सुख पहँचाने वाला था। 

सम्राट अशोक का साम्राज्य विस्तार
Samrat Ashok Ka Samrajya Vistar

सम्राट अशोक का साम्राज्य उत्तर में कश्मीर, दक्षिण में मैसूर तक और पश्चिम में अफगानिस्तान-बिलोचिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक विस्तृत था। कुछ छोट-छोटे राज्य उसके अधीन नहीं थे। बाकी सम्पूर्ण भारत Samrat Ashok  के साम्राज्य में आता था। प्राचीन भारत में इतने बड़े साम्राज्य पर शासन करने का सौभाग्य किसी अन्य सम्राट को प्राप्त नहीं हुआ था। 

सम्राट अशोक का इतिहास में स्थान
Samrat Ashok Ka Itihas mai Sthaan

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि अशोक एक Mahan Samrat   होने के साथ-साथ एक सफल विजेता और कुशल शासक भी था। वह धर्म का ज्ञाता, और उसका प्रचारक तथा संरक्षक भी था। वह जन कल्याण, मानव सेवा और महात्मा बुद्ध के मार्ग में विश्वास रखने वाला था।

Kaling Yuddh Vijay के बाद उसने अपना सारा जीवन जन कल्याण एवं समस्त जीव कल्याण में अर्पित कर दिया। ऐसे बहुमुखी प्रतिभावान एवं आदर्श सम्राट का नाम विश्व के इतिहास में एक नक्षत्र की भाँति चमकता है। आज भी सम्राट अशोक का नाम बड़े सम्मान के साथ आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है।